क़तर की गिनती दुनिया के सबसे अमीर देशों में होती है. तेल की आय ने उसे इतना धनी बना दिया है कि उसके 27 लाख निवासियों की - जो सभी उसके अपने नागरिक नहीं हैं - सालाना प्रति व्यक्ति औसत आय 60,804 अमेरिकी डॉलर बैठती है. भारत की अपेक्षा 30 गुने से भी अधिक.

कतर की 27 लाख की जनसंख्या में 20 लाख से अधिक विदेशी श्रमिक और कर्मचारी हैं. क़रीब साढ़े छह लाख तो अकेले भारत से वहां गये हैं. पड़ोसी देशों नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका के भी बहुत से लोग क़तर में रहते और काम करते हैं. पर, लगभग इन सभी लोगों का जीवन वहां के मूल अरब निवासियों जैसा सुखद नहीं है. इसके लिए किसी हद तक विश्व फुटबॉल संघ यानी फीफा भी उत्तरदायी है.

फ़ीफ़ा ने 19 दिसंबर 2008 को टोकियो में हुई अपनी बैठक में तय किया था कि 2018 और 2022 के विश्व कप के मेज़बान देशों का चयन एक साथ होगा. दो दिसंबर 2010 को स्विट्ज़रलैंड में ज्यूरिख स्थित फ़ीफ़ा के मुख्यालय में जब 2022 के मेज़बान देश के लिए मतदान की बारी आई, तो मुक़ाबला अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और क़तर के बीच था. मतदान के चौथे दौर में, आठ के बदले 14 मतों के स्पष्ट बहुमत के साथ क़तर ने बाज़ी मार ली. बाद में आरोप लगे कि उस समय फ़ीफ़ा की कार्यकारिणी के कुछ लोग क़तर के हाथों बिके हुए थे, तो कुछ दूसरे जर्मनी और फ्रांस की ओर से क़तर के पक्ष में वोट डालने के दबाव में थे. कई जांचें और गिरफ्तारियां भी हुईं, पर फ़ीफ़ा का निर्णय अटल रहा.

रेगिस्तानी देश क़तर में फुटबॉल की न तो कोई जानी-मानी परंपरा थी और न ही विश्व कप लायक कोई स्टेडियम. अपने पक्ष में निर्णय होते ही वहां के अमीर की सरकार ने, आग में हल जोतते हुए, स्टेडियमों और होटलों से लेकर हर प्रकार की आवश्यक सुविधाओं का तेज़ी से निर्माण शुरू कर दिया. निर्माण कार्य हेतु अन्य देशों से, विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप के देशों से, लाखों श्रमिकों को मनभावन वादों के साथ लाया गया.

सभी श्रमिक यही समझ रहे थे कि अपने देशों की ग़रीबी और बेरोज़गारी की मार से अब वे बच जायेंगे. घरवालों को पैसे भेज कर उनका जीवन भी सुखद बनायेंगे. वे जी-जान से काम करने लगे. पर, जल्द ही निराश भी होने लगे. उनके साथ छल-कपट हो रहा था. न सिर्फ उनके रहने और काम करने की परिस्थितियां बहुत अमानवीय थीं, उन्हें ठीक से वेतन या मज़दूरी भी नहीं मिलती थी. आये दिन दुर्घटनाएं होती थीं. सैकड़ों लोग मर रहे थे. पैसों के बदले उनके शव घरवालों के पास पहुंचने लगे थे. न तो क़तर के सरकारी अधिकारी कुछ देखना-सुनना चाहते थे, और न श्रमिकों की अपनी सरकारें.

