निर्देशक : अली अब्बास जफर

लेखक : अली अब्बास जफर, वरुण वी. शर्मा

कलाकार : सलमान खान, कैटरीना कैफ, सुनील ग्रोवर, जैकी श्रॉफ, दिशा पाटनी, ब्रिजेंद्र काला, आसिफ शेख, शशांक अरोड़ा, सोनाली कुलकर्णी, कुमुद मिश्रा

रेटिंग : 2/5

बॉलीवुड एक अजीब शय है! कई बार तो ये जहीन विदेशी फिल्मों का रीमेक/एडप्टेशन बनाते वक्त उसमें आमूलचूल परिवर्तन भी नहीं करती. दृश्यों से लेकर संवादों तक का केवल हिंदी अनुवाद कर फिल्म को जस का तस परदे पर दोबारा रच देती है, और फिर भी आत्मा गायब मिलती है.

वहीं, कभी-कभी कोई फिल्म संवादों से लेकर दृश्यों तक को नए सिरे से लिखती है और एक विदेशी कहानी को भारतीय संवेदनाओं में जमाने के लिए ईमानदारी से प्रयासरत नजर आती है. लेकिन इतना करने के बाद भी कई बार ऐसे आधिकारिक रीमेक और एडप्टेशन से भी आत्मा गायब मिलती है और दिल खट्टा अलग होता है. यह इसलिए कि बॉलीवुड के पाषाणकालीन नियमों के फेर में पड़कर ऐसी फिल्में मेलोड्रामा, रंगीन गानों, बेमतलब के ह्यूमर, नायक को सुपरहीरो जैसा दिखाने की तलब, और बॉलीवुड के सदाबहार क्लीशे से प्यार करते हुए मूल कहानी से भटकने और बहकने लग जाती है.

सलमान खान अभिनीत ‘भारत’ यही दूसरी तरह की फिल्म है. यह एक कोरियाई फिल्म का आधिकारिक एडप्टेशन है और अगर आपने ‘ओड टू माय फादर’ (2014) नामक यह फिल्म देखी है तो आप ‘भारत’ को भारतीय बनाने के अली अब्बास जफर के प्रयासों की तारीफ अवश्य करेंगे. लेकिन दो घंटे की कोरियाई फिल्म को तकरीबन 3 घंटे (2 घंटे 67 मिनट) की भारतीयता ओढ़ाने के दौरान मूल कहानी के रास्ते से भटकने और उसके केंद्रीय विचार की तीव्रता कम करने के लिए लाख कोसेंगे भी. सही मायनों में तो इस फिल्म की सटीक समीक्षा सिनेमाघर में हमारे बगल में बैठे ‘सलमान भाई’ के एक घनघोर प्रशंसक ने की थी. जब की तो पता चला कि वे इस भीषण गर्मी से भी बहुत अघाए हैं -

बार-बार भारत को लंबा होते हुए, खिंचते हुए, प्यार-मोहब्बत और गानों में भटकते हुए देखने के दौरान उन्होंने दो-चार बार अपने ‘सलमान भाई’ से जैसे करुण निवेदन के स्वर में कहा था – ‘भाई, ये पिक्चर है या नौतपा...खत्म ही नहीं हो रही!’

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‘ओड टू माय फादर’ एक बेटे के अपने पिता को किए वायदे को आखिर तक निभाने की कहानी थी. इस एक वादे को फिल्म आखिर तक छिपाए रखती थी जबकि हमारी ‘भारत’ शुरू से ही चिल्ला-चिल्लाकर इस अलहदे विचार की चमक फीकी कर देती है. कहने को तो यह कोरियाई फिल्म कोई विलक्षण फिल्म नहीं थी और ऐतिहासिक घटनाओं के इर्द-गिर्द अपने काल्पनिक पात्र की जिंदगी को बुनकर साफ-साफ ‘फॉरेस्ट गम्प’ से प्रभावित थी.

