रस, गंध, रंग और स्वाद. आम के पास सब कुछ मौजूद है. इसीलिए आम होते हुए भी यह खास है. इतना खास कि भारत के धर्म, इतिहास और साहित्य में हर जगह यह अपने अलग-अलग अंदाज में अपने षोडश रसों के साथ मौजूद दिखता है. मध्य युग के विदेशी यात्रियों के संस्मरणों में आम मौजूद है. राजाओं और बादशाहों के किस्सों में भी आम है और हिंदी-उर्दू साहित्य में तो इस आम ने कइयों को खास बना दिया है.

रामचरितमानस में गुरू विश्वामित्र और राम के बीच एक प्रसंग में उल्लेख है कि ‘देखि अनूप एक अंवराई, सब सुपास सब भांति सुहाई’, आमों का एक अनुपम बाग देख कर विश्वामित्र राम से कहते हैं, सुजान रघुवीर मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाए.

महाभारत में भी एक एक प्रसंग में गौर मुख ने युधिष्ठिर की परीक्षा लेने के लिए शरद ऋतु में उनसे एक पका हुआ आम मांगा था . शरद ऋतु में पका हुआ आम आए कहा से? मुसीबत में युधिष्ठिर ने कृष्ण का आहवान किया. कृष्ण ने सच बोल कर एक आम का पौधा बना दिया. युधिष्ठिर ने सच बोल कर उसे वृक्ष बना दिया. इसी प्रकार भीम, अर्जुन व नकुल ने भी सच बोला और वृक्ष में फल लग गए. सहदेव ने सच बोला तो आम बड़े हो गए और द्रोपदी ने सच बोला तो आम पक गए और युधिष्ठिर सच बोलते हुए परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए.

फलों का राजा आम मूलतः भारत का फल है. इतिहास में इस बात का जिक्र मिलता है कि सन 327 ईसा पूर्व में सिकन्दर के सैनिकों ने सिंधु घाटी में आम के पेड़ देखे थे. कालिदास के साहित्य में भी आम का जिक्र है और ह्वेनसांग और इब्ने बतूता के विवरणों में भी आम का उल्लेख मिलता है. मुगल वंश के संस्थापक जलालुद्दीन बाबर ने बाबरनामा में लिखा है, ‘हिन्दुस्तान के अपने फलों में एक अम्बा (आम) है...........कुल मिलाकर यहां का सबसे बढ़िया फल यही है............खाते दो तरह से हैं. एक यों कि नीचे से पिलपिलाते हैं और मुंह पर छेक करके चूसते हैं. या फिर कारदी की तरह छिलका उतार कर.,’ बाबरनामा में आम के प्रसंग में अमीर खुसरो का भी जिक्र है और उर्दू हिंदवी के उस्ताद अमीर खुसरो ने आम पर लिखा भी है, ‘बरस बरस वो देस में आवे, मुंह से मुंह लगा रस पियावे. वा खातिर में खर्चे दाम, ऐ सखि साजन! ना सखि आम.’

आम एक तो वैसे ही सबसे खास, उस पर भी अगर अवध के इलाके का हो तो फिर बात ही क्या कहने. ब्रिटिश काल के अंतिम दौर के अवधी कवि पुष्पेन्दु जैन ने इसीलिए लिखा है, ‘लखनऊ का सफेदा और लंगड़ा बनारस का यही दो आम जग में उत्तम कहायो है. लखनऊ के बादशाह दूध से सिचायो वाको, वाही के वंशज सफेदा नाम पायो है. या से लड़न को बनारस से धायो एक, बीच में ही टूटी टांग, लंगड़ा कहायो है. कहै पुष्पेन्दु वाने जतन अनेक कीने, तबहूं सफेदे की नजाकत न पायो है.’

1846 में जन्मे मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी आम के ऐसे दीवाने थे कि आम के मौसम में आम के सिवा कुछ और बात करना उन्हे कतई पसन्द नहीं था,’ ‘नाम न कोई यार को पैगाम भेजिए. इस फस्ल में जो भेजिए, बस आम भेजिए.’ आज के दौर के लोकप्रिय शायर मुनव्वर राना भी आम की दीवानगी में कहते हैं, ‘इंसान के हाथों की बनाई नहीं खाते, हम आम के मौसम में मिठाई नहीं खाते.’ शायर मिर्जा गालिब तो आम के दीवाने ही थे. मलीहाबाद में जन्मे जोश मलीहाबादी ने हिन्दुस्तान छोड़ने के बाद आहें भरते हुए लिखा था,’ आम के बागों में जब बरसात होगी पुरखरोश, मेरी फुरकत में लहू रोएगी, चश्मे मय फरोश.’

गुलजार ने आम के दरख्त से अपनी जिन्दगी को जोड़ कर लिखा है,’ मोड़ पर देखा है तो बूढ़ा इक आम का पेड़ कभी, मेरा वाकिफ है बहुत सालों से, मैं जानता हूं. ....सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले, मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको.’

