आनंद हिंगोरानी के आग्रह पर महात्मा गांधी ने 1944 से 1946 तक हर दिन कोई न कोई विचार एक बड़ी सी डायरी में अंकित किया. भारत सरकार के पब्लिकेशन्स डिवीज़न ने इन विचारों को ‘बापू के आशीर्वाद : रोज़ के विचार’ नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित किया. उसमें गांधी जी की अपनी हस्तलिपि में हर विचार दिया गया है, उसके छपे रूप और अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ. लगभग 700 पृष्ठों की इस पुस्तक का जो संस्करण मेरे पास है पांचवांं है और सन 2000 का है. उसमें से कुछ विचार नीचे हैं-

‘पवित्रता बाहर की रक्षा मांगती ही नहीं है.’

‘लोक की निंदा से जो डरता है वह महत्व का काम नहीं कर सकेगा.’

‘आदमी अपने भीतर की आवाज़ को कभी न दबाये भले ही वह अकेला हो.’

‘जिह्वा कर्जा नहीं भरती, लेकिन कार्य ही भरता है.’

‘अगर भीतरी बत्ती जले तो सारे जगत को प्रकाश देती है.’

‘रोज़ मरने से बेहतर है कि एक ही दफ़ा मरना.’

‘भीतर साफ़ है तो बाहर होना ही है.’

‘जब मनुष्य आकाश के नीचे सोता है तो उसे कौन लूट सकता है?’

‘जो मनुष्य अपने दुःखों को गाता है, वह उन्हें चौगुना करता है.’

‘जो बहुत गिनती करता है, वह आत्मदर्शन नहीं कर सकता.’

‘मनुष्य की शांति की कसौटी समाज में ही हो सकती है, हिमालय की चोटी पर नहीं.’

‘मनुष्य ईश्वर को पूजे और मनुष्य का तिरस्कार करे, यह बनने लायक नहीं है.’

‘एक चोरी करता है, एक चोरी में मदद करता है, एक चोरी का इरादा करता है. तीनों चोर हैं.’

‘किसी के झूठ बनाने से तुम झूठे नहीं बनते अगर तुम सच्चे हो.’

‘जैसे हमारी पीठ दूसरा आदमी ही देखता है हम नहीं, ऐसे ही हमारे दोष भी हम नहीं देखते.’

‘जो जीवन के सुर में चलता है, उसे कभी थकान नहीं होगी.’

‘विरोध आदमी को बनाता है.’

‘सत्य ऐसी चीज़ है जो कहने में आदमी को बार-बार सोचकर बोलना पड़ता है.’

‘हम किसी से बेहतर नहीं हैं- इस विचार में सत्य भरा है, नम्रता है.’

‘सौन्दर्य चेहरे के रंग में नहीं है लेकिन सत्य में है.’

‘सब अपने समय पर वृद्ध होते हैं. एक तृष्णा हमेशा युवा ही रहती है.’

‘कहते हैं घर जलाकर तीर्थ नहीं होता. सही यह है कि घर जलाकर ही तीर्थ होता है.’

‘एक वचन भी सत्य है तो काफ़ी है. करोड़ के पास शैतान है. तो एक करोड़ से डरें?’

वैभव और लालित्य

हमारे समय में ध्रुपद बहुत लोकप्रिय नहीं है पर, कुछ ज़िद के साथ, दृश्य पर सक्रिय है. ख़याल गायकी के श्रोता और प्रशंसक ध्रुपद से कई गुना अधिक हैं. हाल में रज़ा फ़ाउंडेशन द्वारा दिल्ली में आयोजित ‘ध्रुपद वैभव’ में इस दुस्साध्य शैली के वितान का जो साक्ष्य मिला वह बहुत आश्वस्तिकर है. तीन दिनों में फैले आयोजन में अधिकांश गायक-वादक युवा थे, वरिष्ठ दो ही थे. एकल प्रस्तुति 6 युवा संगीतकारों की थी और ज़्यादातर संगतकार पखावज पर युवा ही थे.

