रोज़ शाम को जब कश्मीर घाटी की सबसे मशहूर रेडियो जॉकी (आरजे) राफिया रहीम श्रीनगर के हैदरपोरा में स्थित रेडियो मिर्ची के ऑफिस से अपने घर की तरफ निकलती हैं तो सबसे पहले स्कार्फ से अपने खुले हुए बाल ढक लेती हैं. बारीकी से देखें तो इससे एक पुराने खयालात वाले माहौल की गंध आ सकती है. लेकिन राफिया की मानें तो लोगों से मिल रहे प्यार और स्नेह के सामने यह एक बहुत छोटी सी बात है. सत्याग्रह से बात करते हुए वे कहती हैं, ‘मुझे लोगों से बहुत प्यार मिल रहा है. और मुझे लगता है ये छोटी-छोटी चीज़ें उस प्यार के सामने कोई मायने नहीं रखतीं.’

कश्मीर घाटी में काम कर रहीं और भी महिला आरजे अपने मन की करने में यकीन रखती हैं. इसके बावजूद उनको भी बेशुमार प्यार मिल रहा है. छोटी-छोटी अड़चनों के बावजूद कश्मीर में रेडियो इंडस्ट्री पर महिला आरजे राज कर रही हैं चाहे वे राफिया हों या रेड एफएम की युसरा हुसैन (उपनाम आरजे सोफी) या रेडियो मिर्ची की ही महक या फिर बिग एमएम की फरहुमा इकबाल. युसरा कहती हैं, ‘ये आरजे अपना काम बखूबी निभा रही हैं जो हैं लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाना.’

कश्मीर घाटी में एफएम देश में पहला निजी एफएम चैनल के शुरू होने के लगभग छह साल बाद 2007 में आया था. रिलायंस के बिग 92.7 के रूप में. तब से अब तक कश्मीर घाटी में रेडियो इंडस्ट्री सिर्फ आगे की तरफ बढ़ती दिखाई दी है. इस समय कश्मीर में निजी एफएम चैनलों की संख्या चार है जिनमें मिर्ची, रेड एफएम और एफएम तड़का शामिल हैं. यह विकास कश्मीर में चल रहे खराब हालात के बावजूद हुआ है. कश्मीर लाइफ मैगज़ीन में काम कर रही पत्रकार साइमा भट कहती हैं, ‘महिला आरजे लोगों में इतनी लोकप्रिय हैं और ये अपने आप में एक बुहत बड़ी बात है.’

लेकिन कश्मीर अन्य राज्यों जैसा नहीं है. यहां समाज अभी भी बहुत खुला नहीं है. साथ ही कश्मीर हिंसा से भी जूझ रहा है और यहां हर एक चीज़ को यहां के खराब हालात से जोड़ दिया जाता है. इसके अलावा अब इन लड़कियों के लिए सोशल मीडिया पर रहना भी ज़रूरी हो गया है तो लोग इन्हें पहचानने लगे हैं, जिसके चलते इनका काम थोड़ा और मुश्किल हो गया है.

पहले बात करते हैं इन लड़कियों के नजरिये से कश्मीर के समाज की. राफिया के मुताबिक उनको दिन भर में सोशल मीडिया और फोन के जरिये सैकड़ों संदेश मिलते हैं जिनेमं लोग उनको बताते हैं कि वे उनको प्रेरित करती हैं. वे कहती हैं, ‘चीज़ें धीरे धीरे बदल रही हैं. मेरे अपने घरवालों ने मेरे जर्नलिज़्म पढ़ने पर पहले विरोध किया था, लेकिन अब जबकि उन्हें लगता है कि मैं उनका नाम रोशन कर रही हूं तो वो भी खुश हैं. और लोग भी सराह रहे हैं.’

लेकिन साथ ही साथ राफिया एक और बात भी बताती हैं. उनके मुताबिक दस में से तीन लोग ऐसे भी होते हैं जो, चाहे आप कुछ भी कर लें, आप में नुक्स निकाले बिना नहीं रह सकते. राफिया बताती हैं, ‘जैसे कुछ दिन पहले मुझे सोशल मीडिया पे एक मैसेज मिला था जिसमें भेजने वाले ने लिखा था कि मैं अपनी आवाज़ की नुमाइश करती हूं और मुझे यहां के बजाय अपने घर की चारदीवारी में होना चाहिए था.’ राफिया के मुताबिक ऐसे लोगों को सिर्फ नज़रअंदाज़ ही किया जा सकता है. वे कहती हैं, ‘क्योंकि इन्हें आपकी बात समझ में आनी नहीं है और ज़्यादा ज़रूरी वो सात लोग हैं जो आपको प्यार दे रहे हैं और सराह रहे हैं.’

