साल 1995 में अमेरिका के पिट्सबर्ग शहर में एक दिलचस्प वाकया हुआ था जिसे मैकऑर्थर व्हीलर केस के नाम से जाना जाता है. हुआ यूं कि 44 साल के मैकऑर्थर व्हीलर ने कहीं पर लेमन जूस के रासायनिक गुणों के बारे में पढ़ा. उसने इसे गलत तरीके से समझा और यह निष्कर्ष निकाला कि लेमन जूस असल में एक अदृश्य स्याही की तरह काम करता है. व्हीलर का मानना था कि चेहरे पर लेमन जूस लगाने के बाद उसका चेहरा किसी भी सीसीटीवी फुटेज में नहीं आएगा.

इस बात से उत्साहित होकर व्हीलर ने पिट्सबर्ग के दो बैंकों में डाका डालने जैसी हरकत को अंजाम दे दिया. अगले ही दिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया. जब उसे सीसीटीवी फुटेज दिखाए गए तो वह इस बात पर चौंका हुआ था कि आखिर लेमन जूस लगाने के बाद भी उसका चेहरा फुटेज में आया कैसे? यह किस्सा शेक्सपीयर के इस कथन ‘एक मूर्ख खुद को बुद्धिमान और बुद्धिमान खुद को हमेशा अज्ञानी समझता है’ के पहले हिस्से को सही साबित करता है. लेकिन ऐसा क्यों होता है, इस बात की पड़ताल हम इस बार सिर-पैर के सवाल में करेंगे.

इस तरह की घटनाओं या प्रवृत्ति को मनोविज्ञान की भाषा में डनिंग-क्रूगर इफेक्ट कहा जाता है. यह कोई बीमारी, सिंड्रोम या किसी तरह की मानसिक समस्या नहीं है. यह प्रवृत्ति हमेशा से इंसानों में कम या ज्यादा मात्रा में मौजूद रही है.

मैकऑर्थर व्हीलर केस से प्रभावित अमेरिका की कॉरनेल यूनिवर्सटी के प्रोफेसर डेविड डनिंग और उनके सहयोगी जस्टिन क्रूगर ने मनुष्य के इस व्यवहार पर शोध कर डाला. साल 1999 में जरनल ऑफ पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकोलॉजी में उनका एक पत्र भी प्रकाशित हुआ. इसमें सुकरात के कथन ‘असली बुद्धिमत्ता यह जानना है कि आपको कुछ भी नहीं पता है’ को आधार बनाकर किए गए एक शोध का जिक्र था. इस शोध के दौरान लोगों के ह्यूमर, ग्रामर और लॉजिक पर आधारित कई टेस्ट लिए गए थे लेकिन इसके पहले उनसे इन विषयों में उनकी कुशलता पूछी गई थी. इस शोध के दौरान पता चला कि वे लोग जो अपेक्षाकृत कम जानते थे, अपनी क्षमताओं को कई गुना ज्यादा आंक रहे थे. यहां तक कि दस प्रतिशत अंक पाने वाले भी पहले यह दावा कर चुके थे कि वे उस विषय के बारे में 70 फीसदी बातें जानते हैं.

प्रोफेसर डनिंग इसे कुछ इन शब्दों में समझाते हैं, ‘दरअसल किसी काम को करने के लिए जिस ज्ञान और बुद्धिमत्ता की जरूरत होती है, उसी की जरूरत इस बात का अंदाजा लगाने के लिए भी होती है कि कोई काम कितने अच्छे से किया गया है.’ कहने का मतलब यह कि अगर कोई व्यक्ति इतना अक्लमंद नहीं है कि वह कोई काम कर सके तो वह इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि उसने दिया गया काम कितने अच्छे से किया है. ऐसे में अक्षम या अज्ञानी लोगों के सामने एक कभी न खत्म होने वाला चक्र शुरू हो जाता है. वे कोई काम (बुरी तरह से) करते हैं फिर उन्हें लगता है कि वे इसके माहिर हैं और वे बार-बार इसे दोहराते रहते हैं. इस तरह के लोगों को उनकी खामियां समझाना लगभग नामुमकिन होता है.