अर्थव्यवस्था के मोर्चे से नवगठित मोदी सरकार के लिए अच्छी खबरें नहीं आ रही हैं. जीडीपी अपने पिछले पांच साल के निम्नतम स्तर पर है और राजकोषीय घाटे की चिंता मुंह बाये खड़ी है. बाजार भारी नगदी संकट का सामना कर रहा है और सरकार के पास अपनी योजनाओं के खर्चे के लिए पैसे नहीं हैं. लेकिन, इन सबके बीच जल्द ही उसे एक राहत भरी खबर मिल सकती है. इस महीने के अंत तक, आरबीआई के आरक्षित कोष और पूंजीगत ढांचे (कैपिटल फ्रेमवर्क) के बारे में गठित बिमल जालान कमेटी अपनी रिपोर्ट दे सकती है. पहले माना जा रहा था कि 12 जून को जालान कमेटी अपनी आखिरी बैठक करेगी और उसके बाद अपनी रिपोर्ट आरबीआई को सौंप देगी. लेकिन, खबरों के मुताबिक छह सदस्यीय कमेटी में सरकार को धन देने के फार्मूले पर सहमति नहीं बन सकी इसलिए वह एक बैठक और करेगी.

बताया जाता है कि जालान कमेटी में इस बारे में एकराय नहीं बन पा रही है कि केंद्र सरकार को आरबीआई के रिजर्व से कितना पैसा दिया जाए और किस तरह से दिया जाए. लेकिन, इन सारे गतिरोधों के बाद भी माना जा रहा है कि जून के अंत तक कमेटी इस बात की सिफारिश कर सकती है कि आरबीआई के आरक्षित कोष से एक मोटी रकम सरकार के खाते में स्थानांतरित कर दी जाए. बैंक आफ अमेरिका मेरिल लिंच (बोफा-एमएल) की एक रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई अपने रिजर्व से तीन लाख करोड़ तक की रकम सरकार को स्थानातरित कर सकती है

आम चुनाव से पहले आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच विवाद शुरु हुआ था, जिसके केंद्र में आरबीआई के आरक्षित कोष की रकम थी. मोदी सरकार का कहना था कि आरबीआई रिजर्व के तौर पर जो एक बड़ी रकम अपने पास रखता है वह दुनिया के ज्यादातर केंद्रीय बैंकों से ज्यादा है और उसका कोई उत्पादक उपयोग नहीं होता है. इस आधार पर उसने आरबीआई से इस कोष में से साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये की मांग की थी. लेकिन तत्कालीन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल इसके लिए तैयार नहीं थे और यह सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच गतिरोध की वजह बन गया था. आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने एक भाषण में सरकार की इस मांग को आरबीआई की स्वायत्तता पर हमला कहा और चुनावों से पहले इस पर एक राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. इन्हीं विवादों के बीच उर्जित पटेल ने आरबीआई गवर्नर के पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह शक्तिकांत दास ने ले ली.

शक्तिकांत दास ने आते ही आरबीआई के आरक्षित कोष के बारे में विमल जालान के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की. जालान कमेटी को नब्बे दिन के भीतर - अप्रैल 2019 में - अपनी रिपोर्ट देनी थी. जानकारों के मुताबिक, जालान कमेटी की सिफारिशों में एक लाख करोड़ से तीन लाख करोड़ रूपये तक सरकार को देने की बात कही जा सकती है. ठीक-ठीक यह रकम कितनी होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कमेटी इसके लिए क्या फार्मूला तय करती है. खबरों के मुताबिक इस फार्मूले को लेकर कमेटी के सदस्यों में मतभेद है और यही वजह है कि उसकी रिपोर्ट आने में लगातार देर हो रही है.

आंकड़ों के मुताबिक, आरबीआई के पास अपनी कुल परिसंपत्ति का 28 प्रतिशत आरक्षित कोष है. सरकार का मानना है कि दुनिया के ज्यादातर केंद्रीय बैंक अपना आरक्षित कोष अपनी कुल परिसंपत्ति का 14 फीसद तक ही रखते हैं. ऐसे में अगर जालान कमेटी इसे घटाकर 20 फीसद तक भी ले लाती है तो केंद्र सरकार को लगभग दो लाख करोड़ रूपये दिए जा सकते हैं. जानकारों के मुताबिक अगर आरबीआई दुनिया के कई अन्य केंद्रीय बैंकों की तरह अपनी कुल परिसंपत्ति का 14 फीसद ही आरक्षित कोष के तौर पर अपने पास रखे तो उसके पास 9.6 लाख करोड़ रूपये का सरप्लस हो जाता है.

हालांकि, मोदी सरकार ने अभी तक इस बात पर जोर नहींं दिया है कि आरबीआई अपने आरक्षित कोष को 14 प्रतिशत कर ले. सरकार की मुख्य मांग इस अतिरिक्त कोष से सिर्फ तीन-साढ़े तीन लाख करोड़ रूपये हासिल करने की है. जानकारों के मुताबिक, जालान कमेटी मोटे तौर पर इससे सहमत है, लेकिन इसमें कुछ मतभेद भी हैं.

सूत्रों के मुताबिक, वित्त मंत्रालय चाहता है कि आरबीआई इस पैसे को सीधे सरकार को स्थानांतरित करे और सरकार अपने हिसाब से इसके इस्तेमाल का निर्णय करे. लेकिन जालान कमेटी कुछ शर्तों के साथ इसे देना चाहती है. वह चाहती है कि आरक्षित कोष से एक बड़ी रकम सरकार को दी तो जाए लेकिन उसके कर्जों का पुर्नभुगतान करके. यानी आरबीआई सरकार को जितनी रकम देना चाहती है, उतने के सरकारी बांड उसकी बैलेंसशीट से राइट ऑफ भी करवाना चाहती है. सूत्रों के मुताबिक, वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने, जोकि जालान कमेटी के सदस्य भी हैं, इस पर आपत्ति जताई है. ऐसे में जानकार बीच का कोई रास्ता निकाले जाने की उम्मीद जता रहे हैं.

आरबीआई के रिजर्व से सरकार को धन दिये जाने से जुड़ी एक चिंता और है - इससे कहीं आरबीआई की साख और रेटिंग पर तो फर्क नहीं पड़ जाएगा? इस संबंध में ज्यादातर आर्थिक जानकारों का मानना है कि आरबीआई के पास एक बड़ा आरक्षित कोष है और सरकार को धन देने की वजह से उसकी रेटिंग पर कोई फर्क नहीं आएगा.

मोदी सरकार, आरबीआई से मिलने वाली इस मोटी रकम का इस्तेमाल कैसे करेगी, इस पर भी बहस शुरु हो गई है. आर्थिक जानकारों के एक खेमे का मानना है कि सरकार को इस रकम का इस्तेमाल सरकारी बैंकों के पूंजी आधार को बढ़ाने के लिए करना चाहिए क्योंकि बैंक नगदी की भारी समस्या से जूझ रहे हैं. वहीं, सरकार ने पीएम-किसान जैसी योजनाओं का लाभ सभी किसानों को देने की घोषणा की है. जाहिर है ऐसे लोकलुभावन कार्यक्रमों के लिए भी उसे पैसे की जरुरत होगी.

सरकार इस रकम का कैसा और किस तरह से उपयोग करती है, यह तो उस पर ही निर्भर है. पर यह तय है कि आर्थिक मंदी और तमाम राजकोषीय चिंताओं से जूझ रही सरकार को यह रकम बड़ी राहत देने वाली है.