नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब दूसरी बार केंद्र में सरकार बनने की प्रक्रिया शुरू हुई तो हर तरफ यही चर्चा चली कि उनके पहले कार्यकाल में वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली नई सरकार में नहीं शामिल हो पाएंगे. मंत्रिमंडल गठन के एक दिन पहले अरुण जेटली की ओर से एक पत्र भी सार्वजनिक हुआ. इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि अपने खराब स्वास्थ्य की वजह से वे नई सरकार में शामिल नहीं होना चाहते.

यह साफ होते ही कि अरुण जेटली नई सरकार में शामिल नहीं होंगे, नए वित्त मंत्री को लेकर चर्चा होने लगी. अधिकांश लोगों का मानना था कि पीयूष गोयल वित्त मंत्री बनाए जाएंगे. ऐसा इसलिए माना जा रहा था कि वित्त वर्ष 2019-20 का अंतरिम बजट उन्होंने ही पेश किया था. यही नहीं, जब भी खराब स्वास्थ्य की वजह से अरुण जेटली इलाज कराने गए या वित्त मंत्रालय से दूर रहे तो अस्थायी तौर पर वित्त मंत्री का कार्यभार प्रधानमंत्री मोदी ने पीयूष गोयल को ही दिया था.

इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह लगभग तय माना जा रहा था कि अरुण जेटली के पीछे हटने की स्थिति में वित्त मंत्री पीयूष गोयल ही बनाए जाएंगे. उनकी दावेदारी मजबूत माने जाने के पीछे एक दूसरी वजह भी थी. प्रधानमंत्री के बाद जो चार प्रमुख मंत्री माने जाते हैं, उनमें गृह मंत्री, वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री हैं. नरेंद्र मोदी की नई सरकार में इनमें से दो मंत्रालय वित्त और विदेश खाली हो रहे थे. मोदी की पहली सरकार में विदेश मंत्री रहीं सुषमा स्वराज ने पहले से कह दिया था कि वे नई सरकार में शामिल नहीं होंगी.

चार मंत्रालयों में से खाली हो रहे दो मंत्रालयों के मुकाबले इनके दावेदारों में सिर्फ अमित शाह के नाम की चर्चा चल रही थी. ऐसे में पीयूष गोयल को बड़े चार मंत्रियों की लीग में शामिल होने के संदर्भ में दूसरा स्वाभाविक दावेदार बताया जा रहा था. हालांकि, शपथ ग्रहण के एक दिन पहले तक भाजपा में ही कुछ लोग ऐसे भी थे जो कह रहे थे कि संभव है कि पिछली सरकार में रेल मंत्रालय से हटाए जाने के बाद वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री के पद पर काम कर रहे सुरेश प्रभु को वित्त मंत्रालय दे दिया जाए.

सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजना निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्रालय से हटाकर विदेश मंत्रालय में ले जाने की थी. वे मौजूदा विदेश मंत्री एस जयशंकर को विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाना चाहते थे. लेकिन जयशंकर इसके लिए तैयार नहीं हो रहे थे. इस बीच जब अरुण जेटली ने स्पष्ट कर दिया कि वे मंत्री नहीं बनेंगे तो ऐसा लगने लगा कि पीयूष गोयल के वित्त मंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया.

लेकिन यहां अड़चन यह आने लगी कि अगर जयशंकर को विदेश मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री बनाना है तो फिर निर्मला सीतारमण को किस मंत्रालय में ले जाया जाए. सूत्रों के मुताबिक पहले ही राजनाथ सिंह को लोकसभा अध्यक्ष बनाने की योजना नाकाम हो गई थी क्योंकि खुद उन्होंने इसके लिए मना कर दिया था. इसके बाद योजना बनी कि उन्हें रक्षा मंत्री और अमित शाह को गृह मंत्री बनाया जाएगा.

इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शपथ ग्रहण के एक दिन पहले अरुण जेटली से मिलने उनके घर गए. भाजपा सूत्रों का दावा है कि इस बैठक में प्रधानमंत्री की ओर से अरुण जेटली से आग्रह किया गया कि वे बगैर किसी पोर्टफोलियो के कैबिनेट मंत्री बनें. योजना यह थी कि उनका शपथ ग्रहण अलग से राष्ट्रपति भवन में करा दिया जाएगा. पहले भी जब अरुण जेटली अमेरिका इलाज कराने गए थे तो उनके मंत्रालय का प्रभार पीयूष गोयल को दिया गया था और जेटली को प्रधानमंत्री ने बगैर पोर्टफोलियो का मंत्री बनाए रखा था. इस बार भी यही योजना बनी थी. लेकिन अरुण जेटली अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर बगैर पोर्टफोलियो के मंत्री बनने के लिए भी तैयार नहीं हुए.

भाजपा सूत्रों की मानें तो अरुण जेटली को तैयार होता न देख प्रधानमंत्री ने उनसे नए वित्त मंत्री के लिए सलाह मांगी. इस पर जेटली ने पीयूष गोयल का नाम नहीं लिया. उन्होंने प्रधानमंत्री से निर्मला सीतारमण के लिए पैरवी की. बताया जा रहा है कि अरुण जेटली ने यह भी कहा कि वाणिज्य और उद्योग मंत्री के तौर पर काम करने की वजह से निर्मला सीतारमण के पास वित्तीय क्षेत्र का पर्याप्त अनुभव है और वे इस पद के लिए अधिक उपयुक्त होंगी.

भाजपा के लोग दावा कर रहे हैं कि जेटली के इस सुझाव को टालना प्रधानमंत्री के लिए आसान नहीं था. इसके बाद उन्होंने पीयूष गोयल की जगह निर्मला सीतारमण को नया वित्त मंत्री बनाने का निर्णय लिया. हालांकि, वित्त मंत्री नहीं बन पाए पीयूष गोयल को नई सरकार में पहले की तरह रेल मंत्रालय तो मिला ही हुआ है, साथ ही उन्हें वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय भी मिल गया.