इन दिनों ब्रिटेन की आर्थिक दुनिया से उठी एक चर्चा भारत में भी सुर्खियां बटोर रही है. खबर यह है कि दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्री और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रह चुके रघुराम राजन ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर बन सकते हैं. रघुराम राजन का नाम भारत में इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि स्वदेशी लॉबी के विरोध के कारण आरबीआई में उनके कार्यकाल को विस्तार नहीं मिला था और आज वे बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर बनने की दौड़ में हैं.

दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों में उच्चस्तर पर नियुक्तियां होती रहती हैं. यानी यह आम बात है. तो ऐसा क्यों है कि बैंक ऑफ इंग्लैंड के नए गवर्नर की नियुक्ति पर पूरी दुनिया की आंखें टिकी हैं और एकाएक रघुराम राजन का नाम आर्थिक दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है? जानकारों के मुताबिक इसकी वजह ब्रिटेन के मौजूदा राजनीतिक हालात हैं जो यूरोप के साथ पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले हैं. इसीलिए, ब्रेक्जिट के फेर में फंसे ब्रिटेन के 325 साल पुराने बैंक ऑफ इंग्लैंड का नया गवर्नर कौन बनेगा, इस पर सभी की नजरें हैं.

बैंक ऑफ इंग्लैंड के मौजूदा गवर्नर मार्क कार्नी का कार्यकाल 31 जनवरी 2020 तक है. लेकिन, इसके गवर्नर की नियुक्ति करने वाले यूके ट्रेजरी ने इस पद के लिए आवेदन मांगने की प्रक्रिया पूर्ण कर ली है. बीते पांच जून को इसकी अंतिम तिथि थी. इसी के बाद बैंक आफ इंग्लैंड के नए गवर्नर के नामों की चर्चा होने लगी.

लेकिन, सवाल उठता है कि इस पद के लिए एकाएक रघुराम राजन के नाम की चर्चा क्यों होने लगी? आर्थिक जानकार इसकी वजहें कई बातों में तलाशते हैं. पहली बात तो यह है कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से बाहर होने की शर्तों यानी ब्रेक्जिट डील के बारे में इस साल 31 अक्टूबर तक फैसला करना है. इसके चलते बैंक ऑफ इंग्लैंड के मुखिया का पद खासी राजनीतिक अड़चनों वाला हो सकता है. भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर काम करने के उनके तरीके के कारण पूरी दुनिया में राजन की छवि एक ऐसे वित्तीय प्रशासक के तौर पर बनी है जो आसानी से राजनीतिक दबावों में नहीं आते और हर मसले पर खुलकर अपनी राय रखते हैं. भारत में आरबीआई के मुखिया के तौर पर महंगाई पर आधारित मौद्रिक नीति और बैंकों के एनपीए के बारे में उनके सख्त रुख के कारण उन्हें एक अच्छे आर्थिक प्रशासक के साथ राजनीतिक अड़चनों से निपटने में भी कुशल माना जा रहा है.

इसके अलावा, बैंक ऑफ इंग्लैंड के मुखिया की नियुक्ति करने वाले यूके ट्रेजरी के चांसलर फिलिप हैमंड ने अपने बयानों में बार-बार एक बात कही है. उनके मुताबिक ब्रिटेन की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए बीओई (बैंक ऑफ इंग्लैंड) का मुखिया चुनने में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह व्यक्ति अंतराराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में काम करने का अनुभव रखता हो. राजन 2003 से 2006 के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके हैं. यह बात उनके पक्ष में जाती है. और इस कारण भी रघुराम राजन को गवर्नर पद की दौड़ में उनके प्रतिद्वंदी एंड्रयू बेली से आगे माना जा रहा है. एंड्रयू बेली मौजूदा समय में भी बैंक ऑफ इंग्लैंड से जुड़े हैं और वे बैंक के फाइनेंशियल रेगुलेटर के तौर पर काम कर रहे हैं. जानकारों के मुताबिक, कुल छह लोग बैंक ऑफ इंग्लैंड के मुखिया के लिए दौड़ में हैं, लेकिन इनमें रघुराम राजन और एंड्रयू बेली के ही नाम प्रमुखता से लिए जा रहे हैं.

इन बातों के अलावा रघुराम राजन का नाम बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर पद के लिए सबसे आगे चल रहा है तो उसकी एक वजह ब्रेक्जिट के प्रति उनका रुख भी है. आर्थिक जानकार मानते हैं कि ब्रेक्जिट के प्रति उनके सहानुभूतिपूर्ण रुख के चलते भी वे देश के केंद्रीय बैंक के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार माने जा रहे हैं. कुछ समय पहले रघुराम राजन ने अपने एक बयान में कहा था कि अगर ब्रिटिश सरकार अपनी ब्रेक्जिट नीति का रुख ठीक रखे तो उसे यूरोपीय संघ से अलग होने का फायदा भी मिल सकता है और इसको लेकर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है. रघुराम राजन ने कहा था कि इसके बाद ब्रिटेन की आर्थिक परिस्थितियां इस बात पर निर्भर करती हैं कि वह बाकी दुनिया के साथ कैसे तालमेल बैठाता है.

रघुराम राजन के बैंक ऑफ इंग्लैंड के अगले गवर्नर होने की चर्चा इतना आगे बढ़ चुकी है कि रॉयल बैंक ऑफ कनाडा ने कहा कि अगर वे बीओई के मुखिया बनते हैं तो उसका रुख और हॉकिश (सतर्क) हो सकता है और बैंक अपनी मौद्रिक नीति में और भी सख्त हो सकता है.

लेकिन, रघुराम राजन इन आलोचनाओं की परवाह किए बिना अपना काम करने और अपने मन की बात रखने के लिए जाने जाते हैं. भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर रहते हुए वे स्वदेशी लॉबी के लगातार निशाने पर रहे लेकिन उन्होंने आरबीआई की मौद्रिक नीति के साथ समझौता नहीं किया. कहा जाता है कि इसी विरोध के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली की पसंद होने के बावजूद उनके कार्यकाल को विस्तार नहीं मिला.

इससे पहले 2005 में जब वे आईएमएफ में काम कर रहे थे तो उन्होंने दुनिया और खासकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था के खतरे में होने की बात कही थी. इस पर तत्कालीन यूएस ट्रेजरी के सेक्रेटरी लैरी समर्स ने उन्हें हर बात में अड़चन पैदा करने वाला कहा था. लेकिन, राजन की बात सही साबित हुई. इसके तीन साल बाद ही अमेरिका को लेहमेन ब्रदर्स संकट से जूझना पड़ा और थोड़े ही समय बाद इसने पूरी दुनिया के लिए मंदी के हालात पैदा कर दिए.

रघुराम राजन बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर बनेंगे या नहीं बनेंगे, इसका पता तो कुछ महीनों बाद ही चलेगा. ब्लूमबर्ग के मुताबिक इस बारे में उनसे बात की गई तो उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया. हालांकि कुछ समय पहले उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘सेंट्रल बैंकिंग जॉब्स आर वेरी पॉल्यूटेड’. ऐसा कहकर राजन ने केंद्रीय बैंकों की जिस दिक्कत की ओर इशारा किया था, वह शायद राजनीतिक दबाव है. और ऐसे दबावों से निपटने की उनकी क्षमता को ही इस वक्त शायद उनकी सबसे बड़ी योग्यता माना जा रहा है.