सुप्रीम कोर्ट ने ठेका श्रमिकों के बारे में एक अहम फ़ैसला सुनाया है. इसके मुताबिक ठेकेदार के साथ अनुबंध पर काम कर रहे कर्मचारियों को किसी संस्थान का नियमित कर्मचारी नहीं माना जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आरएफ नारीमन और विनीत शरण की बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ दायर भारत हैवी इलेक्ट्रीकल्स लिमिटेड (भेल), हरिद्वार की अपील पर यह फ़ैसला सुनाया है. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 24 अप्रैल 2014 को दिए अपने फ़ैसले में कहा था कि यदि किसी संस्थान में ठेकेदार के साथ अनुबंध से जुड़े श्रमिक काम कर रहे हैं तो वे कर्मचारी की विस्तारित परिभाषा में आएंगे. यानी उन्हें संबंधित संस्थान का नियमित कर्मचारी माना जाएगा. इस फ़ैसले साथ ही हाईकोर्ट ने उन 64 श्रमिकों को बहाल करने का आदेश भी दिया था जिन्हें भेल, हरिद्वार के प्रबंधन ने 2004 में हटा दिया था.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि ठेकेदार के साथ अनुबंध से जुड़े कर्मचारियों पर भले संबंधित संस्थान का नियंत्रण हो. साथ ही उन्हें काम के लिए अंदर आने-जाने के वास्ते गेट पास जारी किए गए हों, फिर भी वे बाहरी ही हैं. महज़ गेटपास होने से वे कंपनी के कर्मचारी नहीं हो जाते. यह गेट पास सुरक्षा और प्रशासनिक दृष्टिकोण से दिए जाते हैं. ऐसे कर्मचारियों को संबंधित संस्थान वेतन भी सीधे नहीं देता बल्कि भुगतान ठेकेदार को किया जाता है. वह अपना कमीशन काटकर अपने श्रमिकों को वेतन वितरित करता है. इसीलिए ऐसे श्रमिकाें को नियमित कर्मचारी की परिभाषा में नहीं रखा जा सकता.