ध्रुपद में शुद्धता और प्रामाणिकता का ख़ासा आग्रह होता है. यह देखना-सुनना बहुत प्रीतिकर था कि लगभग हरेक युवा ध्रुपदिये ने अपनी शिक्षा को आत्मसात् कर अपनी शैली की प्रामाणिकता बरक़रार रखी है. इन प्रस्तुतियों में ओज, ऊर्जा, तैयारी, लौ-लपक, समझ, कल्पना सभी मिले-जुले थे. हरेक कलाकार को पर्याप्त समय नहीं मिला पर जितना मिला उसमें हरेक ने सुगठित और सुकल्पित, सुशिक्षित प्रस्तुति दी. हरेक के पास अपने घराने का उचित अभिमान था और हरेक की परम्परा के प्रति विनयशीलता भी स्पष्ट थी. शुरूआत ही दो गायिकाओं से हुई. ध्रुपद कुछ इस क़दर पौरुष भाव से जुड़ा रहा है कि उसमें गायिकाएं कम ही हुई हैं. पर अब स्थिति में सुखद परिवर्तन हो रहा है.

शास्त्रीय कलाओं में यह मुद्दा हमेशा ज़ेरे बहस रहा है कि उसमें कितनी परम्परा हो और कितनी प्रयोग की जगह बने. बिना प्रयोग के परम्परा, वैसे, आगे नहीं बढ़ सकती. स्वयं एक बानी, उदाहरण के लिए डागर बानी में अगर उसके विख्यात गुरुओं को देखें तो स्पष्ट है कि उसमें हरेक के व्यक्तित्व के अनुरूप परिवर्तन भी हैं, भिन्नताएं भी. संगीत और नृत्य में परंपरा के निर्वाह में भी परिवर्तन होते चलते हैं जिन्हें अकसर हम ठीक से हिसाब में नहीं लेते. इसी समारोह में उस्ताद ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर से सीधे शिक्षा पाये शिष्यों में सुखद और मोहक भिन्नता थी जैसे कि दरभंगा के मलिक घराने के शिष्यों के गायन में भी.

दोपहर को संगीत-सभा के पहले आयोजित एक सत्र में ध्रुपद की वर्तमान स्थिति पर खुली चर्चा हुई जिसमें अवांछनीय परिवर्तनों, बानियों के घालमेल, ध्रुपद का अन्य कलारूपों से कम संवाद, उसके वैभव के बावजूद रसिकता की क्षीणता आदि पर बातचीत हुई. यह मत भी रसिकता की ओर से सशक्त ढंग से व्यक्त हुआ कि ध्रुपद का लम्बा आलाप उसका परिभाषक अंग है. उसमें आवाज़ का, बिना शब्द, बिम्ब या ताल का सहारा लिये, अमूर्तन विलक्षण है. शायद वह संसार के किसी भी अन्य संगीत से अद्वितीय भी है. यह अमूर्तन ही उसे यूरोप, अमरीका और कुछ एशियाई अंचलों में गंभीरता से सुने जाने की वृत्ति प्रोत्साहित कर रहा है.

रज़ा फ़ाउण्डेशन ने ‘ध्रुपद वैभव’ को एक वार्षिक आयोजन बनाने की घोषणा की है। यह निश्चय ही इस दुर्लभ शैली का एक विविध मंच बन कर उभर सकेगा.

नामवर विवाद

नामवर सिंह के देहावसान के बाद उनके मूल्यवान् अवदान को उचित ही व्यापक रूप से याद किया जा रहा है. उसमें कुछ भावुक अतिरेक भी, कहीं-कहीं है और यहां-वहां तथ्यों की अनदेखी भी. एकाध वरिष्ठों ने उन्हें धूमिल और विनोद कुमार के साहित्य की पहचान कराने का श्रेय दिया है. अब जहां तक याद आता है उन्होंने अपने एक स्तम्भ में धूमिल की एक कविता पर टिप्पणी की थी, विस्तार से उन पर कभी लिखा नहीं. ससंकोच याद दिलाना पड़ रहा है कि धूमिल पर पहला निबंध मेरा ही है. यही बात विनोद कुमार शुक्ल के बारे में भी सही है. उनका पहला कविता संग्रह ‘लगभग जयहिन्द’ ‘पहचान’ में प्रकाशित हुआ था. मेरे संपादन में ‘पूर्वग्रह’ एक एक विशेषांक भी विनोद जी पर निकला और उनकी कविता पर पहला निबंध मैंने ही लिखा था. नामवर जी ने उन पर भी विधिवत कभी लिखा नहीं. वे दोनों के निश्चय ही प्रशंसक थे और इसलिए उन्हें श्रेय देना उचित ही है.

