निर्देशक : अश्विन सरावनन

लेखक : अश्विन सरावनन, काव्या रामकुमार, श्रुति मदान (हिंदी संवाद)

कलाकार : तापसी पन्नू, विनोदिनी वैद्यनाथन

रेटिंग : 3.5/5

‘गेम ओवर’ किसी एक जॉनर की फिल्म नहीं है. कई सारे जॉनर का जैसे क्रॉसओवर है. होम इन्वेजन से लेकर साइकोलॉजिकल थ्रिलर और सुपरनैचुरल थ्रिलर फिल्मों तक के तत्व इसमें आपको मिलेंगे. सबसे खास है कि कुछ घटनाक्रमों को छोड़कर बाकी पूरी फिल्म में आप तभी ये जान पाएंगे कि आगे क्या होगा, जब खुद फिल्म आपको ये बताएगी.

कई सारे दिलचस्प जॉनर का खुद में समावेश करने की वजह से ही ‘गेम ओवर’ का सबसे मजबूत पक्ष इसकी पटकथा का आखिर तक यूं ही ‘अप्रत्याशित’ बने रहना है.

जब आपको किसी फिल्म के जॉनर की जानकारी पहले से होती है तो आप उसकी कहानी का काफी हद तक अंदाजा लगा लेते हैं. लेकिन थ्रिलर फिल्में बनाते वक्त समझदार निर्देशक अक्सर मुख्तलिफ जॉनर के तत्व अपनी कहानी में मिलाते रहे हैं और दर्शकों की समझ से आगे की पटकथा लिखने में सफल होते रहे हैं. दक्षिण भारतीय फिल्मों के युवा निर्देशक अश्विन सरावनन भी ऐसे ही समझदार फिल्मकार मालूम होते हैं! उनकी ‘गेम ओवर’ एक ‘हाई कॉन्सेप्ट’ थ्रिलर फिल्म तो है, लेकिन ऐसी अलहदा कि हिंदुस्तानी सिनेमा में आज तक शायद ही इस तरह की ‘मौलिक फिल्म’ आपने पहले कभी देखी होगी.

हाई कॉन्सेप्ट फिल्में वे होती हैं जिनकी नींव किसी एक अभूतपूर्व विचार (कॉन्सेप्ट) या प्रिमाइस पर टिकी होती है. ‘लो कॉन्सेप्ट’ फिल्मों की तरह वे कैरेक्टर डेवलपमेंट और किरदारों की यात्रा की बारीकियों पर ज्यादा ध्यान नहीं देतीं. बल्कि एक खास कॉन्सेप्ट और उसके होने से पैदा हुईं परिस्थितियों को ही अपनी फिल्म मानकर चलती हैं. जैसे ‘जुरासिक पार्क’ एक हाई कॉन्सेप्ट फिल्म है जिसका अभूतपूर्व विचार था कि अगर आज के समय में डायनासोर होते तो क्या होता. ‘ग्राउंडहॉग डे’ (1993) एक और उदाहरण है जिसका हाई कॉन्सेप्ट था कि नायक को एक ही दिन बार-बार जीना पड़ता है. ‘गेम ओवर’ में अतीत की एक घटना से जूझ रही वीडियो गेम बनाने वाली नायिका को व्हीलचेयर पर रहते हुए एक सीरियल किलर से बचना है, और होम इन्वेजन फिल्मों की तरह अपनी रक्षा अपने घर के अंदर करनी है.

लेकिन, टिपिकल होम इन्वेजन फिल्मों जैसी नजर आने के बावजूद ‘गेम ओवर’ में गजब की गहराई और निरालापन है. एक तो फिल्म का नाम ‘गेम ओवर’ बेवजह नहीं है बल्कि वीडियो गेम्स का गहरा नाता फिल्म से जुड़ा हुआ है. दूसरा ये महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर बात करती है और उसके मनोवैज्ञानिक परिणामों को भी कमाल अंदाज में पटकथा का हिस्सा बनाती है. ऐसा करके साइकोलॉजिकल थ्रिलर की तरह बर्ताव करती है और आप शुरुआत में कई बार बूझ नहीं पाते कि तापसी पन्नू का पात्र जिन घटनाक्रमों से गुजर रहा है वो यथार्थ है या उसके ट्रॉमा का हिस्सा. फिर फिल्म सुपरनैचुरल थ्रिलर फिल्मों के भी तत्व खुद में शामिल करती है और खुद को अलग ही दर्जे की फिल्म बना लेती है.

आपको पता ही होगा कि सुपरनैचुरल फिल्में बनाना काई पर चलने जैसा होता है. अगर दर्शक फिल्म में दिखाई जा रहीं सुपरनैचुरल या अलौकिक घटना से ‘कनेक्ट’ कर पाया तब तो फिल्म उस पर असर करेगी, वर्ना यह अतिशयोक्ति दर्शकों की हंसी का पात्र बनेगी और फिल्म रपट जाएगी. ‘स्त्री’ जैसी हॉरर-कॉमेडी फिल्म में भी आपको यह कल्पना स्वीकारनी होती है कि कहानी में एक ऐसी चुड़ैल है जो घर-घर जाकर मर्दों को उठा लेती है क्योंकि अतीत में उसके साथ बुरा सुलूक हुआ था. ऐसा करने के बाद ही मजेदार ‘स्त्री’ अपना असर आप पर छोड़ पाती है.

