बिहार के मंत्रिमंडल विस्तार का कार्यक्रम तय हो रहा था. जनता दल यूनाइटेड और भाजपा के बड़े नेताओं के पास मंत्री बनने के फोन आ रहे थे. लेकिन भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के पास मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरफ से कहलवाया गया कि सिर्फ एक नेता का नाम भेजिए, भाजपा के सिर्फ एक नेता को ही मंत्री बनने का मौका मिलेगा. पटना में भाजपा के कई नेता मंत्री बनने के लिए लालायित थे लेकिन दिल्ली से मना कर दिया गया. इसके बाद नीतीश कुमार ने सिर्फ अपनी पार्टी के नेताओं को मंत्री पद की शपथ दिला दी.

पटना में जो हुआ उसकी कड़ी दिल्ली से जुड़ती है. नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल के गठन से पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली में डटे थे. शपथ की तारीख 30 मई थी और 29 मई को नीतीश कुमार अमित शाह से मिले थे. जदयू ने अपने दो नेताओं के नाम तय कर रखे थे जिन्हें भाजपा को सौंप दिया गया था. इन नेताओं को भी बताया जा चुका था कि उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया जाएगा, उन नेताओं ने भी अपने रिश्तेदारों और करीबी नेताओं को खबर दे दी थी. लेकिन शपथ ग्रहण की सुबह बात बदल गई.

भाजपा के एक महासचिव का फोन जनता दल यूनाइडेट के शीर्ष नेतृत्व के पास आया और कहा गया कि सहयोगी दलों को सिर्फ एक कैबिनेट मंत्री बनाने का मौका मिलेगा. वजह पूछने पर कहा गया कि यह सिंबोलिक यानी प्रतीकात्मक रिप्रेजेंटेशन है. यही शब्द नीतीश कुमार ने पकड़ लिया. आखिरी वक्त में उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं से फोन पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि सिंबोलिक रिप्रेजेंटेशन से अच्छा है कि हम बाहर से मोदी सरकार को समर्थन दें. हालांकि जेडीयू के कुछ नेता एक ही मंत्रालय के लिए भी तैयार थे. उनकी दलील थी कि शिवसेना के उनकी पार्टी से ज्यादा सांसद हैं फिर भी उसने सिर्फ एक मंत्री का नाम भेजा है. लेकिन नीतीश कुमार अपनी बात पर अड़े रहे और उन्होंने मीडिया में घोषणा कर दी कि उन्हें प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं चाहिए.

पूरे चुनाव के दौरान चुप रहने वाले नीतीश कुमार ने दिल्ली में भी मीडिया से बात की और पटना में भी पत्रकारों से उनकी लंबी बात हुई. उनके करीबी बताते हैं कि पटना में शपथ ग्रहण समारोह नहीं होता अगर दिल्ली में जो हुआ वह नहीं हुआ होता. अब सवाल है कि नीतीश कुमार आगे क्या करेंगे? भाजपा में अंदरखाने सबसे ज्यादा चर्चा उनकी ही हो रही है. जिस तरह शपथ ग्रहण से ठीक पहले उन्होंने मंत्री न बनाने का फैसला किया और फिर जश्न के माहौल में विवाद खड़ा कर दिया, उसे भाजपा का शीर्ष नेतृत्व गंभीरता से ले रहा है.

नीतीश कुमार और भाजपा, दोनों के पुराने साथी उपेंद्र कुशवाहा तो यहां तक कह रहे हैं कि नीतीश धोखा नंबर 2 की तैयारी कर रहे हैं. पटना में चर्चा गर्म है, तेजस्वी यादव की पार्टी – राष्ट्रीय जनता दल - टूटने के कगार पर है. लोकसभा में शून्य तक पहुंचने वाले राजद को नीतीश कुमार उभरने नहीं देना चाहते. उनके एक बेहद करीबी सूत्र बताते हैं कि उनके लिए यह सबसे अच्छा मौका है जब वे बिहार में एक बार फिर शक्तिशाली होकर लौट सकते हैं.

जदयू के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि राजद खात्मे के कगार पर है, लेकिन उसका वोट बैंक अब भी विकल्प न मिलने की वजह से लालू परिवार के साथ ही है. अगर नीतीश कुमार फिर भाजपा से हटने का ऐलान कर दें तो वे नरेंद्र मोदी का विकल्प बन सकते हैं. वे कहते हैं कि लालू यादव के परिवार में घमासान मचा है. और ऐसे में अगर नीतीश कुमार इशारा कर दें तो राजद के आधे विधायक टूटकर उनके साथ आ जाएंगे. लेकिन उन्हें टिकट देने लायक सीटें जदयू के खाते में नहीं है. ऐसा तभी हो सकता है जब वे भाजपा से अलग हो जाएं.

अपने घोर विरोधी जीतनराम मांझी के इफ्तार में जाना भी नीतीश कुमार के बदले स्वभाव का परिचय देता है. वे अब एक बार फिर से मुस्लिम, यादव, पिछड़ों और महादलितों को अपना वोट बैंक बनाना चाहते हैं. राजद अगर बेहद कमजोर हो गई तो मुसलिम समुदाय के पास नीतीश ही इकलौते विकल्प बचेंगे. उसके यादव वोट बंट सकते है और नीतीश भाजपा को अगड़ों की पार्टी बताकर पिछड़ों का वोट पाने की भी कोशिश कर सकते हैं.

भाजपा की समस्या यह है कि अपनी तमाम कोशिशों की बावजूद बिहार में वह एक मजबूत नेता नहीं बना पाई है. उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी किसी भी सूरत में अकेले दम पर चुनाव जिताने वाले नेता नहीं माने जाते. जिस तरह से वे नीतीश कुमार की तारीफ करते हैं उससे उल्टे ऐसा लगता है जैसे वे नीतीश के डिप्टी बनकर खुश हैं. इसलिए दिल्ली में अलग तैयारी चल रही है.

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के करीबी महासचिव बताते हैं कि गिरिराज सिंह को कैबिनेट मंत्री बनाना और यादव जाति के नित्यानंद राय को राज्यमंत्री बनाना, बिहार में नए तरह को नेतृत्व खड़ा करने की कोशिश है. भाजपा मानकर चलने लगी है कि नीतीश कुमार झटका देने वाले हैं. इसलिए उनके साथ-साथ भाजपा भी आगे की तैयारी कर रही है.