राजस्थान में लोकसभा की सभी 25 सीटें हारने के बाद कांग्रेस खुद को मजबूत करने में जुट गई है. पार्टी ने इस कवायद की शुरुआत अपने पारंपरिक समर्थक माने जाने वाले ग्रामीण क्षेत्रों से की है. प्रदेश की गहलोत सरकार ने अगली फरवरी में होने वाले पंचायत चुनावों के मद्देनज़र पंचायतों के पुनर्गठन के आदेश दिए हैं. यह बात किसी से दबी-छिपी नहीं है कि इस तरह के पुनर्सीमांकन का सत्ताधारी दल को सीधा फायदा मिलता है. प्रदेश की पिछली भाजपा सरकार (2013-18) ने भी 2014 में बीस साल बाद पंचायतों का पुनर्गठन किया था जिसके बाद हुए पंचायत चुनावों में कांग्रेस को पहली बार ग्रामीण इलाकों में मुंह की खानी पड़ी थी.

बताया जा रहा है कि राजस्थान में कम से कम 450 नई ग्राम पंचायतें और 15 नई पंचायत समितियाें के गठन की तैयारी की जा चुकी है. इससे पहले वसुंधरा सरकार ने 723 नई ग्राम पंचायत और 47 नई पंचायत समितियां बनाई थी. फिलहाल राजस्थान में कुल 9,891 पंचायतें और 295 पंचायत समितियां हैं. नए आदेशों के मुताबिक आठ हजार से ज्यादा आबादी वाली ग्राम पंचायतों को दाे टुकड़ाें में बांटा जाएगा. वहीं किसी भी पंचायत में आठ किलोमीटर के दायरे से बाहर के गांवों को शामिल नहीं करने और किसी गांव के दो टुकड़े नहीं करने की भी बात सुनिश्चित की गई है. साथ ही प्रदेश सरकार द्वारा स्थानीय निकायों के परिसीमन का भी निर्णय लिया जा चुका है.

वरिष्ठ पत्रकार अवधेश आकोदिया कांग्रेस की इस रणनीति से जुड़े एक दिलचस्प पहलू की तरफ़ भी ध्यान दिलाते हैं. उनके मुताबिक, ‘कांग्रेस के लिए पंचायतों के पुनर्गठन से ज्यादा महत्वपूर्ण फैसला पंचायत चुनाव के लिए शिक्षा की अनिवार्यता को हटाना था जो उसने सूबे में सरकार बनते ही ले लिया था.’ गौरतलब है कि वसुंधरा राजे सिंधिया की अगुवाई वाली सरकार ने पंचायत चुनाव का उम्मीदवार बनने के लिए शिक्षित होना अनिवार्य कर दिया था. बकौल आकोदिया, ‘भाजपा सरकार के इस निर्णय के चलते गांवों के उम्रदराज़ नेता जो कि कांग्रेस के प्रमुख आधार रहे हैं, चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिए गए. चूंकि कांग्रेस अभी तक गांवों में अपना नया कैडर तैयार करने और युवाओं को लुभा पाने में नाकाम रही है इसलिए भाजपा को इस बात का सीधा फायदा मिला.’

प्रदेश के कई राजनैतिक विश्लेषक कांग्रेस की इस हालिया कवायद को सिर्फ़ पंचायत चुनावों तक ही सीमित करके नहीं देख रहे. उनके मुताबिक कांग्रेस समझ चुकी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को टक्कर देने के लिए अभी से कई साल आगे तक की सोच रखनी होगी. एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के शब्दों में, ‘पंचायतों का परिसीमन कर कांग्रेस ने साढ़े चार साल बाद होने वाले विधानसभा और उसके छह महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए अभी से बिसात बिछा दी है.’ उनके शब्दों में, ‘पूरी संभावना है कि अगले कुछ वर्षों में कई विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन देखने को मिले जो लोकसभा क्षेत्रों तक के लिए बढ़ सकता है.’

दरअसल गहलोत सरकार ताबड़तोड़ कई योजनाएं ला रही है और आम जनता के बीच उनकी जानकारी देने और उनका श्रेय लेने के लिए कांग्रेस के पास सत्ता के आख़िरी छोर तक अपने लोग होना बेहद ज़रूरी है. प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि खोया जनाधार वापस पाने और उसे अगले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भुनाने की राह में पार्टी की यह रणनीति महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है.

ज़ाहिर तौर पर कांग्रेस के इस फैसले से प्रदेश भाजपा में हलचल है. सत्याग्रह से हुई बातचीत में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष मदन लाल सैनी इसे संवैधानिक प्रावधानों का ‘जबरदस्त दुरुपयोग’ क़रार देते हैं. वे कहते हैं, ‘प्रदेश भाजपा इस बारे में अगले सप्ताह एक बड़ी बैठक आयोजित करने जा रही है. उसमें कांग्रेस के इस फैसले के व्यापक विरोध की रणनीतियां तय की जाएंगी.’

इस हवाले से वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी कहते हैं कि परिसीमन का आधार और उसकी न्यूनतम समयावधि एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय हैं. लेकिन अभी यह संवैधानिक रूप से पूरी तरह उचित है, इसलिए सिवाय हो-हल्ला के भाजपा के पास विरोध का कोई ठोस आधार नहीं दिखता. तंज कसते हुए सैनी आगे जोड़ते हैं, ‘जम्मू-कश्मीर में भाजपा भी तो यही करने का मन बना रही है!’

वहीं प्रदेश कांग्रेस की मीडिया प्रमुख अर्चना शर्मा सरकार के इस फैसले को आम लोगों के लिए हितकारी बताती हैं. वे कहती हैं, ‘इस पुनर्गठन से मतदाताओं के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी होगी और वार्डों की संख्या बढ़ने से उसी गांव या निकाय में पहले से कहीं ज्यादा अनुदान पहुंचेगा. ऐसे में आख़िरी छोर पर खड़े मतदाता की ज़रूरतों के साथ सही मायने में न्याय हो पाएगा.’ सैनी के लगाए आरोपों पर वे पलटवार करते हुए कहती हैं, ‘कांग्रेस सरकार पंचायतों के पुनर्सीमांकन में पूर्ण पारदर्शिता बरतेगी. परंतु भाजपा सरकार ने ऐसा करने में तमाम मानदंडों को ताक पर रख दिया था. अब उसके नेताओं को अपनी कारगुज़ारी के नाकामयाब होने की फ़िक्र सता रही है.’

हालांकि यह तो वक़्त बताएगा कि कांग्रेस की यह नई रणनीति उसके लिए कितनी फायदेमंद साबित होगी लेकिन हाल-फिलहाल बाकी मोर्चों की तरह पार्टी की अंदरूनी खींचतान यहां भी उस पर भारी पड़ती नज़र आ रही है. गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने स्थानीय निकाय व पंचायताें के पुनर्गठन का फैसला जिस बैठक में लिया था; पंचायतीराज विभाग का जिम्मा संभाल रहे उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश्वर सिंह उससे नदारद रहे थे. बैठक में उनका प्रतिनिधित्व कनिष्ठ अधिकारियों ने किया था.