युसरा कश्मीर की सबसे पहली आरजे में से एक हैं. वे कहती हैं कि जब उन्होंने शुरुआत की थी उसकी तुलना में अभी का माहौल और पुरातनपंथी हो गया है. युसरा बताती हैं, ‘उसकी वजह मेरे खयाल से सोशल मीडिया का आगमन है. नकारात्मक सोच थोड़ी सी बढ़ गई है और अगर आप की बात किसी को सही नहीं लगती तो वो आप के बारे में अंदाजे लगाना शुरू कर देते हैं.’

युसरा को भी कुछ समय पहले सिर पर दुपट्टा न रखने के लिए सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया था. इसके बावजूद वे कहती हैं कि उनका अभी तक का सफर बहुत अच्छा रहा है. सत्याग्रह से बातचीत में वे बताती हैं, ‘इन छिटपुट घटनाओं को परे रखें तो लोगों ने बहुत प्यार दिया है और बहुत सराहा है.’ एक बच्ची की मां युसरा आगे कहती हैं, ‘सबसे बड़ी चीज़ मेरे लिए ये है कि मेरे माता पिता और मेरे ससुराल वाले हमेशा मेरे साथ खड़े रहे हैं. मुझे उनसे बहुत प्रेरणा और समर्थन मिलता रहा है.’

बिग एफएम की फरहुमा, जो दो बच्चों की मां हैं, कहती हैं कि उन्होने अभी रेडियो में शुरुआत ही की है, लेकिन वे इसे लेकर बिल्कुल साफ हैं कि वे करेंगी वही जो उनको ठीक लगेगा. फरहुमा कहती हैं, ‘मुझे नहीं लगता किसी और को मेरे निजी मामलों में बोलने की कोई इजाज़त होगी. मैं वही करूंगी, वही पहनूंगी जो मुझे और मेरे घरवालों को सही लगेगा.’

रही बात कश्मीर में चल रहे अलगाववाद और उससे जुड़े मुद्दों की तो ये सभी आरजे मानती हैं कि लोगों के जज़्बात का खयाल रखना पड़ता है. आए दिन कश्मीर में हत्याएं, मुठभेड़ें और दूसरी हिंसक घटनाएं होती रहती हैं. ऐसे में इन लोगों को भी काफी ध्यान रखना पड़ता है कि वे रेडियो पर क्या बोल रही हैं और क्या चला रही हैं. युसरा कहती हैं, ‘हम इसका खासा ख्याल रखते हैं. जैसे कहीं कोई हत्या हुई है तो संगीत थोड़ा डाउन करके कुछ और चला देते हैं. हमने पूरे रमज़ान सिर्फ धार्मिक संगीत चलाया है.’

लेकिन राफिया का इस बात को देखने का थोड़ा अलग नज़रिया है. वे कहती हैं कि हिंसा के चलते कश्मीर में लोग काफी उदास और दुखी रहते हैं और ऐसे में उनकी बातें या जो संगीत वे चलाती हैं, किसी के चेहरे पर मुस्कराहट बिखेर दें तो उससे अच्छा क्या हो सकता है. राफिया कहती हैं, ‘आप खुद देखते होंगे लोग कितने दुखी हैं यहां. अगर हम किसी की खुशी का साधन बन रहे हैं तो हर्ज क्या है?आप मेरा इंस्टाग्राम अकाउंट देख लें, आपको पता चल जाएगा लोग कितना एंजॉय करते हैं हमारे प्रोग्राम.’. राफिया के इंस्टाग्राम पर करीब 27 हज़ार फ़ालोअर हैं.

दिलचस्प बात यह है कि इन लड़कियों ने न सिर्फ अपने लिए जगह बनाई है बल्कि ये लोग नयी पीढ़ी की लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बनती जा रही हैं, खास तौर पर राफिया. उसकी वजह यह है कि बाकी आरजे श्रीनगर की रहने वाली हैं और उस तबके से ताल्लुक रखती हैं जिसे पैसे वाला माना जाता है. लेकिन राफिया श्रीनगर से बाहर की कश्मीर में पहली आरजे हैं और देखा जाये तो एक मध्यम वर्ग परिवार से आती हैं. राफिया के पिता बढ़ई थे जो पिछले साल चल बसे. वे कहती हैं कि जब उनके जैसे किसी परिवार से कोई लड़की कुछ कर लेती है तो वह उनके जैसी हजारों लड़कियों के लिए एक रास्ता भी खोल देती है.

राफिया बताती हैं, ‘मैंने जब जर्नलिज़्म किया था तो मुझे पता भी नहीं था आगे क्या होगा. लेकिन रास्ते निकलते गए. आजकल मेरे पास सैकड़ों लड़कियां आती हैं और मुझसे मार्गदर्शन लेती हैं. बहुत खुशी होती है इससे.’ वे कहती हैं कि वे खुशी खुशी हर उस लड़की का मार्गदर्शन करती हैं, जो उनके पास उम्मीद लेकर आती है.

अब आगे राफिया, युसरा, फरहुमा और महक जैसी और कितनी लड़कियां कश्मीर में रेडियो और इसके जैसे अन्य माध्यमों की तरफ रुख करती हैं, बहुत ही दिलचस्प और देखने वाली बात होगी.