दूसरी बार प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने अपने सांसदों को कुछ खास निर्देश दिए थे. इनमें मंत्रिपद को लेकर कयासबाजी न करना भी शामिल था. जानकारों के मुताबिक इसका सीधा सा मतलब था कि नए मंत्रियों का चयन घिसे-पिटे गणित से नहीं बल्कि नए समीकरणों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा.

मंत्रिमंडल के गठन के वक़्त यह बात काफ़ी हद तक सही भी साबित हुई. इस बार कई ऐसे नेताओं को मंत्रिमंडल में अहम जिम्मेदारियां दी गईं जिनके बारे में कम ही कयास लगे थे. उधर, कई जाने-पहचाने चेहरे नई कैबिनेट से नदारद दिखे. पूर्व खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ भी ऐसे ही कुछ चर्चित नामों में शुमार हैं. राठौड़, राजस्थान की जयपुर ग्रामीण सीट से लगातार दूसरी बार लोकसभा पहुंचे हैं.

मंत्रियों की सूची से राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की गै़रमौजूदगी ने कई राजनीतिकारों को चौंकाया है. इसकी प्रमुख वजह यह भी है कि पिछली मोदी सरकार के अधिकतर मंत्रियों का नाता किसी न किसी विवाद से जुड़ा ही रहा. लेकिन राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के कार्यकाल को अपेक्षाकृत संतोषजनक माना गया. उनकी ‘खेलो इंडिया’ जैसी योजनाओं को देशभर में जमकर सराहना मिली. उनके चलाए फिटनेस चैलेंज को आगे बढ़ाने में प्रधानमंत्री मोदी ने भी भूमिका निभाई. साथ ही वे अपने पूरे कार्यकाल में आलाकमान के सामने एक अनुशासित सिपाही की ही तरह पेश आए. ऐसे में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को केंद्र में दोबारा मौका न मिलने को लेकर दिल्ली से लेकर जयपुर तक अलग-अलग कयासों के बाज़ार गर्म हैं.

पहले जयपुर की बात करें तो यहां भाजपा हाईकमान द्वारा राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को प्रदेश संगठन में जल्द ही कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंपे जाने की संभावना सबसे ज्यादा जताई जा रही है. वरिष्ठ पत्रकार श्रीपाल शक्तावत इससे जुड़े संभावित पहलुओं की चर्चा करते हुए कहते हैं, ‘बीते कई चुनावों से भारतीय जनता पार्टी एक नहीं बल्कि तीन कदम आगे तक की सोचकर फैसले लेती दिखी है. पार्टी हर राज्य में दूसरी लाइन के नेताओं को खड़ा कर रही है. चूंकि पिछली बार राठौड़ को उनकी अपनी ख्याति के चलते मौका मिला था इसलिए इस बार हो सकता है कि शीर्ष नेतृत्व उन्हें संगठन संभालने के गुर सिखाना चाहे.’

एक राजनैतिक विश्लेषक शक्तावत की बात से सहमति ज़ाहिर करते हुए चर्चा को आगे बढ़ाते हैं. वे कहते हैं, ‘यदि ऐसा हुआ तो राठौड़ सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा के लिए नई चुनौती बन सकते हैं.’ उनके शब्दों में, ‘पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की वजह से राजस्थान में राजपूत मुख्यमंत्री की स्वीकार्यता आज भी महसूस की जा सकती है. ख़ुद राजे भी मराठा राजघराने से आने के बावजूद ख़ुद को राजपूत की बेटी बताकर ही राजस्थान में स्थापित हो पाई हैं. ऐसे में राठौड़ की शक्ल में प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री को देखना कोई बड़ी बात नहीं.’

राजस्थान के कुछ अन्य राजनैतिक समीकरण भी उनकी इस बात के पक्ष में नज़र आते हैं. इनमें पहला तो ये कि युवा होने की वजह से राज्यवर्धन सिंह राठौड़ कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट का बेहतर तोड़ साबित हो सकते हैं. दूसरे, वे फौज में कर्नल रहने के अलावा ओलंपिक खेलों में पदक जीतकर देश का नाम रोशन कर चुके हैं. ऐसे में उनकी जो राष्ट्रवादी छवि उभरकर सामने आयी वह भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस की विचारधारा से मेल खाने के साथ आमजन को भी खासा प्रभावित करती है.

