न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न के नेतृत्व वाली सरकार ने हाल में एक ऐसी आर्थिक पहल की जो इस समय पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है. वहां किसी देश के आर्थिक विकास के लिए ज़रूरी पैमाना बन चुकी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को नज़रअंदाज़ करते हुए एक ‘वेलबीइंग बजट’ लाया गया है. इसके तहत आवंटित होने वाली रक़म आर्थिक विकास से ज़्यादा सामाजिक विकास को केंद्र में रखते हुए ख़र्च की जाएगी.

न्यूज़ीलैंड की सरकार का कहना है कि उनके यहां आर्थिक विकास तो हुआ है, लेकिन एक बहुत बड़े तबक़े को इसका लाभ नहीं मिला है. इसके चलते आर्थिक असमानता बढ़ी है जिसका असर लोगों के जीवन और दिमाग़ पर साफ़ दिखता है. जेसिंडा अर्डर्न सरकार के वेलबीइंग बजट के उद्देश्यों पर ग़ौर करने पर इसका पता चलता है. मसलन, न्यूज़ीलैंड में रह रहे सवा तीन लाख लोगों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संकट से निपटना इस बजट का एक प्रमुख उद्देश्य है. वहीं, बजट के तहत एक बड़ी रक़म बंदूक लौटाने संबंधी योजना पर ख़र्च की जाएगी. इसके अलावा बाल ग़रीबी और शिक्षा तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए भी बड़ी रक़म आवंटित की गई है.

बजट की प्रस्तावना में जेसिंडा कहती हैं, ‘न्यूज़ीलैंड ने बीते कई सालों में काफ़ी विकास किया है. (लेकिन) इस दौरान आत्महत्या के मामले बढ़े हैं, लोग अस्वीकार्य रूप से बेघर हुए हैं, घरेलू हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है और बाल ग़रीबी बढ़ी है... सिर्फ़ विकास से देश महान नहीं बनता. अब समय है कि इन चीज़ों पर भी ध्यान दिया जाए.’ जेसिंडा कहती हैं कि इस बजट की मदद से लोगों को बेहतर बनने के अवसर दिए जाएंगे जो अभी उनके पास नहीं हैं.

कई जानकारों का कहना है कि ‘वेलबीइंग बजट’ के लिए जिस आधार का ज़िक्र न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री ने किया, उसके दायरे में भारत को भी देखा जाना चाहिए, क्योंकि यहां भी ‘बढ़ते आर्थिक विकास’ के दावे के साथ आर्थिक असमानता बढ़ती चली गई है. बल्कि न्यूज़ीलैंड की तुलना में भारत की आर्थिक असमानता का दायरा तो बहुत बड़ा है. राजनीतिक मतभेदों के बावजूद एक बड़ा तबक़ा मानता है कि भारत में अमीर और अमीर हुए हैं और ग़रीबों का जीवन बद से बदतर होता जा रहा है. इसलिए यहां इस तरह के बजट की संभावना पर बात की जानी चाहिए.

भारत में ‘वेलबीइंग बजट’ जैसी आर्थिक पहल की अपार संभावनाएं

पिछले साल विश्व बैंक ने 2017 के आंकड़े अपडेट किए तो पता चला कि भारत दुनिया की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है. उसने फ्रांस को सातवें पायदान पर खिसकाते हुए यह मुक़ाम हासिल किया. लेकिन जैसे बढ़ती जीडीपी नागरिकों के आर्थिक विकास का विश्वसनीय पैमाना नहीं है, उसी तरह अर्थव्यवस्था का बड़े से बड़ा होते जाना भी लोगों के जीवन में आए वास्तविक सुधार का संकेतक नहीं है. सच यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत ऐतिहासिक 45 साल में सबसे ज्यादा बेरोज़गारी के दौर से गुज़र रहा है, जिससे निपटने के लिए सरकार को दो कैबिनेट समितियां गठित करनी पड़ी हैं.

वहीं, भुखमरी की समस्या से निपटने में भी भारत पिछड़ गया है. पिछले साल जारी हुए ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में देश 100वें स्थान से गोता लगाते हुए 103वें स्थान पर पहुंच गया. आलम यह है कि अब वह नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों से भी पीछे है जो अर्थव्यवस्था के मामले में उसके आगे कहीं नहीं टिकते. इससे कुपोषण की समस्या से निपटने की भारत की कोशिशों पर भी सवाल खड़े हुए हैं.

इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ डॉक्टरों और चिकित्सा क्षेत्र के लिए धन की कमी और देरी के चलते देश की स्वास्थ्य व्यवस्था संकट में है. यहां पिछले एक दशक में स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक ख़र्च कुल जीडीपी का 1.28 प्रतिशत भी पार नहीं कर पाया है. दूर-दराज़ के इलाक़ों से आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें किसी मरीज़ को इलाज तो दूर, मरने के बाद शव ले जाने के लिए उसके परिजनों को वाहन तक नहीं मिल पाता. ऊपर से बीमारियों के संक्रमण और प्रदूषण से होने वाली मौतों में बढ़ोतरी हुई है.

