‘जोर का झटका, धीरे धीरे’. मायावती ने समाजवादी पार्टी से अपने महागठबंधन पर कुछ इसी तरह का रवैया अपनाया है. हालांकि राजनीतिक समीक्षकों और भाजपा नेताओं ने पहले ही इस बात की घोषणा कर दी थी कि इस महागठबंधन की मियाद सिर्फ लोकसभा चुनाव नतीजे आने तक की ही है. यहां तक कि समाजवादी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी से अलग हो गए शिवपाल सिंह यादव ने भी बसपा से गठबंधन को आत्मघाती बताया था. लेकिन राजनीतिक रूप से अनुभवहीन और आत्ममुग्धता से सराबोर अखिलेश यादव ने मायावती की राजनीति के आगे आत्मसमर्पण कर दिया. यह उन्होंने जिस तरह किया उससे भी यह स्पष्ट हो गया था कि सपा-बसपा का महागठबंधन तब तक ही चलेगा जब तक मायावती ऐसा चाहती रहेंगी.

मायावती ने पहले ही आम चुनाव के बाद हुई बसपा की बैठक में आतंरिक रूप से महागठबंधन के भविष्य के बारे में संकेत दे दिए थे. इसमें उन्होंने कहा था कि गठबंधन से बसपा का कोई फायदा नहीं हुआ और सपा के वोट उसे ट्रांसफर नहीं हुए. इसके बाद मायावती ने घोषणा की कि बसपा लोकसभा चुनाव के बाद होने वाले सभी विधानसभा सीटों के उपचुनाव लड़ेगी और अकेले लड़ेगी. इसके बाद ही यह स्पष्ट हो गया कि सपा और बसपा का गठबंधन लोकसभा चुनाव समाप्त होने के साथ ही खत्म हो चुका है.

अखिलेश यादव के लिए यह बहुत बड़ा झटका था. एक ओर लोकसभा चुनाव में बहुत निम्न स्तर का प्रदर्शन, परिवार का गढ़ कही जाने वाली तीन सीटों पर करारी पराजय. दूसरी ओर पिता और चाचा की तीखी नाराजगी से आहत अखिलेश यादव को जब यह जानकारी मिली तो उस वक्त वे अपने लोकसभा क्षेत्र की जनता का आभार व्यक्त करने के बाद अपने एक विधायक के घर दावत का आनंद ले रहे थे. चुनाव नतीजे आने के बाद यह अखिलेश का यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम था और पहली बार ही वे मीडिया के सामने आ रहे थे. लेकिन महागठबंधन के बारे में पत्रकारों के सवालों पर अखिलेश यादव कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दे सके. उनके मुंह से ‘नो कमेंट्स’ के अलावा कुछ और नहीं निकल पाया.

मायावती ने उनको अगला झटका अगले ही दिन दे दिया. अपनी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मैं आप लोगों को यह बताना चाहती हूं कि सपा के कैडर को भी बसपा की तरह किसी भी वक्त के लिए तैयार रहने की जरूरत है. इस बार के चुनाव में सपा ने यह मौका गंवा दिया है. अगर सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने राजनीतिक कार्यो को करने के साथ साथ कार्यकर्ताओं और पार्टी को मिशनरी बनाते हैं तो फिर हम आगे साथ लड़ेंगे. अगर वे ऐसा नहीं कर पाते तो हमें अकेले ही चुनाव लड़ना होगा.’

यानी मायावती महागठबंधन के बने रहने की संभावना सिर्फ एक ही स्थिति में देखती हैं जिसमें अखिलेश उन्ही की शर्तों और उन्ही के निर्देशों पर समाजवादी पार्टी को चलाएं. गठबंधन की घोषणा से लेकर संयुक्त चुनावी सभाओं तक हर जगह मायावती की ‘बॉडी लैंग्वेज’ ऐसी रही जैसे गठबंधन की असली धुरी और मुखिया वही हों. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान मायावती बुआ की तरह दिखती रहीं और अखिलेश यादव बबुआ बने रहे. यहां तक कि मैनपुरी की संयुक्त सभा में नारे लगा रहे समाजवादी कार्यकर्ताओं को संयमित रहने के लिए मायावती ने सार्वजनिक तौर पर लताड़ा था और उन्हे बसपा के कार्यकर्ताओं से तमीज सीखने की सलाह दी थी. समाजवादी कार्यकर्ताओं पर इसका नकारात्मक प्रभाव हुआ था और दूसरे, इसका खामियाजा भी पार्टी को भुगतना पड़ा था. अब उपचुनावों में अपना अलग रास्ता पकड़ कर मायावती ने अखिलेश यादव को उनके पिता मुलायम सिंह यादव के प्रिय खेल कुश्ती की भाषा में ‘चारों खाने चित्त’ कर दिया है.

दरअसल अखिलेश यादव यह सोच कर चल रहे थे कि बसपा तो उपचुनावों में हिस्सेदारी करती नहीं, इसलिए लोकसभा चुनावों के बाद के 11 विधानसभा उपचुनावों में समाजवादी पार्टी बसपा के समर्थन से भाजपा को बड़ी टक्कर देने में सफल रहेगी. लेकिन मायावती ने अखिलेश यादव का यह सपना भी चूर-चूर कर दिया. अब उनके ताजा बयान के बाद अखिलेश ने भी 11 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. उन्होंने कहा है, ‘अगर रास्ते अलग अलग हैं तो उसका भी स्वागत और बधाई सबको. सब अपने अपने रास्ते चलेंगे.’

मायावती के राजनीतिक व्यक्तित्व को देखते हुए यह तो महागठबंधन की घोषणा के दिन ही तय हो गया था कि इसकी अवधि उतने ही दिनों की होगी जितने दिन तक उनके राजनीतिक स्वार्थ सधते रहेंगे. पहले भी भाजपा के साथ अपने रिश्तों में वे तीन बार ऐसा कर चुकी हैं. लेकिन अखिलेश यादव के लिए यह तीसरी बड़ी राजनीतिक चूक साबित हो रही है. पहली बार वे तब चूके थे जब पिता और चाचा शिवपाल से बगावत कर उन्होंने खुद को समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष बना लिया था. दूसरी बड़ी चूक उनसे तब हुई जब उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दल होते हुए उन्होंने कांग्रेस से गठबंधन कर उसे 110 से ज्यादा सीटें दे दीं जबकि कांग्रेस राज्य में उनकी सरकार के खिलाफ ‘27 साल यूपी बेहाल’ का नारा लगा रही थी.

अखिलेश यादव की तीसरी बड़ी राजनैतिक चूक अब ‘मायावती का साथ’ बन गई है. मायावती ने बड़ी सफाई से सपा को ठिकाने लगाया है. सपा का वोट ट्रांसफर न होने की बात कह कर उन्होने एक बड़ा झूठ बोला है क्योंकि उन्होंने जो 10 लोकसभा सीटें जीती हैं उनमें से कम से कम सात पर सपा के सहयोग के बिना जीत असंभव थी. लेकिन अपनी निर्दयता के लिए चर्चित मायावती ने इसी भोथरे वार से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को सन्न कर दिया है. फिलहाल अखिलेश इस हाल में पहुंच चुके हैं कि न घर में सीना चौड़ा कर बैठ सकते हैं न ही पार्टी दफ्तर में कार्यकर्ताओं के सामने ही. एक पराजित और हीनता की भावना से जूझ रहे नेता के लिए ऐसा वक्त चिंतन का होता है. अखिलेश को अब इसी की जरूरत है.