वहीं, बीते पांच साल में वसुंधरा राजे सिंधिया भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को अपने प्रतिद्वंदी के तौर पर ज़ाहिर करती रही हैं. प्रमुख मामला नवंबर-2017 का है जब तत्कालीन मुख्यमंत्री की हैसियत से राजे ने राठौड़ को सूबे में राष्ट्रीय युवा उत्सव का आयोजन नहीं करने दिया. जबकि इससे पहले राजस्थान युवा बोर्ड ने खुद पत्र लिखकर खेल मंत्रालय से इसका आग्रह किया था. हालांकि इस सबके बावजूद राजस्थान में यह मानने वालों की भी कमी नहीं कि सूबे में वसुंधरा राजे को चुनौती दे पाने में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को लंबा वक़्त लग सकता है.

इस पूरे मामले से जुड़ी एक चर्चा यह भी है कि इस बार कैबिनेट में राजस्थान से उचित संख्या में सांसदों को शामिल किया जा चुका है. इनमें पूर्व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी शामिल हैं. कयास हैं कि चुनावी मुहाने से काफी दूर खड़े राजस्थान में जब राजनैतिक सरगर्मी बढ़ने लगेगी, तब शेखावत को प्रदेशाध्यक्ष बनाकर पार्टी आलाकमान अपनी उस इच्छा को पूरी कर सकता है जो वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री रहते अधूरी रह गई थी. उसके बाद ही राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा.

लेकिन यदि दिल्ली की बात करें तो यहां कुछ और ही चर्चा है. सूत्रों की मानें तो पिछले कार्यकाल में राज्यवर्धन सिंह राठौड से जुड़ा कोई विवाद सार्वजनिक तो नहीं हुआ, लेकिन उनके तौर-तरीकों से भाजपा के कई नेता और कार्यकर्ता नाराज़ थे. इस बात की शिकायत कई बार प्रधानमंत्री कार्यालय तक भी पहुंची थी. भारतीय जनता पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ कार्यकर्ता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘शायद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने यह बात भांप ली कि दूसरी बार मंत्री बनने से राठौड़ का बढ़ा हुआ अहंकार उनसे कोई न कोई बड़ी ग़लती ज़रूर करवाएगा.’

राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजेश असनानी भी कुछ ऐसी ही बात दोहराते हैं. वे कहते हैं, ‘राठौड़ अपने पहले कार्यकाल की शुरुआत से ही मीडिया में छाए रहे. फिर प्रसारण मंत्री बनने के बाद राठौड़ के बनाए लंबे-लंबे सेल्फी वीडियो तमाम न्यूज़ चैनल में चलते दिखे. इनमें से अधिकतर चुनावों से पहले आए थे. इस बात ने भी कईयों का ध्यान खींचा.’

बकौल असनानी, ‘इससे पहले सर्जिकल स्ट्राइक के वीडियो पर अपने ग़ैरजिम्मेदाराना बयान की वजह से भी राठौड़ सुर्ख़ियों में शामिल रहे थे. जबकि प्रधानमंत्री मोदी इस बार शुरुआत में ही अपने नए सांसदों को छपास और दिखास की बीमारी से दूर रहने की बात कह चुके हैं. शायद उन्होंने यह बात खासतौर पर राठौड़ जैसे नेताओं को ही ध्यान में रखते हुए कही थी.’ असनानी आगे यह भी जोड़ते हैं, ‘नए मंत्रिमंडल की जानकारी सामने आने के बाद राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के हाव-भाव से खासी निराशा झलक रही थी. इसे इस बात का संकेत माना गया कि तब तक उन्हें प्रदेश संगठन में कोई बड़ा पद दिए जाने का आश्वासन नहीं मिला था.’

हालांकि जानकारों का एक तबका इस मामले में किसी भी तरह के कयास लगाने से साफ़ इन्कार करता है. इसके पीछे के दो प्रमुख कारण का ज़िक्र करते हुए एक राजनैतिक विश्लेषक कहते हैं, ‘अव्वल तो प्रधानमंत्री मोदी और अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा में छोटे से छोटा फैसला भी लिए जाने तक गोपनीय ही रहता है. इसलिए सूत्रों के हवाले से कोई भी बात कहना बेमानी होगी. तिस पर ये इन दोनों ही नेता गुजरात के समय से ही कई बार सिर्फ़ इसलिए भी चौंकाने वाले निर्णय लेते दिखे हैं ताकि ख़ुद को कयासों और संभावनाओं के परे स्थापित कर सकें.’