भाजपा मुख्यालय में टिकट के बंटवारे पर चर्चा चल रही थी. पार्टी ने एक सिद्धांत तय किया कि एक ही परिवार के दो सदस्यों को टिकट नहीं मिलेगा. मतलब वसुंधरा राजे चाहें तो वे चुनाव लड़ सकती हैं लेकिन फिर उनके बेटे दुष्यंत सिंह को टिकट नहीं मिलेगा. बिहार से हुकुमदेव नारायण यादव अपने बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते थे तो उन्हें अपनी सीट छोड़नी पड़ी थी.

यही प्रस्ताव लेकर भाजपा के संगठन से जुड़े एक महासचिव मेनका गांधी से भी मिले और उन्हें पार्टी का फैसला बताया. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि मेनका ने सुनते ही कह दिया यह तो गलत है. हमारे परिवार में मैं और मेरा बेटा, दोनों ही पहले से सांसद हैं तो यह फॉर्मूला हम पर कैसे लागू हो सकता है. बाकी नेता तो एक्स्ट्रा सीट मांग रहे हैं, हमारे पास तो पहले से जीती हुई सीटे हैं. इसलिए इस पर समझौता नहीं हो सकेगा.

जब भाजपा के वरिष्ठ नेता ने मेनका गांधी को समझाने की कोशिश की तो उन्होंने पलटकर कह दिया कि अगर ऐसा है तो मेरा बेटा वरुण मेरी सीट पीलीभीत से चुनाव लड़ेगा और आप सुल्तानपुर के लिए कोई मजबूत उम्मीदवार ढूंढ लीजिए. इसके बाद पार्टी चाहकर भी कुछ नहीं कर सकी और उसे मेनका-वरुण की बात माननी पड़ी. वरुण गांधी पीलीभीत से चुनाव लड़े और जीते, मेनका गांधी सुल्तानपुर से विजयी होकर दिल्ली पहुंची.

अब बात उस दिन की जब दिल्ली में शपथ लेने के लिए भाजपा नेताओं के पास फोन आ रहे थे. मेनका गांधी पक्का मानकर चल रहीं थीं कि उन्हें मंत्री बनाया जाएगा या फिर उनके बेटे वरुण गांधी को मौका मिलेगा. लेकिन फोन की घंटी ना मेनका के घर बजी और न ही वरुण गांधी के पास ही शपथ लेने के लिए फोन आया. यानी कि इस वक्त मेनका और वरुण गांधी के पास न तो पार्टी में कोई पद है और न ही इनमें से कोई मोदी सरकार में ही शामिल है.

इसकी वजह का खुलासा भाजपा के बड़े नेता कुछ यों करते हैं - भाजपा ने उन सभी नेताओं को सबक सिखाने का फैसला किया है जिन्होंने चुनाव के वक्त उसके लिए मुश्किलें खड़ी करने की कोशिश की थी. वरुण गांधी बारे में ये नेता यह कहते हैं कि ‘वे नाम के लिए ही पार्टी में है, उनकी सारी हरकतें तो एक स्वतंत्र सांसद की तरह हैं. तल्ख लहजे में उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव जीतने के लिए वरुण भी मोदी-मोदी कर रहे थे. लेकिन चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर भाजपा और मोदी सरकार सब पर इशारों में हमला करते दिखते हैं.’

वरुण गांधी के करीबी लोगों से बात करें तो कुछ और बातें पता चलती है. धीरे-धीरे वे भाजपा में एकदम अलग-थलग पड़ गए हैं. पहले मेनका गांधी मंत्री थीं तो वे अपनी मां का थोड़ा लिहाज कर लेते थे. लेकिन अब मेनका भी पार्टी से खिंची-खिंची रहती हैं. चुनाव जीतने के बाद भाजपा के मध्य स्तर के नेताओं का भी नजरिया एकदम बदल गया है. इसलिए वरुण गांधी अब धीरे-धीरे आक्रामक होते दिख सकते हैं.

वरुण गांधी के कैंप में बड़ा तो छोड़िए उनकी मां के अलावा कोई और भाजपा नेता नहीं है. वे एक एनजीओ की तरह अपनी टीम बनाकर काम करते हैं. अलग-अलग कॉलेजों में जाकर लेक्चर देते हैं. गांव और छोटे शहरों में किसानी और शिक्षा का नया मॉडल समझाते हैं. जब हाल ही में किसी नेता ने उनसे पूछा कि अगर वे इतने ज्यादा मॉडल बनाकर काम कर रहे हैं तो इसे सरकार में जाकर लागू क्यों नहीं कराते. इस पर वरुण सिर्फ मुस्कुरा कर रह गए.

एक और बात गौर करने वाली है. वरुण गांधी का आक्रमण अब सीधे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की तरफ बढ़ने वाला है. हाल ही में खबर आई कि उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय से उनके पास फोन आया था कि वे मोदी सरकार की इतनी कड़ी आलोचना क्यों करते हैं. इस पर सरकार के एक सूत्र कहते हैं कि वह एक मशविरा था जो वरुण सुनने को तैयार नहीं हुए. इसके बाद पार्टी ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. अब वरुण गांधी अपने अलग रास्ते पर इतनी दूर निकल गए हैं कि सरकार उन्हें मनाने वाली नहीं है और पार्टी में उन्हें पद भी नहीं मिलने वाला है.

भाजपा के एक महासचिव एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि राजनाथ सिंह जब अध्यक्ष बने थे तो उन्होंने नौजवान वरुण गांधी को राष्ट्रीय महासचिव और पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाने जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी थीं. लेकिन वरुण ने बंगाल में मेहनत नहीं की और पार्टी को उनसे कोई फायदा नहीं हुआ. इसके उलट अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के लिए मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को प्रभारी बनाया और उन्होंने पूरी तस्वीर बदल दी. ममता बनर्जी के घर में घुसकर मध्य प्रदेश के एक नेता ने बंगाली नेताओं की पूरी टीम खड़ी कर दी. आज दिलीप घोष, मुकुल रॉय, लॉकेट चटर्जी, रुपा गांगुली जैसे नेता एक साथ काम कर रहे हैं. पार्टी सबसे ज्यादा खुश बंगाल के नतीजे से ही है.

जब भी भाजपा में वरुण गांधी की बात होती है तो पार्टी नेता यह भी कहते हैं कि उन्होंने अपनी सीट जीतने के अलावा पार्टी के लिए किया क्या है? वे पार्टी को अभी तक एक बड़ी सीट भी नहीं जिताई है तो फिर उन्हें किस बात का इनाम दिया जाए!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आए और भाजपा में महत्वपूर्ण पद पर तैनात एक नेता बताते हैं कि पार्टी 2024 की तैयारी में जुट गई है. इस तैयारी में वरुण गांधी का कोई रोल नहीं है. पार्टी मन से मान चुकी है कि 2024 तक वरुण गांधी अपना अलग रास्ता तलाश कर लेंगे. वे तभी पार्टी में रुकेंगे जब प्रियंका गांधी और उनके बीच कोई पक्की डील नहीं हो पाएगी.