कतरी कंपनियां भारत और नेपाल से मजूदरों को वहां बुलाते समय बहुत लुभावने वादे करती हैं
कतरी कंपनियां भारत और नेपाल से मजूदरों को वहां बुलाते समय बहुत लुभावने वादे करती हैं

उदाहरण के लिए, दोहा में भारतीय दूतावास ने फ़रवरी 2014 में बताया कि 2010 में वहां 233, 2011 में 239, 2012 में 237 और 2013 में 241 भारतीय श्रमिक मौत की गोद में समा गये. यानी 2013 के अंत तक अकेले भारत के हर महीने औसतन 20 श्रमिक कतर में मर रहे थे. अनेक नेपाली श्रमिकों के शव भी उनके घर पहुंच रहे थे. अनुमान है कि 2014 आने तक यहां कुल क़रीब 4000 विदेशी श्रमिकों की मृत्यु हो चुकी थी. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसकी काफ़ी चर्चा रही. क़तर की सरकार ने स्थिति में सुधार के आश्वासन दिये. स्थिति में शायद कुछ सुधार हुआ भी. लेकिन, इस बीच स्थिति फिर ढाक के तीन पात जैसी हो गई दिखती है.

जर्मनी में रेडियो-टेलीविज़न के सबसे बड़े सार्वजनिक नेटवर्क ‘एआरडी’ के एक टीवी कार्यक्रम में पांच जून को, आधे घंटे का एक रिपोर्ताज दिखाया गया. उसका अधिकांश हिस्सा छिपे हुए कैमरे द्वारा क़तर में काम कर रहे नेपाली श्रमिकों की दारुण दशा पर केंद्रित था. ‘एआरडी’ के पत्रकार बेंजामिन बेस्ट जानना चाहते थे कि क़तर ने श्रमिकों की दशा में सुधार के जो वादे किये थे, उनका क्या हुआ.

अपने गोपनीय सूत्रों की सलाह पर जर्मन पत्रकार एक शुक्रवार के तीसरे पहर राजधानी दोहा से 20 किलोमीटर दूर के अलेतिया बाज़ार पहुंचे. वहां नेपाल, भारत और बाग्लादेश के कई सौ श्रमिक ठहराये गये हैं. कैमरा और माइक्रोफ़ोन छिपा कर रखते हुए बेंजामिन बेस्ट ने मुख्यतः नेपाली श्रमिकों की आपबीती रिकॉर्ड की. दिल प्रसाद और आदी गुरुंग नाम के दो नेपाली श्रमिक इतने हताश हो चुके थे कि वे सब-कुछ उगलने को तैयार थे.

दोनों ने बताया कि वे जिस कंपनी के लिए काम करते हैं, उसके मालिक ने शुरू में ही उनके पासपोर्ट अपने पास रख लिये. पासपोर्ट के बिना वे स्वदेश भी नहीं लौट सकते. उनका कहना था, ‘हम कुल मिलाकर 125 लोग यहां फंसे हुए हैं. बंदी बन गये हैं. कहीं आ-जा नहीं सकते. हम, बस, जैसे हो तैसे अपने घर पहुंचना चाहते हैं. नेपाल में अपने परिवारों को हम फ़ोन तक नहीं कर सकते. कंपनी जब तक हमारा बक़ाया पैसे नहीं दे देती, तब तक हम कुछ भी नहीं कर सकते... हमारा बॉस नवंबर महीने से बार-बार यही कह रहा है कि हम धीरज रखें, हमें पैसा मिलेगा.’

वास्तव में यह स्थिति होनी ही नहीं चाहिये थी. दुनिया भर से आलोचना और निंदा के बीच क़तर की सरकार ने 2014 में ही मान लिया था कि विदेशी श्रमिकों को नौकरी देने की अपनी ‘कफ़ाला’ प्रणाली में वह सुधार करेगी. यह प्रणाली एक ऐसी ‘बंधुआ मज़दूर’ प्रणाली है जिसमें काम देने वाला अपने श्रमिकों के पासपोर्ट एवं ‘वर्क-परमिट’ जैसे दस्तावेज़ अपने पास रख लेता है और उन पर कड़ी नज़र भी रखता है, ताकि वे कहीं दूसरी जगह काम न कर सकें. कहने को क़तर की सरकार ने इस बीच क़ानून बना रखा है कि जो कोई अपने श्रमिकों-कर्मचारियों के पासपोर्ट आदि ले लेगा, उसे 50,000 रियाल तक (एक रियाल का मूल्य करीब 20 रुपये है) ज़ुर्माना देना पड़ेगा. पर, इस पर अमल होता दिखता नहीं.