एक वरिष्ठ अध्यापक-आलोचक ने बताया है कि ‘नामवर जी ने अपने अंतिम दिनों में किसी की भी सहायता लेने से मना कर दिया था. और वे अकेलेपन से खुद लड़ना चाहते थे.’ वे मार्क्स को याद करने के बाद लिखते हैं कि ‘यहां यह याद दिलाना वाजिव होगा कि निर्मल और अज्ञेय ने इस अकेलेपन को ‘आत्मा का साइलेंस ज़ोन’ माना था जिसमें उन्हें सार्थकता मिलती थी. वे उससे लड़ना नहीं चाहते थे. वे उसे सार्थकता के लिए वरदान मानते थे. सो नामवर जी अकेलेपन को समाज के ऐतिहासिक विकास का तथ्य मानते थे. अनिवार्य मानते थे. लेकिन उससे लड़कर और समाज को बदलकर ही मानव-मुक्ति को पाया जा सकता है.’ इस स्थापना का साक्ष्य कुछ भी नहीं है. अपनी मृत्यु से अकेले जूझकर नामवर जी ने भवमुक्ति तो पाली पर यह मानव-मुक्ति कैसे हुई? अज्ञेय और निर्मल वर्मा ने अकेलेपन से अपने तर्क जूझते हुए महत्वपूर्ण साहित्य रचा और मुक्ति को भी अलग-अलग ढंग से समझा-समझाया. नामवर जी ने अकेलेपन से अपने संघर्ष से तो ऐसा कुछ किया हो इसका कोई प्रमाण तो नहीं है. अगर अपने अंतिम दिनों में वे कुछ लिख रहे थे तो उसे सामने आना बाक़ी है.

नामवर जी के तथाकथित इतिहास-बोध को स्थापित करने के लिए उन्हीं की पुरानी युक्ति याने लगे हाथ अज्ञेय-ध्वंस की बासी पड़ गयी युक्ति का इस्तेमाल किया गया है. कहते हैं, ‘अज्ञेय जी ने तो इतिहास को नर्क मानकर प्रगतिशील दृष्टिकोण की कोख (इतिहास) को ही नकार दिया. यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है कि नामवर जी ने इतिहास की स्वीकृति के कारण निर्मल और अज्ञेय के महत्व को स्वीकार किया.’ शायद अपेक्षा यह है कि ‘इतिहास-विरोधी’ निर्मल और अज्ञेय को नामवर जी का इस योगदान के लिए कृतज्ञ होना चाहिये. दुर्भाग्य से यह सब मरणोत्तर व्यापार ही होगा क्योंकि अब तीनों दिवंगत हैं. अज्ञेय की मृत्यु के कई बरस बाद उनकी जन्म-शती के अवसर पर अज्ञेय को नामवर जी ने, बिना अपने कम से कम चालीस वर्षों लम्बे विरोध का ज़िक्र किये, इस दौर का सबसे बड़ा कवि कहा. यह साहित्य के इतिहास की अपनी स्वीकृति के कारण हुआ या नामवर जी की इतिहास चेतना ने उनसे यह कराया?

नामवर जी की तरह अज्ञेय और निर्मल भी इतिहास-बोध से संपन्न थे. तीनों के ये बोध एक-दूसरे से अलग थे. नामवर-बोध समाज-बोध था और दूसरे ऐसे नहीं थे यह समझ इतनी भोंथरी है कि दयनीय और हास्यास्पद एक साथ लगती है. यह न भुला दें कि नामवर जी ने, अपने इतिहास-बोध के रहते और समाज-निष्ठा से, आपातकाल का समर्थन किया था जबकि अज्ञेय और निर्मल वर्मा ने, अपने इतिहास-बोध के रहते,अपने अकेलेपन के प्रेम के बावजूद, आपातकाल का विरोध किया था.