नए जमाने के कवि आलोक धन्वा ‘आम के बाग’ में कुछ इस तरह कहते हैं, ‘आम के फले हुए पेड़ों के बाग में कब जाऊंगा?.........हरा और दूधिया मालद है, दशहरी, सफेदा, बागपत का रटौल, डंटी के पास लाली वाले, कपूर की गंध के बीजू आम,.........आम खाने और चूसने के स्वाद से भरे हैं मेरे भी मन प्राण,...........आम जैसे रसीले फल के लिए, भाषा कम पड़ रही है मेरे पास, भारतवासी होने का सौभाग्य तो आम से भी बनता है.’ पत्रकार से दास्तानगो बन कर नाम कमा रहे नौजवान हिमांशु बाजपेयी ने अपनी किताब ‘किस्सा किस्सा लखनउवा’ में आम से जुड़े पुराने जमाने के किस्सों को कुछ इस तरह बयान किया है,

‘जोश मलीहाबाद के परदादा फकीर मोहम्मद खां गोया अवध की शाही फौज में रिसालदार थे.ये वो दौर था जब नसीरूद्दीन हैदर नवाब थे पर चलती धनिया मेहरी की थी. एक दफा किसी बात पर धनिया मेहरी से फकीर मोहम्मद गोया की अनबन हो गई. अब धनिया मेहरी ने नवाब के जरिए गोया साहब को लखनऊ से निकल जाने का हुक्म जारी कर दिया. अब गोया साहब भी कहां कम थे. मलीहाबाद के पठान. ये कहते हुए लखनऊ छोड़ गए कि मैं मलीहाबाद से लखनऊ सिर्फ एक घोड़े के साथ आया था और एक घोड़े के साथ ही यहां से वापस जा रहा हूं. अब वापस मलीहाबाद जो पहुंचे तो उन्होने नवाब को मलीहाबाद की अजमत का अहसास करवाने के लिए एक टोकरी बेहतरीन मलीहाबादी सफेदों की नवाब को भेजी. अब नवाब ने जब वो आम चूसे तो उनकी इज्जत में खो गए. हमारे गांवों में आज भी ये रिवाज है कि पड़ोसी के यहां से आए बरतन खाली नहीं वापस किए जाते. उनमें कुछ न कुछ रखकर ही भिजवाया जाता है. तो नवाब साहब जो कि सफेदे के दीवाने हो चुके थे उन्होने सफेदों की तादाद के बराबर जवाहरात टोकरी में रखकर मलीहाबाद भिजवा दिए. जब ये टोकरी गोया साहब के पास पहुंची तो वो मुस्कुराए और कहा कि हीरे की कद्र जौहरी ही पहचानता है. तो आज से इस सफेदे का नाम जौहरी होगा. तब से मलीहाबादी सफेदे को जौहरी के नाम से जाना जाता है.’

मलीहाबाद के आम खाने के उस्ताद अब्दुल कदीर खां से किसी ने पूछा कि आप एक बार में कितने आम खाते हैं? तो खां साहब ने जवाब दिया-एक दाढ़ी . मतलब ये है कि वे उकड़ूं बैठ जाते थे और आम अपने सामने रख लेते थे. फिर जब तक आम की गुठलियों और छिलकों का ढेर बड़ा होते होते उनकी दाढ़ी को छू नहीं लेता, वे आम खाते रहते थे.

यह बात हुई आम खाने की. मगर मलीहाबाद में ही एक ऐसे भी शख़्स हुए हैं जो आम खाने के लिए नहीं बल्कि आम छीलने के लिए दूर दूर तक मशहूर थे. उनका नाम था मुशीर खां. आम छीलने में उन्हें ऐसी महारथ हासिल थी कि कुएं की जगत पर बैठकर जब मलीहाबादी दशहरी छीलते थे तो मजाल क्या कि छिलका बीच से टूट जाए. इतना महीन छिलका छीलते थे कि छिलका गोल-गोल घूमता हुआ कुएं के पानी में छू जाता था. मगर ये तब की बात थी जब हमारे यहां कुएं बहुत हुआ करते थे और उनमें पानी भी खूब होता था. अब तो कुएं छोड़िए आंख का पानी भी मरता जा रहा है.’

आम पर इन तमाम रसों के जरिए जो कुछ भी कहा गया है उससे कहने वालों की ही शान बढ़ी है. आम तो उनके कहने से पहले भी राजा था, कहने के दौर में भी राजा रहा और हमेशा राजा ही बना रहेगा. कवि विवेक चतुर्वेदी के लफ्जों में आम तो हमेशा हमें देने की सोचता है. वे लिखते हैं, ‘चुप रह कर अगले बरस के फागुन को सोचता है आम का पेड़. जब कोयल कूक के मांगेगी अपना दाय, तब उजास भरी बौर सा बरस जाएगा. और पत्तों सा हरा हो जाएगा समय. जो था रंग रस गंध/सब दे चुका बैसाख में. बस अब दे सकेगा जरा सी छाया. सोचता है आम का पेड़. सोचता है कुछ और फल जने होते मैंने.’

मंडियों, बाजारों और बड़े बड़े माॅलों से लेकर फुटपाथ के ठेलों तक हर गरीब-अमीर के लिए सुलभ आमों को खाने का मजा ही कुछ और है लेकिन आम के बागों में बैठ कर आम की दावतों का लुत्फ लेना तो वाकई परम आनंद पाना है. इसीलिए अवध में आम की दावतें अब भी होती है और खाने वाले तथा खिलाने वाले दोनों को ही तृप्त करती हैं.