2015 से कतर में हर महीने वेतनों और मज़दूरी के इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की एक नयी प्रणाली भी प्रचलन में है. 2017 में सरकार ने 750 रियाल न्यूनतम मज़दूरी भी तय कर दी. पर, मानवाधिकार संस्थाओं ‘एम्नेस्टी इंटरनेशनल’ और ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ का अब भी कहना है कि क़तर के निर्माण स्थलों पर इन नियमों की भारी अनदेखी होती है.

जर्मन पत्रकार ने पाया कि श्रमिकों के लिए मुर्गियों के दड़बेनुमा मकानों वाले शिविर बने हुए हैं, जिनमें एक ही छोटे-से कमरे में आठ-आठ, दस-दस लोग ठूंस दिये गये हैं. दो-दो सौ लोगों के लिए सामूहिक शौचालय हैं. उन्हें 40 डिग्री की असहनीय गर्मी और दुर्गंध के बीच जीना पड़ता है. पुलिस वाले और गुप्तचर सादी पोशाक में इन जगहों पर गश्त लगाते हैं. जो कोई बिना पूर्व अनुमति के श्रमिकों का इंटरव्यू लेता या उनके आवासों में जाता देखा जाए, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है.

जर्मन पत्रकार को बहुत ही सावधानी के साथ छिपते-छिपाते हुए अपनी फ़िल्म बनानी पड़ी. नेपाल के दिल प्रसाद ने उसे अपना कमरा भी दिखाया. वह एक ऐसी बस्ती में है, जहां दड़बेनुमा कमरों वाली कई बिल्डिंगें बनी हुई हैं. उन्हीं में से एक बिल्डिंग की पहली मंज़िल पर दिल प्रसाद का कमरा था. बिल्डिंग की सीढ़ियां और दीवारें बहुत ग़ंदी थीं. जगह-जगह मरे हुए तिलचट्टे (कॉक्रोच) पड़े थे. दिल प्रसाद के छोटे-से अंधेरे कमरे में कुल आठ लोग रह रहे थे.

पत्रकार बेंजामिन बेस्ट के वहां पहुंचते ही कई दूसरे नेपाली श्रमिक भी आ गये. सभी बताने लगे कि उन्हें कैंप के ‘बॉस’ और उसके जासूसों का हमेशा डर लगा रहता है. जासूस ‘बॉस’ को टेलीफ़ोन से हमेशा बताते रहते हैं कि कौन कमरे में है और कौन नहीं. कमरे में जमा हो गये दूसरे लोगों ने भी बेस्ट को बताया कि उनके पास न तो अपना पासपोर्ट है और न पैसा. महीनों से उन्हें कोई वेतन नहीं मिला है. वे अपने घर वालों को कोई पैसा नहीं भेज पा रहे हैं. न तो क़तर का श्रम-न्यायालय उनकी कुछ सुनता है और न नेपाली दूतावास से कोई सहायता मिलती है.

बेंजामिन बेस्ट ने बाद में क़तर की उन कंपनियों और अधिकारियों से भी संपर्क किया, जो इन श्रमिकों के लिए ज़िम्मेदार हैं. उन्हें अपने प्रश्नों के कोई उत्तर नहीं मिले. अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ ‘फ़ीफ़ा’ से शिकायत करने पर लिखित उत्तर आया, ‘आपकी शिकायतें बहुत गंभीर क़िस्म की हैं. हम क़तर की विश्व कप व्यवस्थापक समिति के साथ मिल कर... इन शिकायतों की जांच-पड़ताल करेंगे.’ बेस्ट को जांच के बारे में फिलहाल और कोई जानकारी नहीं मिली है.