‘गेम ओवर’ के साथ भी यही है. अगर इसकी कहानी में मौजूद ‘इमोशन्स’ में लिपटा ‘सुपरनैचुरल एलीमेंट’ आपको पसंद नहीं आया तो फिल्म का आखिरी हिस्सा आपके लिए हंसी का पात्र बन जाएगा. लेकिन अगर आया – जैसा कि हमें आया और उम्मीद है कि ज्यादातर को आएगा क्योंकि सुपरनैचुरल का अर्थ ही अतिशयोक्ति के पंखों पर कल्पना का उड़ान भरना होता है –तो फिर ‘गेम ओवर’ आपके लिए बेहद मनोरंजक फिल्म साबित होगी. वैसे भी फिल्म का तकनीकी और अभिनय पक्ष इतना उम्दा है कि ये आपको आखिर तक कहानी से बांधे रखता है और इस सुपरनैचुरल एलीमेंट को स्वीकारने के बाद तो फिल्म पल-पल चौंकाता खालिस मनोरंजक सिनेमा ही बन जाती है.

‘गेम ओवर’ का आखिरी हिस्सा भी खासा नायाब है और फिल्म को एक अलहदा और संतुष्ट अंत देता है. आप फिल्म खत्म होने के बाद एक अच्छा सिनेमा देखने की तृप्ति से भर जाते हैं. लेकिन, क्लाइमेक्स के और भी बेहतर हो सकने की गुंजाइश के चलते खालीपन भी साथ आता है. दरअसल यह फिल्म ‘रशियन डॉल’ और ‘एज ऑफ टुमॉरो’ के स्तर का बहुत कुछ नायाब घटनाक्रम आखिर में रच सकती थी और ऐसा करके अभूतपूर्व व झकझोरकर रख देने वाली फिल्म बन सकती थी. लेकिन एक अच्छी, दर्शनीय, मौलिक फिल्म से आगे का सफर ‘गेम ओवर’ तय नहीं करती.

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी बेहद लाउड है. कई बार तो ये डराने के बिलकुल काम आता है और आप इसके बीजीएम की तारीफ करते हैं, लेकिन कई जगहों पर बेवजह ही लाउड मालूम होता है. तमिल-तेलुगू में बनकर हिंदी में डब होना भी ‘गेम ओवर’ के असली असर को दो-चार ग्राम कम कर देता है. ‘मौलिक शुद्धता’ वाले फैक्टर के चलते ओरिजनल की तुलना में डब हुआ वर्जन हमेशा कम असर रखता ही है. हालांकि फिल्म में दो ही मुख्य किरदार हैं और संवाद भी बेहद कम हैं, लेकिन जहां हैं वहां हिंदी डबिंग बेहद औसत है और आंखों-कानों को चुभती है.

ऐसे वक्त में हमारी एक ट्रिक अपनाकर आप औसत हिंदी डबिंग की कमियों को थोड़ा-बहुत नजरअंदाज करने में सफल हो सकते हैं! स्क्रीन पर किरदारों को देखते वक्त आप उनके संवाद बोलते होंठों की तरफ न देखकर केवल उनकी आंखों की तरफ ही देखिए. ऐसा करने से होंठों पर जो संवाद आउट ऑफ सिंक नजर आकर खीज पैदा करते हैं उनका जन्म लेना कम हो जाएगा!

केवल 102 मिनट की बेहद चुस्त ‘गेम ओवर’ में मुख्यत: दो ही किरदार हैं. नायिका का खयाल रखने वालीं और उसका घर संभालने वाली प्रौढ महिला कलम्मा के रोल में विनोदिनी वैद्यनाथन और नायिका सपना के रोल में तापसी पन्नू. नायिका की प्लेट से कौर तोड़कर नमक चखने वालीं और उसके थैरेपी सेशन में साथ जाने वाली कलम्मा के रोल में विनोदिनी वैद्यनाथन ने प्रभावशाली काम किया है. अक्सर ऐसे रोल केवल रिक्त स्थान भरने के काम आते हैं लेकिन तमिल फिल्मों की यह अभिनेत्री स्क्रीन प्रेजेंस के मामले में तापसी की टक्कर में खड़ी मिलती हैं.

तापसी पन्नू ज्यादातर वक्त बैठीं, लेटीं, और व्हीलचेयर के चक्के घुमाती मिलती हैं और किरदार को अभिव्यक्त करने के लिए ज्यादातर वक्त आधा ही शरीर मिलने के बावजूद कमाल का अभिनय करती हैं. किरदार के डर को, अतीत की एक घटना के दोबारा सर उठाने पर पैदा हुई सिहरन को, खुद के अकेले होने से इकट्ठा हो रहे ट्रॉमा को मकबूल अभिव्यक्ति देती हैं. भावुक दृश्यों को अभिव्यक्त करने में यह अभिनेत्री हमेशा से अव्वल रही है और यहां वो ट्रॉमा, डर और अनिश्चितता की भी सुघड़ अभिव्यक्ति हमारी नजर करती है.

वैसे भी हिंदी सिनेमा की समकालीन अभिनेत्रियों से तापसी पन्नू इतनी अलग तरह की अभिनेत्री हैं कि उनके ‘रिएक्शन्स’ नायाब घटनाओं के अलावा हर घिसी-पिटी, दोहरावग्रस्त सिनेमाई घटना पर भी निराले ही हमारी नजर होते हैं. समझ आता है कि वे मैथड एक्टर नहीं हैं, बल्कि खुद को किरदार मानकर सेट पर उसकी तरह की जिंदगी जीने लगती होंगी और इसी वजह से फिल्म दर फिल्म मुख्तलिफ और मुश्किल किरदारों को ‘सहजता’ से ओढ़ पाती होंगी. उनको सलाम!

ऐसी साहसी फिल्म करने के लिए, और ऐसी दिलचस्प व मौलिक फिल्म को साउथ से नॉर्थ लाने के लिए.