‘युवराज’ शब्द सुनते ही जेहन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती है जो अपनी सल्तनत में अपनी पूरी मनमर्जी और स्वछंदता के साथ रहता हो. अगर हम क्रिकेट को सल्तनत मानें तो दुनिया के उन तमाम खिलाड़ियों में युवराज सिंह सबसे ऊपर नजर आते हैं जिन्होंने इस सल्तनत में एक युवराज की तरह ही अपनी धाक जमाई. ऐसी घटनाओं की एक लंबी फेहरिस्त है जो युवराज सिंह की इस छवि के बारे में बताती हैं.

एक साक्षात्कार में युवराज खुद क्रिकेट के अपने शुरूआती दौर की घटना के बारे बताते हुए कहते हैं, ‘मैं हिमाचल प्रदेश के ‘चैल’ में बिशन बेदी के कैंप में ट्रेनिंग ले रहा था. जब मैंने इस मैदान में अपने जीवन का पहला शतक जड़ा तो बेदी ने खिलाड़ियों के छक्के मारने पर ही बैन लगा दिया. पाजी ने कहा कि अब से छक्का मारने का मतलब आउट माना जाएगा. क्योंकि ‘चैल’ में अगर आप गेंद मैदान से बाहर मारते हो तो गेंद हज़ारों फुट नीचे घाटी में पहुंच जाती थी और तब इस गेंद की कीमत करीब 300 रुपये थी.’ युवराज कहते हैं कि तब बिशन सिंह बेदी मेरी छक्के मारने की आदत से परेशान हो गए थे.

बिशन सिंह बेदी के कैंप से निकलने के बाद युवराज सिंह ने दुनियाभर के गेंदबाजों को अपनी इस आदत के चलते करीब दो दशक तक परेशान किया. उनकी जिस पारी को दुनिया भर में सबसे ज्यादा याद किया जाता है वह भी एक ओवर में छह छक्के मारने वाली पारी ही है.

लेकिन, पंजाब के इस बल्लेबाज की कई ऐसी पारियां भी हैं जो इस खेल में उनके धैर्य और एकाग्रता के बारे में भी बताती हैं. और इन पारियों के चलते भारतीय क्रिकेट ने उन उपलब्धियों को हासिल किया जो उसकी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती हैं. यहां हम भारतीय क्रिकेट की उन स्वर्णिम उपलब्धियों का जिक्र कर रहे हैं जिन्हें युवराज सिंह के बिना हासिल करना शायद मुमकिन न हो पाता.

नेटवेस्ट सीरीज 2002

2002 में नेटवेस्ट सीरीज में भारत की जीत को क्रिकेट इतिहास में उसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है. यह वनडे सीरीज भारत, श्रीलंका और इंग्लैंड के बीच खेली गई थी. लंदन के लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में इस सीरीज के फाइनल में भारत का मुकाबला इंग्लैंड से था. टॉस जीतकर इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाजी का फैसला किया. मार्कस ट्रेस्कोथिक (109) और कप्तान नासिर हुसैन (115) की शतकीय पारियों के दम पर इंग्लैंड ने 325 रन बना दिए.

उन दिनों 300 से ज्यादा का स्कोर बड़ी बात मानी जाती थी. लेकिन, भारतीय टीम ने जब शानदार शुरुआत की तो जीत की उम्मीद जगी. सौरव गांगुली (60) और वीरेंद्र सहवाग (45) ने मिलकर 106 रनों की साझेदारी कर टीम इंडिया को अच्छी शुरुआत दिलाई. लेकिन इन दोनों के आउट होते ही भारतीय टीम ने दिनेश मोंगिया (9), सचिन तेंदुलकर (14) और राहुल द्रविड़ (5) के विकेट महज 40 के अंदर ही खो दिए.

146 रनों पर पांच विकेट होने के बाद भारतीय टीम की जीत लगभग असंभव मानी जा रही थी. लेकिन इसके बाद युवराज सिंह और मोहम्मद कैफ ने जो किया वह किसी चमत्कार से कम नहीं था. इन दोनों ने मिलकर 121 रनों की साझेदारी की और इंग्लैंड के मुंह से जीत छीन ली. युवराज ने 63 गेंदों में 69 रनों की पारी खेली जबकि मोहम्मद कैफ 87 रन बनाकर नाबाद लौटे.

यह जीत भारत के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से काम नहीं थी क्योंकि इस सीरीज से पहले उसे इसके दावेदारों में नहीं गिना जा रहा था. इसकी वजह भी थी, इससे पहले भारत ने इंग्लैंड में सात द्विपक्षीय एकदिवसीय सीरीज खेली थीं, लेकिन महज एक में ही उसे जीत हासिल हुई थी.

नेटवेस्ट सीरीज में भारतीय टीम को मिली जीत को जब भी याद किया जाता है तो एक और घटना भी इसके साथ जुड़ती है. फाइनल मुकाबले में मोहम्मद कैफ के विजयी रन लेते ही लॉर्ड्स की बालकनी में बैठकर मैच देख रहे कप्तान सौरव गांगुली ने अपनी शर्ट उतारकर हवा में लहरा दी थी. उस समय यह घटना भी काफी चर्चा में रही थी.