लेकिन अपने देश के 70 साल के इतिहास को कहानी में पिरोने की वजह से और संघर्षों से जूझते एक आम आदमी और उसके देश के आंतरिक संघर्षों-बदलावों को एक-दूसरे का आईना बनाने की वजह से असरदार सिद्ध हुई थी. फिल्म के नायक (Hwang Jung-min) ने संघर्षशील पतले-दुबले आम आदमी का रोल भी जहीन अंदाज में निभाया था और प्रोस्थेटिक्स की मदद से वृद्ध बनकर भी उम्दा अभिनय किया था.

सलमान खान आम तो खैर बन नहीं सकते. इसलिए ‘भारत’ उन्हें सलमान खान ही बनाकर पेश करती है और इस वजह से भी अपनी जमीनी मूल कहानी से न्याय कम कर पाती है. कोरियाई फिल्म का नायक वियतनाम युद्ध के दौरान घायल होने के बाद जिंदगीभर के लिए एक पैर से लंगड़ाकर चलता था लेकिन क्या कोई हिंदुस्तानी फिल्म सलमान खान को लंगड़ा दिखाने की जुर्रत कर सकती है! इसलिए ‘भारत’ का नायक 70 की उम्र में भी सुपरहीरो जैसा आचरण करता है और भारत-पाक बंटवारे में हिंदुस्तान आकर नया जीवन शुरू करते वक्त भी मजबूर या असहाय कभी नहीं नजर आता.

फिल्म देखते वक्त आपको समझ आएगा कि जिस तरह की यह कहानी है उसमें नायक का वास्तविक होना, संघर्षों की मार का उसके चेहरे पर नजर आना जरूरी था. सलमान खान ऐसा चेहरा न देकर नायक को लार्जर देन लाइफ वाला चेहरा देते हैं और ऐसा करना फिल्म को केवल टुकड़ों में ही आनंदित बना पाता है.

इन टुकड़ों में से एक में जब सलमान कैटरीना कैफ के किरदार कुमुद से पहली बार प्यार का इजहार करते हैं तो अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं. विदेशी जमीन पर तेल निकालने जाने के दौरान जब खाना अच्छा नहीं मिलता तो मैनेजर से टूटी-फूटी अंग्रेजी में मनुहार लगाते वक्त भी भाते हैं. कुछ दृश्यों में साफ तौर पर अपने अभिनय पर मेहनत करते हैं और अली अब्बास जफर भी उनकी छवि का विलोम रचने की थोड़ी-बहुत कोशिश करते हैं. जहाज वाले एक तनावपूर्ण दृश्य में जब आपको लगने लगता है कि भाई अब खल चरित्रों को मार-मारकर बेहाल कर देंगे, निर्देशक जफर उनकी छवि के एकदम विपरीत जाते हुए सीन का अंजाम ही बदल देते हैं और हैरान कर जाते हैं.

लेकिन बदकिस्मती से ऐसे क्रांतिकारी बदलाव फिल्म में कम ही हैं. ज्यादातर वक्त सलमान खान नाम के सुपरस्टार की छवि को भुनाने में ही ‘भारत’ खप जाती है. फिल्म का अंतिम लंबा हिस्सा असरदार है और आपको ‘बजरंगी भाईजान’ की भी याद दिलाएगा. लेकिन अगर आपने ‘ओड टू माय फादर’ देखी होगी तो समझ में आएगा कि न सिर्फ ये अंतिम लंबा हिस्सा बल्कि पहले की कई अहम घटनाएं भी सीधी-सरल तरीके से फिल्माई गई कोरियाई फिल्म में बेहतर प्रभाव पैदा कर चुकी हैं. ‘भारत’ का फैलाव भले ही वृहद और भव्य है, लेकिन इमोशन्स का ज्वार खड़ा करने के मामले में कोरियाई फिल्म से मुकाबला करने की हैसियत नहीं रखता.