बेंजामिन बेस्ट नेपाली श्रमिकों दिल प्रसाद और आदी गुरुंग की पारिवारिक पृष्ठभूमि जानने के लिए नेपाल भी गये. काठमांडू से कोई 500 किलोमीटर दूर, भारतीय सीमा के पास के एक गांव में वे आदी गुरुंग के घर पहुंचे. वहां गुरुंग की पत्नी अनू गुरुंग ने रोते-सिसकते हुए उन्हें बताया कि कई महीनों से क़तर से कोई पैसा नहीं आया है. परिवार पर तीन हज़ार डॉलर के बराबर कर्ज़ चढ़ गया है. वे अपने बच्चों के स्कूल की फ़ीस तक नहीं दे पा रही हैं.

बेस्ट के नेपाल में रहने के दौरान ही बिश्नू बहादुर नाम के एक नेपाली श्रमिक का शव क़तर से काठमांडू पहुंचा. 2019 के पहले पांच महीनों के भीतर ही क़तर से नेपाल पहुंचा यह सौवां शव था. पूछताछ करने पर नेपाल की सरकार से बेस्ट को जानकारी मिली कि पिछले 10 वर्षों में क़तर में काम करने गये 1,426 नेपाली श्रमिकों की मृत्यु हो चुकी है. उनमें से 522 की, यानी एक-तिहाई से अधिक की, हृदयगति रुक जाने से अकस्मात मौत हो गयी बतायी गयी.

‘हृदयगति रुक जाना’ एक ऐसा बहाना प्रतीत होता है, जिसकी आड़ ले कर क़तर में श्रमिकों की मृत्यु के मूल कारण को छिपाया जाता है. क़तर का क़ानून ‘हृदयगति रुक जाने’ जैसे मामलों में शवपरीक्षा (पोस्टमार्टम) अनिवार्य नहीं मानता, इसलिए मूल कारण का पता भी नहीं चल सकता. मूल कारण वह अनवरत डर, चिंता और तनाव भी हो सकता है जो असुरक्षा, काम के भारी दबाव, भीषण गर्मी, वेतन नहीं मिलने और ऩियोक्ताओं के असह्य दुर्व्यवहार से पैदा होता है. काम के दौरान हुई दुर्घटनाओं से मरने वालों की संख्या 124 बतायी गयी. यह साफ नहीं है कि इस प्रकार की कितनी मौतों का संबंध सीधे विश्व कप के लिए हो रहे निर्माणकार्यों से है.

बेंजामिन बेस्ट ने बिश्नू बहादुर के शव वाले ताबूत के साथ उसके गांव तक जाना तय किया. अंत्येष्टि क्रिया के समय पूरा गांव जमा हो गया था. बेस्ट को बताया गया कि बिश्नू बिजलीसाज़ (इलेक्ट्रीशियन) था और क़तर के कई निर्माणस्थलों पर काम कर चुका था. उनके मुताबिक जब वह गांव से गया था तो पूरी तरह एक स्वस्थ नौजवान हुआ करता था. बिश्नू बहादुर के एक रिश्तेदार केशव भारती का कहना था, ‘वहां जाने के बाद वह बार-बार शिकायत किया करता था कि काम के समय भीषण गर्मी से वह परेशान रहता है. हर निर्माणस्थल पर भीषण गर्मी है. लेकिन उसने यह कभी नहीं कहा कि उसे कोई बीमारी है.’

बेंजामिन बेस्ट ने राजधानी काठमांडू में दो और ऐसे नेपाली श्रमिकों से बात की, जो क़तर में पांच साल काम कर चुके थे. अनिल कानू और नगिंदर यादव नाम के इन दोनों श्रमिकों ने बताया कि इन पांच में से एक साल से कुछ अधिक समय उन्होंने ‘तवासोल’ नाम की एक क़तरी कंपनी की ओर से ‘अल-बायत’ नाम वाले स्टेडियम के निर्माण के लिए काम किया. इसे प्रमाणित करने के लिए उन्होंने नौकरी के अपने अनुबंध और स्टेडियम के भीतर के फ़ोटो भी दिखाये.