टी20 विश्व कप 2007

2007 में दक्षिण अफ्रीका में हुआ टी20 विश्व कप फटाफट क्रिकेट संस्करण का पहला विश्व कप था. इस टूर्नामेंट में भारत से ज्यादा उम्मीदें नहीं लगाई जा रहीं थी क्योंकि एक तो सभी वरिष्ठ खिलाड़ियों के इनकार के बाद भारतीय टीम इस टूर्नामेंट में एकदम नए खिलाडियों के साथ उतर रही थी. दूसरा, इस विश्व कप से पहले भारतीय टीम ने महज एक टी20 मुकाबला ही खेला था.

लेकिन इस विश्व कप में भारतीय टीम ने जबरदस्त प्रदर्शन किया. उसे इस विश्व कप में केवल एक मैच में ही हार का सामना करना पड़ा. हालांकि, इस विश्व कप में कई भारतीय खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन युवराज सिंह एक ऐसे खिलाड़ी थे जिनकी बल्लेबाजी यादगार बन गयी थी. ख़ास यह भी है कि इस टूर्नामेंट में युवराज ने केवल दो ही बड़ी पारियां खेली थीं, लेकिन इनकी वजह से हुई भारतीय टीम की जीत ने इस विश्व कप में भारत का दबदबा बना दिया था.

युवराज ने इंग्लैंड के खिलाफ लीग मैच में 16 गेंदों पर 58 रन की पारी खेली. डरबन के किंग्समीड मैदान पर खेली गयी उनकी इस पारी ने उस समय दुनिया भर में तहलका मचा दिया था. इस पारी के दौरान उन्होंने इंग्लैंड के तेज गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड के एक ओवर में छह छक्के जड़े थे और महज 12 गेंदों में ही अर्ध शतक पूरा कर लिया था. यह एक ऐसा रिकॉर्ड है जिसे आज तक कोई नहीं छू पाया है.

इस टूर्नामेंट में युवराज ने दूसरी अहम पारी सेमीफाइनल में विश्व कप की प्रबल दावेदार मानी जा रही ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेली थी. इस मुकाबले में युवराज ने पांच चौकों और पांच छक्कों की मदद से 30 गेंदों पर 70 रन बनाए थे. युवराज की इस पारी के चलते ही दिग्गजों से सजी ऑस्ट्रेलिया की विश्व कप से विदाई हुई और भारत ने फाइनल में प्रवेश कर लिया था.

विश्व कप 2011

2007 से लेकर 2011 विश्व कप तक का समय वह समय था जब युवराज सिंह अपने क्रिकेट करियर के शिखर पर थे. विश्व कप जीतने के लिए भारतीय टीम को ऐसे ही खिलाड़ियों की जरूरत भी थी. शानदार फॉर्म में चल रहे युवराज ने इस विश्व कप में न सिर्फ बल्ले से बल्कि गेंद से भी अहम मौकों पर टीम को संकट से निकाला. क्वार्टर फाइनल मुकाबले में उनके हरफनमौला प्रदर्शन ने ही तीन बार की विश्व चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था.

इस विश्व कप में भारत के लिए युवराज सिंह कितने अहम थे, इसका पता इस बात से चलता है कि उन्हें इस टूर्नामेंट में चार बार ‘मैन ऑफ़ द मैच’ चुना गया था. पूरे विश्व कप में कुल 362 रन और 15 विकेट लेने के लिए उन्हें इस टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी चुना गया था. वह किसी एक विश्व कप में बल्ले से 300 से ज्यादा रन बनाने और गेंदबाजी में 15 विकेट लेने वाले दुनिया के इकलौते खिलाड़ी भी बन गए. गौर करने वाली बात यह भी है कि क्रिकेट की दुनिया के इस युवराज ने यह सब कुछ तब किया था जब उनके शरीर में कैंसर पनप रहा था.

इस विश्व कप का हिस्सा रहे भारत के पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘विश्व कप जैसा बड़ा टूर्नामेंट किसी एक या दो खिलाड़ियों की दम पर जीता ही नहीं जा सकता. जरूरत पड़ने पर भारतीय टीम के सभी खिलाड़ियों ने प्रयास किया और अपना योगदान दिया...लेकिन युवराज सिंह के बिना यह विश्व कप जीतना शायद संभव नहीं हो पाता.’

युवराज सिंह भी अपने पूरे करियर में 2011 विश्व कप में किए गए अपने प्रदर्शन को ही सबसे बेहतर मानते हैं. क्रिकेट को अलविदा कहने के दौरान सोमवार को उन्होंने कहा भी, ‘देश के लिए 2011 का विश्व कप जीतना, इसमें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना जाना और चार बार ‘मैन ऑफ़ द मैच’ का खिताब पाना, मेरे लिए किसी बड़े सपने जैसा था.’