होने को तो ‘भारत’ के पास ओरिजनल फिल्म की टक्कर का होने लायक कंटेंट मौजूद था. लेकिन जैसा कि अधिकाधिक हिंदुस्तानी रीमेक/एडप्टेशन के साथ होता है कि हम अतिरंजना को भारतीय खूबी मानकर पटकथा में हर चीज को अति की मात्रा में डाल देते हैं. ‘भारत’ में न कॉमेडी सब-प्लॉट्स की जरूरत थी, न रंगीन गानों की, न सर्कस वाले तमाशे की, न सलमान-कैट के बीच की मोहब्बत को केंद्रीय थीम से ज्यादा तवज्जो देने की. इन सबने फिल्म को बेहिसाब लंबा किया है और प्रभाव बेहद कम कर दिया. हॉलीवुड से तमाम तकनीशियन आयातित करने के शौकीन बॉलीवुड को सबसे पहले वहां के तेजतर्रार एडीटर की सेवाएं लेनी चाहिए. ताकि दो घंटे की ओरिजनल कहानी को दो ही घंटों में कहने का सलीका आ सके.

‘भारत’ का नाम भले ही हमारे देश के नाम पर भारत है, लेकिन वो भारत की आजादी से लेकर 2010 तक के वक्त के एतिहासिक घटनाक्रमों को शऊर से पटकथा में शामिल नहीं कर पाती. ‘ओड टू माय फादर’ की खासियत थी कि उसने कोरियाई युद्ध से लेकर वियतनाम युद्ध जैसे उनके देश की दृष्टि से महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाक्रमों को कुशलता से पटकथा में पिरोया था. इतना कि कोरियाई इतिहास जानने-समझने वालों को समझ आ जाता है कि अधिकारवादी सरकार के दौर में क्यों पैसों के लिए कोरिया के नागरिकों को जर्मनी जाने को मजबूर होना पड़ा होगा. दक्षिण कोरिया में इस फिल्म को अथाह सफलता मिलने की वजह भी यही थी कि 40 से लेकर 70 की आयुवर्ग वाला कोरियन भी अपने संघर्षशील गुजरे वक्त को इस फिल्म में दोबारा जीवंत होते हुए देखा पाया था. नॉस्टेल्जिया ने कोरियाई लोगों के बीच फिल्म के सफल होने में अहम भूमिका निभाई थी.

लेकिन, ‘भारत’ केवल भारत-पाकिस्तान बंटवारे को ही कुशलता के साथ परदे पर रच पाती है. बाकी भारतीय इतिहास की सतही जानकारी ही फिल्म के पास मौजूद मिलती है. कोई ऐसा खास ऐतिहासिक घटनाक्रम नहीं मिलता जो फिल्म का ऑर्गेनिक तरीके से हिस्सा बना हो और हमारे अतीत के स्याह अंधेरों से लेकर गौरवान्वित करने वाले घटनाक्रमों का इस्तेमाल ‘भारत’ नाम की फिल्म में भारत नाम के नायक के साथ-साथ भारत नाम के देश की यात्रा को दिखाने के लिए उपयोग किया गया हो.

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अभिनय के डिपार्टमेंट में सलमान खान सदैव की तरह सलमान खान बने रहे हैं. इसके आगे उनपर लिखने के लिए कुछ बचता नहीं! सुनील ग्रोवर उनके साथ एक फ्रेम में जंचते हैं और वे भले ही नायक के दोस्त की टकसाली भूमिका में हैं लेकिन सलमान के साथ उन्हें जितना कदमताल करने को मिला है उतना अमूमन चरित्र अभिनेताओं को नहीं मिलता.

कैटरीना कैफ और सलमान खान की कैमिस्ट्री खासी उम्दा है और कैटरीना हिंदी बोलते वक्त क्यूट भी लगती हैं. हिंदी उच्चारण उनका काफी सुधरा है और अभिनय का ‘अ’ अब उन्हें हिंदी में लिखना आने लगा है.

हालांकि, कहने को कैटरीना को एक मजबूत लड़की का किरदार दिया गया है जो 70-80 के दशक में लिव-इन में रहती है और अपनी मर्जी से सलमान से शादी नहीं करती. लेकिन कृपया करके किसी भ्रम में मत रहिए. सलमान खान की घोर पुरुष प्रधान फिल्मों में ये सब दिखावटी सामान होता है. क्योंकि आखिर में जब सलमान रूपी हीरो घर छोड़कर जाता है तो उसकी मां और दुकान को नायिका को ही अपनी बढ़िया नौकरी छोड़कर संभालना होता है!