आम तौर पर केंद्रीय मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री के बाद गृह मंत्री को नंबर दो माना जाता है. ऐसी सोच आजादी के बाद भारत में जो पहली सरकार बनी थी, उसी समय से बनी हुई है. उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे और उनके साथ गृह मंत्री के तौर पर सरदार वल्लभ भाई पटेल थे. उस समय सरकार और कांग्रेस में नेहरू के बाद पटेल को ही नंबर दो माना जाता था. इसके अलावा देश की आंतरिक स्थितियां भी उस समय बहुत विषम थीं जिन्हें संभालने की जिम्मेदारी गृहमंत्री की ही थी. तब से अक्सर प्रधानमंत्री के बाद पार्टी के सबसे ताकतवर व्यक्ति को ही देश के गृह मंत्री का पद दिया जाता रहा.

हालांकि, कुछ मौके ऐसे भी आए जब ऐसा नहीं हुआ. लेकिन फिर भी गृह मंत्री को ही हमेशा सरकार में नंबर दो माना माना गया. नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में राजनाथ सिंह बतौर गृह मंत्री काम कर रहे थे और उन्हें ही सरकार में नंबर दो माना जाता था. उनकी नई सरकार में अमित शाह गृह मंत्री हैं इसलिए उन्हें इसमें नंबर दो माना जा रहा है. शाह को पार्टी में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद इसका सबसे ताकतवर नेता भी माना जाता है.

लेकिन ऐसी कई वजहें हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि आम धारणा चाहे जो बन गई हो लेकिन जमीनी स्थिति और शक्तियों को देखें तो अब केंद्र सरकार में सबसे महत्वपूर्ण स्थिति वित्त मंत्रालय की है. इसका एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि ऊपर से कुछ भी सोचें-कहें लेकिन इस समय असल में केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री के बाद सबसे ताकतवर वित्त मंत्री हैं, गृह मंत्री नहीं.

वैसे नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में भी गृह मंत्री राजनाथ सिंह को लेकर चाहे जो भी धारणा रही हो लेकिन उस समय सरकार में वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली कई मामलों में नंबर दो की तरह ही काम कर रहे थे. इस सरकार में भी कम से कम पांच ऐसी वजहें स्पष्ट तौर पर दिख रही हैं जिनके आधार पर माना जा सकता है कि इसमें वास्तविक नंबर दो गृह मंत्री अमित शाह नहीं बल्कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण हैं.

अप्रत्यक्ष कर और जीएसटी परिषद

पहले अप्रत्यक्ष करों को लेकर बड़े बदलावों की घोषणा आम बजट में होती थी. उस समय संघीय ढांचे की व्यवस्था के तहत अप्रत्यक्ष करों से जुड़े कई विषयों पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता राज्य सरकारों को भी थी. लेकिन अब संविधान संशोधन के जरिये इन पर कोई भी निर्णय लेने की जिम्मेदारी जीएसटी परिषद को दे दी गई है. इस वजह से अप्रत्यक्ष करों के मामले में यह परिषद पूरे साल निर्णय लेती है. हालांकि राज्यों का भी इसमें प्रतिनिधित्व है लेकिन इसकी अध्यक्षता देश के वित्त मंत्री के हाथों में होती है. इस लिहाज से देखें तो अप्रत्यक्ष करों के मामले में अंतिम निर्णय में पूरे साल वित्त मंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. इस वजह से हाल के दिनों में वित्त मंत्री की शक्तियां पहले से काफी बढ़ गई हैं.

योजना आयोग की जगह नीति आयोग

जब योजना आयोग था तो राज्यों को विशेष अनुदान देने का काम योजना आयोग का था. हालांकि, उस वक्त भी वित्त मंत्रालय का इसमें दखल होता था. लेकिन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तस्वीरें योजना आयोग के उपाध्यक्ष के साथ छपा करती थीं. आम तौर पर मुख्यमंत्री दिल्ली आकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष से मिलकर राज्यों के लिए विशेष अनुदान की मांग करते थे. लेकिन योजना आयोग के खत्म होने के बाद नीति आयोग को यह काम नहीं दिया गया. अब राज्यों को विशेष अनुदान देने का काम वित्त मंत्रालय के पास है. अब राज्यों के मुख्यमंत्रियों को विशेष पैकेज और अनुदान के लिए वित्त मंत्री के पास जाना होता है. इस वजह से पहले के मुकाबले वित्त मंत्रालय का महत्व और भी बढ़ गया है.

आम बजट में रेल बजट का विलय

वित्त मंत्री की शक्तियां पहले के मुकाबले अब और अधिक इसलिए भी हो गई हैं कि अब रेल बजट, आम बजट का हिस्सा बन गया है. पहले रेल बजट अलग से रेल मंत्री पेश किया करते थे. लेकिन बिबेक देबराॅय समिति की सिफारिश पर पुरानी व्यवस्था खत्म कर दी गई. आम बजट में रेलवे से संबंधित बातों पर रेल मंत्रालय से सुझाव तो लिये जाते हैं लेकिन इन पर अंतिम निर्णय वित्त मंत्री ही लेते हैं. अब रेलवे से संबंधित मांगों को पूरा करने में वित्त मंत्री की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है. वर्तमान स्थिति में रेल परियोजनाओं की मांगों को लेकर सांसदों और अन्य नेताओं को न सिर्फ रेल मंत्री से मिलना पड़ता है बल्कि उन्हें वित्त मंत्री के पास भी जाना पड़ता है. इसका मतलब यह हुआ कि रेल बजट का आम बजट में विलय होने की वजह से भी वित्त मंत्री की ताकत में काफी इजाफा हुआ है.

भूमंडलीकरण

1991 से भारत ने नई आर्थिक नीतियों के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था से अपनी अर्थव्यवस्था को जोड़ना शुरू किया. इस वजह से वैश्विक आर्थिक नीतियों और समझौतों का भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ने लगा. ऐसे समझौतों की शर्तों के आधार पर भारत में कई आर्थिक नीतियां तय होती हैं. वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए किस उद्योग को प्रोत्साहन पैकेज देना है, इस संबंध में अंतिम निर्णय वित्त मंत्रालय का ही होता है. इस वजह से भी वित्त मंत्रालय अब पहले के मुकाबले अधिक ताकतवर हो गया है. आयात-निर्यात से संबंधित निर्णयों में भी वित्त मंत्री की अहम भूमिका होती है. इस वजह से विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित मंत्रियों को भी वित्त मंत्री के पास जाकर अपने क्षेत्र के लिए विशेष पैकेज की मांग करनी पड़ती है.

अनुच्छेद-356 के उपयोग और दुरुपयोग में कमी

पहले गृह मंत्रालय इस वजह से भी बेहद ताकतवर था कि संविधान के अनुच्छेद-356 का इस्तेमाल करके अक्सर विभिन्न राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता था. ऐसे हालात में राज्यपाल के जरिए उस राज्य का शासन एक तरह से गृह मंत्रालय ही चलाता था. इस वजह से गृह मंत्री के हाथ में पहले आज के मुकाबले कई सारी शक्तियां आ जाती थीं. लेकिन अदालती हस्तक्षेप की वजह से पिछले कुछ समय से अनुच्छेद-356 का इस्तेमाल और दुरुपयोग काफी कम हो गया है. इस वजह से गृह मंत्री की ताकत व्यावहारिक तौर पर पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है.