इन दोनों का भी कहना था कि उन्हें भी कई महीनों तक कोई वेतन नहीं मिला. नगिंदर यादव ने बताया, ‘अपनी सुरक्षा को लेकर तब बड़ी चिंता होने लगती थी जब कभी बहुत अधिक ऊंचाइयों पर काम करना पड़ता था. स्टेडियम में काम कर रहे दो मज़दूर हमारी आंखों के सामने हुई एक दुर्घटना में मर गये. हम बहुत ही भयभीत थे. काम करने से मना कर रहे थे. लेकिन हमें काम जारी रखने पर मजबूर कर दिया गया. एक दूसरी बार हमने देखा कि सात मज़दूरों को, बिना किसी कारण, ‘तवासोल’ के कार्यालय में मारा-पीटा गया.’

बेंजामिन बेस्ट ने बाद में ‘तवासोल’ कंपनी से जब पूछताछ करनी चाही, तो उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला. ‘फ़ीफ़ा’ से संपर्क करने पर फुटबॉल की इस विश्व संस्था ने पहली बार माना कि क़तर में विश्व कप के एक निर्माणस्थल पर श्रमनियमों का उल्लंघन हुआ है. एक लिखित उत्तर में ‘फ़ीफ़ा’ ने कहा, ‘हमें दिसंबर 2018 में पता चला कि तवासोल ने अल-बायत स्टेडियम के निर्माण के समय श्रममानकों की अनदेखी की है...’

दूसरी ओर, क़तर की विश्व कप व्यवस्थापक समिति ने ‘अल-बायत स्टेडियम’ के निर्माण के दौरान किसी की भी मृत्यु होने से साफ़ इनकार कर दिया. उसने श्रमिकों के साथ किसी दुर्व्यवहार की भी कोई जानकारी नहीं होने का दावा किया. कहा कि 23 श्रमिकों को उनके बक़ाया वेतन इस बीच मिल गये हैं. ‘तवासोल’ की ओर से श्रममानकों का पालन नहीं होने पर भविष्य में उसे कोई नया ठेका नहीं दिया जायेगा. यानी, फिलहाल उसका ठेका रद्द नहीं किया जायेगा.

जर्मन टेलीविज़न के इस रिपोर्ताज़ से इतर क़तर में काम कर रहे भारतीय श्रमिक भी वेतन नहीं दिये जाने और दुर्व्यवहार होने की हमेशा शिकायतें करते रहे हैं. मई 2018 में क़तर में फंसे हुए क़रीब 650 भारतीय श्रमिकों में से एक पंजाब के बलविंदर सिंह ने एक भारतीय ऑनलाइन पोर्टल को बताया, ‘हम पुलिस के पास गये. भारतीय दूतावास के पास गये. पर किसी को हमारी चिंता नहीं है.’ इन सभी लोगों को महीनों से उनके वेतन नहीं मिले थे. उनके पासपोर्ट क़तर पहुंचते ही ले लिये गये थे.

उत्तर प्रदेश से वहां गये मोहम्मद असलम की शिकायत थी, ‘(कार्य-अनुमति के) मेरे कार्ड की अवधि दो महीने पूर्व बीत गयी. कंपनी चार महीनों से हमें लटकाये हुए है. कार्ड का नवीकरण नहीं करवा रही है. कार्ड की ही बात नहीं है. कंपनी ने पांच महीनों से वेतन भी नहीं दिया है. हम जीने के लिए संघर्ष करने पर मजबूर हैं. दिन का खाना भी बड़ी मुश्किल से जुटा पाते हैं.’’ असलम बीमार पड़ गये थे, पर श्रम-कार्ड के बिना अस्पताल में इलाज भी नहीं करवा सकते थे. भारत में उनकी मां भी बीमार थीं. मां के लिए या बच्चों की स्कूल-फ़ीस के लिए भी वे कोई पैसा भारत नहीं भेज पा रहे थे.

