भारतीय वायु सेना (आईएएफ़) एक के बाद एक ग़लत कारणों से चर्चा में बनी हुई है. हालिया समय की कुछ घटनाओं से उसकी कमज़ोरियां और कमियां उजागर हुई हैं. इन घटनाओं के चलते या तो वायु सेना के अनमोल पायलटों और कर्मियों की जान गई है या उनकी जान को ख़तरा पैदा हुआ है. देश में सेनाओं के नाम पर हो रही राजनीति की वजह से इन कमियों पर चर्चा देखने को नहीं मिल रही. वहीं, रिपोर्टें बताती हैं कि वायु सेना भी इन्हें मानने से झिझक रही है.

बीते आठ दिनों से आईएएफ़ अपने लापता हुए एएन-32 विमान को लेकर सवालों के घेरे में रही है. हालांकि मंगलवार को इस विमान का मलबा अरुणाचल प्रदेश के लिपो में मिलने की ख़बर है. लेकिन इससे पहले इस विमान को खोजने के लिए आईएएफ़ को जिस तरह के प्रयास करने पड़े, वे एक बार फिर उससे सवाल करने पर मजबूर करते हैं.

एएन-32 ने बीती तीन जून को असम के जोरहाट से उड़ान भरी थी. उस समय उसमें चालक दल के आठ सदस्यों समेत कुल 13 लोग सवार थे. बाद में विमान का संपर्क ज़मीनी नियंत्रण कक्ष से टूट गया. उसे खोजने के लिए वायु सेना ने अपने कई विमानों को लगाया ही, साथ ही थल सेना, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), राज्य पुलिस और स्थानीय लोगों तक की मदद ली. लेकिन विमान नहीं मिला. इस दौरान आईएएफ़ लाचार-सी दिखी और उसे मजबूरन विमान की जानकारी देने वाले को पांच लाख रुपये देने का ऐलान करना पड़ा. इस बीच, ‘सेनाओं से सवाल नहीं किया जा सकता’, इस अघोषित नियम पर चलते हुए टेलीविज़न मीडिया में एक कार्यक्रम तो ऐसा भी दिखा जिसका शीर्षक था - ‘क्या एएन-32 को एलियन ले गए’.

लेकिन यह स्थिति क्यों बनी? इस संबंध में कुछ रिपोर्टें सामने आई हैं जो वायु सेना की कमियों की ओर इशारा करती हैं. दरअसल, 2009 में भारत ने अपने एएन-32 विमानों को अपग्रेड करने और उनके परिचालन की समयसीमा बढ़ाने के लिए यूक्रेन से एक समझौता किया था. इसके तहत अपग्रेड किए गए कई एएन-32 आरई विमानों में से 46 में उस समय के दो आधुनिक ईएलटी (विशेष ट्रांसमीटर) लगाए गए थे. लेकिन लापता हुआ विमान अपग्रेड नहीं किया गया था. यानी उसमें ये ट्रांसमीटर नहीं थे. एनडीटीवी के मुताबिक़ इस एएन-32 में ‘पुराना’ ‘सार्बे 8’ ट्रांसमीटर लगा हुआ था जिसका उत्पादन 2005 से ही बंद हो चुका है.

यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तीन साल पहले भी एक एएन-32 विमान ग़ायब हुआ था, जिसका आज तक पता नहीं चला. वह विमान चेन्नई से पोर्ट ब्लेयर जा रहा था. रास्ते में बंगाल की खाड़ी के आसपास वह लापता हो गया और कभी नहीं मिला. उस विमान में चालक दल के सदस्यों समेत 29 लोग सवार थे.

इससे पहले बालाकोट हवाई हमले के समय भी वायु सेना की कमी और कमज़ोरी सामने आई थी. पुलवामा आतंकी हमले के कुछ दिन बाद जब आईएएफ़ ने पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी कैंपों को निशाना बनाया तो भारत-पाकिस्तान के साथ पूरी दुनिया में तनाव पैदा हो गया. अचानक हुए इस हमले ने जहां पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार के लिए चुनौती खड़ी कर दी, वहीं भारत में सत्तारूढ़ दल भाजपा ने इसे ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह लोकसभा चुनाव के दौरान ख़ूब भुनाया.

लेकिन इस हमले से देश को नफ़ा-नुक़सान क्या हुआ, यह सवाल बालाकोट हवाई हमले के बाद मीडिया और भाजपा समर्थक वर्ग के मचाए हल्ले में दबकर रह गया. इस हमले के पक्ष-विपक्ष के समर्थन में कई दावे किए गए हैं. आलोचकों और विशेषज्ञों ने आतंकियों और उनके कैंपों को हुए सही-सही नुक़सान को लेकर सवाल पूछे हैं, जिनके वायु सेना ने अपने स्तर पर जवाब दिए हैं. लेकिन यह दावा आज भी नहीं किया जा सकता कि आख़िर 26 फ़रवरी को हुई उस कार्रवाई में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी कैंपों को कितना नुक़सान हुआ.

