निर्देशक : चक्री तोलेटी
कलाकार : प्रभु देवा, तमन्ना भाटिया, संजय सूरी, भूमिका चावला
रेटिंग : 1/5

शायद ही कोई इस बात से असहमत हो कि फिल्मों का पहला काम मनोरंजन करना होता है. लेकिन कुछ फिल्में शायद ऐसी होती हैं जो आपको एक अंधेरे-सर्द कमरे में बिठाकर मनोरंजन के बजाय टॉर्चर करने के लिए बनाई जाती हैं. और अगर इस टॉर्चर से सैकड़ों और लोगों को बचाने की जिम्मेदारी आप पर है तो इसका मतलब है कि हॉल से बाहर निकल जाने का रास्ता होते हुए भी आपके लिए नहीं होता है. ‘खामोशी’ एक ऐसी ही भयावह फिल्म है. यह एक और मायने में भयावह है. यह आपको बेवजह ही और इतना डराती है कि घर लौटने के बाद दरवाजे पर होने वाली हर आहट को आप किसी सीरियल किलर की आमद मानने लगते हैं.

साल 2016 में रिलीज हुई हॉलीवुड थ्रिलर ‘हश’ के हिंदी रीमेक को खामोशी नाम दिया गया है. ‘हश’ एकांत में रहने वाली एक मूक-बधिर लेखिका की कहानी थी. यह लेखिका अपनी जिजीविषा के चलते एक अनजान-सिरफिरे सीरियल किलर से रात भर उलझती है और जीतती है, फिल्म उसके इसी संघर्ष को दिखाती है. इसके उलट ‘खामोशी’ विरासत में करोड़ों की प्रॉपर्टी पाने वाली एक पेंटर का किस्सा दिखाती है जिसके आसपास के तमाम लोग उसके खिलाफ साजिश कर रहे हैं. मूल फिल्म से इतर ‘खामोशी’ अपनी मूक-बधिर नायिका और किलर के बीच भी एक कनेक्शन दिखाकर इसे इमोशनल बनाने की एक नाकामयाब कोशिश करती है.

लगातार मौत और जिंदगी के बीच लुका-छुपी दिखाने वाली ‘हश’ का हर दृश्य आपको एक बराबर मात्रा में अचंभित करने वाला था जबकि ‘खामोशी’ कुछ ही समय बाद आपको इरीटेट करने का काम अपने हाथ में ले लेती है. यह मूल फिल्म के कुछ आइकॉनिक दृश्यों को जरा ट्विस्ट के साथ रिक्रिएट करने की कोशिश करती भी है तो वे अपने उथलेपन के चलते आप पर कोई असर नहीं छोड़ पाते हैं.

मूक-बधिर नायिका सुरभि की भूमिका में तमन्ना भाटिया खामोशी में सबसे ज्यादा समय तक स्क्रीन पर नजर आती हैं. वे अपने कुछ एक्सप्रेशन्स बार-बार दोहराती हैं. लेकिन इसमें उनकी कोई गलती है. फिल्म में उनके पास डरने और डरकर भागने के अलावा कुछ और करने के लिए है ही नहीं. इसमें साइकोपैथ किलर की भूमिका प्रभु देवा ने निभाई है. अपने चेहरे से तो वे कुछ स्टैंडर्ड एक्सप्रेशंस ही दे पाते हैं लेकिन उनकी देहबोली उनके किरदार को भयावहता देने में कारगर साबित होती है. इसके बावजूद कुछ समय बाद उन्हें बार-बार वही करते देखकर बोरियत होने लगती है. खास तौर पर प्रभुदेवा और उनके पिता की भूमिका निभा रहे विक्रम भट्ट के बीच के संवाद बहुत ज्यादा खीझ पैदा करते हैं. साथ ही ये फिल्म में मौजूद रोमांच की रही-सही संभावना को भी खत्म कर देते हैं. महज दो दृश्यों के लिए नज़र आए संजय सूरी और भूमिका चावला भी फिल्म में केवल विक्टिम्स की गिनती बढ़ाते ही नज़र आते हैं.

तमिल फिल्म निर्देशक चक्री तोलेटी ने ‘खामोशी’ का निर्देशन किया है. हिंदी के साथ-साथ उन्होंने यह फिल्म तमिल में भी बनाई है. इसके तमिल वर्जन (कोलाइयुथिर कालम) में तमन्ना भाटिया वाली भूमिका तमिल स्टार नयनतारा ने निभाई है. फिलहाल, इसके हिंदी वर्जन में पटकथा का न होना और कुछ गैरजरूरी किरदारों का होना इसकी सबसे बड़ी कमी है. आप चाहें तो कुछ नया करने की कोशिश के लिए निर्देशक की पीठ थपथपा सकते हैं. लेकिन हमारी सलाह यह है कि इसके लिए भी आप खामोशी के नेटफ्लिक्स या टीवी पर आने का इंतजार करेंगे तो बेहतर होगा!