क़तर के 90 प्रतिशत निवासी विदेशी आप्रवासी हैं. उनमें भारतीयों का हिस्सा 31 प्रतिशत, यानी लगभग एक-तिहाई के बराबर है. कुल क़रीब साढ़े छह लाख में से तीन लाख भारतीय अकेले केरल से वहां गये हैं. भारत के विदेश राज्यमंत्री रहे जनरल वीके सिंह ने क़तर में भारतीय श्रमिकों की स्थिति के बारे में 2018 में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए संसद में कहा था, ‘स्केल ट्रेडिंग ऐन्ड कॉन्ट्रैक्टिंग नाम की कंपनी के 162 कर्मचारियों को पांच महीनों से वेतन नहीं मिला था. मामले का निपटारा करते हुए उन्हें पासपोर्ट के साथ देश छोड़ने की अनुमति भी नहीं दी जा रही थी.’ वीके सिंह ने बताया कि दोहा में भारतीय दूतावास ने ‘भारतीय समुदाय के कल्याण कोष से 160 भारतीयों की वापसी के लिए विमान-टिकटों की व्यवस्था की, जबकि शेष बचे दो लोगों ने कंपनी के लिए काम करते रहने का विकल्प चुना.’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2016 में क़तर गये थे. उस समय उन्होंने राजधानी दोहा में भारतीय श्रमिकों के एक शिविर का भी दौरा किया था. भारतीय श्रमिकों को उन्होंने आश्वासन दिया था कि उनकी व्यथा को वे क़तर की सरकार के सामने रखेंगे और स्थिति में सुधार लाने की पूरी कोशिश करेंगे. उस समय दोनों सरकारों ने क़तर के श्रम-क़ानून में सुधार लाने की बात कही थी. कहने को कागज़ पर कुछ परिवर्तन हुए भी हैं, पर वे कागज़ तक ही सामित रह गये लगते हैं.

मिंकी वॉर्डन अमेरिकी मानवाधिकार संस्था ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की निदेशक हैं. उनका कहना है कि ‘फ़ीफ़ा’ का फुटबॉल देखने में होता तो बहुत ख़ूब है, लेकिन उसके तमाशों की लागत भी ख़ूब बढ़-चढ़ कर ही होती है - डॉलरों के रूप में भी और मनवीय ज़िंदगियों के रूप में भी. 2018 में रूस में हुए फुटबॉल विश्व कप के समय सेंट पीटर्सबर्ग के स्टेडियम के निर्माण हेतु उत्तरी कोरिया से सस्ते मज़दूर लाये गये. रूस इन निर्माणकार्यों में उस समय 21 मौतें आधिकारिक तौर पर स्वीकार करता है. लेकिन क़तर ने 2018 तक अपने यहां केवल 18 मौतें ही मानी हैं. असली आंकड़ा हर हाल में इससे कहीं अधिक है.

‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ को मिली जानकारियों के अनुसार, 2018 के अंत से कुछ दिन पहले, 23 साल का एक नेपाली मज़दूर काम करने के दौरान ऊंचाई से गिर जाने के कारण मर गया. वह जिस ऊंचाई पर काम कर रहा था, वहां गिरने से बचने की कोई व्यवस्था नहीं थी. गिरने वाले को झेल कर बचा लेने लायक कोई जाल तक नहीं लगा था.

क़तर में ऐसे श्रमिक संगठन (ट्रेड यूनियन) भी नहीं हैं, जो श्रमिकों की सुरक्षा के लिए काम करते हों. दूसरी ओर, सरकार के पास इतना पैसा ज़रूर है कि वह 2022 में फुटबॉल का विश्व कप आयोजित करने की शेखी बघारने के लिए हर सप्ताह 50 करोड़ डॉलर ख़र्च कर रही है. जबकि 16 लाख विदेशी श्रमिकों के भले की, जिन्हें वहां बंधुआ मज़दूरों की तरह ख़ून-पसीना बहाना पड़ रहा है, उसे कोई परवाह नहीं है. इस बात की भी परवाह नहीं है कि इस कारण दुनिया में उसकी कितनी भद्द हो रही है.