छह जून को आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट यानी 0.25 फीसदी की कटौती की. अर्थ जगत के जानकार एमपीसी की पिछली दो बैठकों में आरबीआई के ग्रोथ पर जोर देने वाले रूख के चलते मान भी रहे थे कि यह कटौती हो सकती है. एमपीसी ने ब्याज दरों में कटौती कर बाजार को यह साफ संकेत दे दिया है कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती को देखते हुए फिलहाल उसकी क्रेडिट पॉलिसी महंगाई के बजाय आर्थिक वृद्धि को मदद करने वाली ही रहेगी.

आरबीआई की ब्याज दरों में लगातार तीसरी कटौती के बाद उसकी नीतिगत दर 5.75 फीसद पर आ चुकी है. यह नौ साल में ब्याज की सबसे कम दर हैं. लेकिन, सवाल उठता है कि क्या ब्याज दरों में यह कटौती अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए पर्याप्त होगी?

अर्थव्यवस्था के जानकारों में इस सवाल को लेकर मतभेद हैं. लेकिन, अगर संकेतों की बात की जाए तो आरबीआई की इस कटौती से शेयर बाजार बहुत खुश नहीं दिखा. रेट कट की खबर आने पर आमतौर पर शेयर बाजार उछाल मारते हैं. लेकिन एमपीसी द्वारा तीसरी बार 25 बेसिस प्वाइंट की कटौती किये जाने पर ऐसा कोई उत्साह नहीं देखा गया बल्कि सेंसेक्स 550 से ज्यादा अंक लुढ़क गया.

जानकार मानते हैं कि शेयर बाजार को यह अनुमान तो था ही कि ब्याज दरों में कुछ न कुछ कटौती की जाएगी, लेकिन उसे इस मामले में आरबीआई से कुछ ज्यादा ही आक्रामक रवैये की उम्मीद थी. वह मान रहा था कि रेट कट 50 बेसिस अंक तक हो सकता है.

दरअसल सस्ते कर्ज और उसके सहारे आर्थिक वृद्धि की कोशिश में एक बहुत बड़ा पेंच है. आरबीआई तो रेपो रेट घटाकर बैंकों के लिए कर्ज सस्ते कर देता है, लेकिन इन सस्ते कर्जों का फायदा आम उपभोक्ता तक उतनी आसानी से नहीं पहुंच पाता है. अपनी पिछली दो एमपीसी बैठकों में आरबीआई ने आधा फीसदी ब्याज दर घटाई. लेकिन बैंक के आम उपभोक्ता को इस कटौती का सिर्फ 0.15 फीसद से 0.21 फीसद तक ही लाभ मिला. जानकार मानते हैं कि ऐसा होने की वजह से सस्ते कर्ज और उससे आर्थिक वृद्धि को रफ्तार मिलने की बात आंशिक तौर पर ही सच साबित हो सकती है.

एमपीसी की बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी इस बात को माना और बैंकों से ब्याज में कटौती का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाने की बात कही. लेकिन, इस बारे में आरबीआई ने बैंकों पर सख्ती के फिलहाल कोई संकेत नहीं दिए हैं. बैंक अभी इंटरनल बेंचमार्क के बजाय आरबीआई द्वारा निर्धारित होने वाले एक्सटर्नल बेंचमार्क पर अपनी ब्याज दरें तय करने को तैयार नहीं है. अगर ऐसा हो जाए तो रेपो रेट में कटौती का असर सीधे कर्ज की दरों पर दिखने लगेगा. फिलहाल आरबीआई ने बैंक दरों की निगरानी की बात ही कही है. लेकिन इसका कितना असर होता है, यह देखने वाली बात होगी.

जानकार मान रहे हैं कि आरबीआई के निर्देशों का सरकारी बैंकों पर तो थोड़ा असर दिख सकता है, लेकिन प्राइवेट बैंकों की ब्याज दरें घटने में काफी समय लग सकता है. इसके अलावा रेट कट का फायदा अगर होगा भी तो नया कर्ज लेने वालों को होगा. पुराने कर्जदारों को इसका कुछ खास लाभ होने की संभावना न के बराबर है. यानी कि कर्ज की दर इतनी कम होगी नहीं कि लोग इसके प्रति ज्यादा आकर्षित हों और जिन्होंने पहले से कर्ज लिए हैं उनके हाथों में इस कमी की वजह से कोई अतिरिक्त धन बचा नहीं रहने वाला. ऐसे में रेपो रेट में कमी की वजह से अर्थव्यवस्था को गति मिलने की उम्मीद ज्यादा सही नहीं लगती है.

लगातार घटती ब्याज दरों का एक पक्ष और भी है. कर्ज सस्ते होने के कारण बैंक अपनी जमा योजनाओं पर देने वाले ब्याज को भी घटा सकते हैं. यानी रेपो रेट कम होने से आपकी ईएमआई में कमी हो न हो बैंक में जमा धन पर मिलने वाले आपके ब्याज में कमी जरूर हो सकती है. आम उपभोक्ताओं - और खासकर उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए जो जीविका के लिए अपनी बचत पर निर्भर होते हैं - यह बिना दिये या एक हाथ से देकर और दूसरे हाथ से ले लेने वाली बात है.

ऐसी स्थिति में बैंकों की मुसीबत बढ़ भी सकती है. वे पहले से ही नगदी के भयानक संकट से जूझ रहे हैं और अगर उन्होंने जमा योजनाओं की ब्याज दरों में कटौती की तो ग्राहक उनसे छिटक भी सकता है. इसके चलते बैंकों के सामने नगदी का संकट और गहरायगा. जिसे आर्थिक वृद्धि के लिहाज से अच्छा नहीं माना जा सकता है.

आरबीआई को भी बाजार से लेकर बैंक तक गहरे नगदी संकट का अंदाजा है. इसके चलते उसने अर्थव्यवस्था के प्रति अपने रुख को न्यूट्रल से लचीला कर दिया है. ऐसा करके उसने यह संकेत दिया है कि वह बाजार में नगदी की कमी नहीं आने देगा. लेकिन इसके लिए वह ब्याज दरों में कमी के अलावा और क्या करेगा, इसका बहुत साफ संकेत उसने नहीं दिया है. आरबीआई गवर्नर ने इसके लिए ओपन मार्केट आपरेशंस (ओएमओ) के जरिये बाजार में पैसे डालने का इशारा दिया है. लेकिन ऐसा तो वह पहले भी करता रहा है. इसलिए भी बाजार के जानकार आरबीआई के रूख में इस बदलाव को लेकर बहुत उत्साहित नहीं दिखते.

इस समय अर्थव्यवस्था पिछले पांच साल के सबसे निचले स्तर पर है और चौथी तिमाही में यह महज 5.8 फीसद की दर से बढ़ी है. आरबीआई ने भी अपनी जीडीपी का अनुमान घटाकर 7.2 से सात फीसद कर दिया है. यानी कि देश के सामने इस समय सबसे बड़ी चिंता रोजगार और विकास दर ही हैं.

आर्थिक जानकार मानते हैं कि इस स्थिति में आरबीआई मौद्रिक नीति के सहारे अर्थव्यवस्था को गति देने की कोशिश कर रहा है. लेकिन इसकी भी अपनी सीमा है. सरकार को अर्थव्यवस्था में जान लाने के लिए मौद्रिक नीति से आगे जाकर कुछ और ठोस और मूलभूत उपाय भी करने होंगे. इसकी सबसे पहली परख नई सरकार के आने वाले बजट में होगी. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों दो कैबिनेट समितियों का गठन किया हैं.