इसकी दो बड़ी वजहें हैं. पहली यह कि आईएएफ़ इस हमले से जुड़े ऐसे सबूत पेश नहीं कर पाई जिन पर आलोचक सीधे-सीधे सवाल न उठा सकें. इससे उन अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों को बल मिला जिनके मुताबिक़ बालाकोट हवाई हमले में आतंकी कैंपों को ख़ास नुक़सान नहीं पहुंचा था. आईएएफ़ ने कैंपों को हुए नुक़सान की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की थीं, लेकिन वह हमले की साफ़ तस्वीरें सार्वजनिक नहीं कर पाई. अब इसमें चूक कहां हो गई? इस सवाल के तार सीधे केंद्र सरकार या कहें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ते हैं.

लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बालाकोट हमले से जुड़े वायु सेना के अधिकारी और विशेषज्ञ 26 फ़रवरी को हमला करने के समर्थन में नहीं थे. प्रधानमंत्री ने ख़ुद कहा कि ख़राब मौसम की वजह से उन्हें मिशन की तारीख़ बदलने की सलाह दी गई थी. लेकिन उन्होंने इसे नहीं माना और उसी रात हमला करने को कहा. बाद में वायु सेना ने कहा कि 26 फ़रवरी की रात मौसम ख़राब होने की वजह से ही बालाकोट हवाई हमले की स्पष्ट तस्वीरें नहीं ली जा सकीं. ये तथ्य आईएएफ़ के फ़ैसले लेने की क्षमता पर सवाल खड़ा करते हैं.

उधर, बालाकोट हवाई हमले के चलते भारत को हुए नुक़सान स्पष्ट नज़र आते हैं. इस हमले के जवाब में पाकिस्तानी वायु सेना ने भारतीय हवाई क्षेत्र में घुसपैठ की थी. तब आईएएफ़ ने दुश्मन सेना के विमानों को खदेड़ दिया था. लेकिन इस दौरान दोनों तरफ़ का एक-एक लड़ाकू विमान गिरा दिया गया. उम्मीद के मुताबिक़ भारतीय मीडिया ने मिग-21 बाइसन द्वारा पाकिस्तान एफ़-16 को मार गिराए जाने का ख़ूब हल्ला मचाया. लेकिन यहां एक स्वभाविक सा सवाल है कि क्या हमारे मिग-21 बाइसन के मार गिराए जाने से हुए नुक़सान की भरपाई यह कहकर की जा सकती है कि हमने भी तो पाकिस्तान के एफ़-16 को मार गिराया था. कुछ का यह भी कहना है कि इस मामले में हम ज़्यादा नुक़सान में रहे, क्योंकि एफ़-16 की मिसाइल से मार गिराए जाने के बाद बाइसन उड़ा रहे विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को पाकिस्तान की सेना ने गिरफ़्तार कर लिया था.

हालांकि ख़ुद के बनाए दबाव और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की मदद से भारत दो दिन बाद ही अपने पायलट को वापस लाने में कामयाब रहा. इस पर विश्लेषण करने के बजाय मीडिया ने फिर ‘राष्ट्रवादी’ हल्ला मचा दिया. इससे यह बात गुम हो गई कि 27 फ़रवरी को वायु सेना को एक और बहुत बड़ा नुक़सान हुआ था, जिसके लिए पाकिस्तान नहीं, बल्कि वायु सेना ही ज़िम्मेदार थी.

दरअसल, 27 फ़रवरी को वायु सेना ने मिग-21 बाइसन के साथ एक एमआई-17 हेलीकॉप्टर भी खो दिया था. कई दिनों तक यह साफ़ नहीं हो सका कि यह हादसा कैसे हुआ. बिलकुल शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया कि पाकिस्तानी वायु सेना ने ही भारत के दो विमान गिरा दिए थे. लेकिन यह जानकारी सही नहीं थी. इसे ख़ारिज करते हुए कहा गया कि हेलीकॉप्टर का क्रैश होना एक हादसा था. लेकिन यह हादसा कैसे हुआ, इस सवाल पर चुनाव के चलते पूरे दो महीने चर्चा नहीं हुई.

चुनाव के बाद एक मीडिया रिपोर्ट सामने आई. इसमें कहा गया कि एमआई-17 वायु सेना की ही चूक की वजह से हादसे का शिकार हुआ था. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ यह घटना उसी समय की है जब नौशेरा में पाकिस्तानी और भारतीय विमानों के बीच हवाई संघर्ष चल रहा था. तब वायु सेना से अपना ही हेलीकॉप्टर पहचानने में ग़लती हुई और उसे पाकिस्तान का समझकर मिसाइल से निशाना बनाया गया था.

बता दें कि अपनी ही लापरवाही से हुई इस दुर्घटना में वायु सेना के छह जवानों के शहीद होने के अलावा एक आम नागरिक भी मारा गया था. शहीद जवानों में सार्जेंट विक्रांत सहरावत शामिल थे. आईएएफ़ ने उनका शव परिवार को सौंपते वक़्त बताया कि हादसे की वजह हेलीकॉप्टर में आई तकनीकी गड़बड़ी थी. जबकि सच्चाई कुछ और थी. बाद में शहीद के परिवार को इसका पता चला तो उन्होंने कहा कि उन्हें अंधेरे में रखकर धोखा दिया गया है. कुल मिलाकर यह ऐसा मामला था जिसमें वायु सेना ने अपने कर्मी के परिजनों को ही अंधेरे में रखने का काम किया था.