देश का स्वास्थ्य संकट कितना बड़ा है, इसे मौजूदा केंद्र सरकार में मंत्री और सत्तारूढ़ भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह के एक हालिया बयान से समझा जा सकता है. इसमें उन्होंने कहा है कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं को विश्व स्तर का करना उनकी सरकार के लिए कठिन चुनौती है. लेकिन इस चुनौती से पार पाने के लिए सरकार अभी भी निजी क्षेत्र के भरोसे है. ऐसे में न्यूज़ीलैंड का ‘वेलबीइंग बजट’ ध्यान खींचता है.

हालांकि ऐसा नहीं है कि भारत में आर्थिक विकास के अलावा मानव विकास के पक्ष को कभी सरकार के स्तर पर तरजीह नहीं दी गई. देश की आठवीं पंचवर्षीय योजना में मानव विकास की बात कही गई थी. उससे पहले इसी अवधारणा के तहत शिक्षा के प्रसार के लिए 1985 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की शुरुआत हुई थी. लेकिन क्या इस अवधारणा को मानते हुए पिछले 34 सालों में देश में शिक्षा को लेकर संतोषजनक सुधार हुआ है? इसका जवाब सीधे ‘न’ भले न हो, लेकिन ‘हां’ बिलकुल नहीं हो सकता. क्योंकि देश में शिक्षा के नाम पर केवल उच्च शिक्षा संस्थानों पर ध्यान दिया गया है. इसके बाद भी वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के नहीं हैं. वहीं, बुनियादी शिक्षा की हालत अभी भी ख़राब है. इसका संबंध सीधे बच्चों से है जिन्हें प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अच्छी शिक्षा देने के लिए उनके माता-पिता निजी स्कूलों के भरोसे हैं. यह स्थिति देश में अपनी तरह के ‘वेलबीइंग बजट’ की ज़रूरत पर बल देती है.

ज़रूरत के बावजूद क्या भारत में ऐसा बजट लाया जाना चाहिए?

यह तो स्पष्ट है कि भारत में वेलबीइंग बजट जैसी आर्थिक पहल की काफ़ी ज़रूरत है. लेकिन जनसंख्या और अर्थव्यवस्था के आकार के लिहाज़ से न्यूज़ीलैंड से कई गुना बड़े भारत में ऐसी पहल क्या संभव है? आंकड़े देखें तो यह मुश्किल लगता है. न्यूज़ीलैंड की आबादी जहां 48 लाख भी नहीं है, वहीं, भारत 130 करोड़ से ज़्यादा लोगों का देश है. न्यूज़ीलैंड की जनसंख्या इसके एक प्रतिशत के बराबर भी नहीं है. वहीं, उसका कुल बजट (चार साल के लिए 25 अरब डॉलर) भी भारत के बजट (490 अरब डॉलर) के आगे काफ़ी कम है.

इसके अलावा अगर ऐसी आर्थिक पहल की भी जाए तो भ्रष्टाचार जैसी समस्या के चलते उसे अमली जामा पहनाना बड़ी चुनौती होगी. इस साल जनवरी में जारी हुए 2018 के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) में डेनमार्क के साथ न्यूज़ीलैंड शीर्ष पर है. वहीं, भारत 78वें स्थान पर है जो सीपीआई की ख़राब स्थिति वाले देशों की श्रेणी में आता है. ऐसे में क्या जीडीपी या आर्थिक विकास की मज़बूत अवधारणा को तरजीह न देते हुए केवल लोगों के कल्याण के लिए पैसे ख़र्च करने का ख़तरा मोल लिया जा सकता है?

इस सवाल का जवाब कई यह कहकर देते हैं कि समस्याएं होने के बावजूद समाधान के रास्ते निकालने पड़ते हैं. हमारे यहां ऐसे रास्ते चुनाव के दिनों में सामने आते हैं. हाल में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने अपने-अपने घोषण-पत्रों में ऐसे वादे किए जो न्यूज़ीलैंड में की गई आर्थिक पहल से कुछ-कुछ मिलते-जुलते हैं. भाजपा ने जहां अपने चुनावी संकल्प-पत्र में कृषि क्षेत्र में 25 लाख करोड़ रुपये का निवेश करने और 2022 तक सभी बेघरों को घर देने का वादा किया तो वहीं कांग्रेस ने किसानों को संकट से उबारने के लिए अलग से ‘किसान बजट’ बनाने की घोषणा की. इसके अलावा उसने सरकार बनने पर देश में ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को सीधे आर्थिक मदद देने का एलान किया था. इस न्यूनतम आय योजना के विरोध में उठे सवालों के जवाब में पार्टी ने कहा था कि वह देश के अमीर वर्ग पर ज़्यादा टैक्स लगाकर इस योजना को लागू करेगी.