देश के ज्यादातर हिस्से जहां आज भी माहवारी से जुड़े मिथकों से नहीं छूट पाए हैं, वहीं एक राज्य ऐसा भी है जो इसे उत्सव की तरह मनाता है. ओडिशा में हिंदू चंद्र कलैंडर के अनुसार ज्येष्ठ महीने की त्रयोदशी (शुक्ल पक्ष की तेरह तारीख) से आषाढ़ महीने की प्रतिपदा (कृष्ण पक्ष की पहली तारीख) तक चार दिन लंबा माहवारी उत्सव मनाया जाता है. इसे ‘रज पर्ब’ कहा जाता है. यहां पर रज शब्द रजस्वला होने से लिया गया है और इसी वजह से यह पर्व चार दिन तक चलता है.

इस उत्सव के पहले दिन को पहली रज कहा जाता है, दूसरे दिन को मिथुन संक्रांति और तीसरे दिन को बासी रज. रज पर्ब के आखिरी दिन को बासुमती स्नान कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस उत्सव के पहले तीन दिनों के दौरान धरती यानी भूदेवी अपने मासिक चक्र से गुजरती है. चौथा दिन यानी आषाढ़ का पहला दिन – जिससे बारिश की शुरूआत भी मानी जाती है – उसके स्नान करने का समय होता है. इस उत्सव के दौरान खेती-किसानी का कोई काम नहीं किया जाता है.

इस पर्व को मिथुन संक्राति के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि पर्व के खत्म होने के बाद सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करता है. यानी कि सूर्य कलैंडर के हिसाब से तब मिथुन का महीना शुरू हो जाता है. रज पर्ब को मनाए जाने का समय मानसून के आने का समय भी होता है. इस दौरान खेती-किसानी के काम शुरू किए जाते हैं और माना जाता है कि धरती बारिश के साथ मिलकर उत्पादन करने के लिए खुद को तैयार करती है.

रज पर्ब के दौरान राज्य भर में महिलाएं और लड़कियां नए कपड़े खरीदती हैं और मेंहदी, कुमकुम, आलता लगाकर इसे मनाती हैं. इस पर्व को मनाने के लिए ज्यादातर घरों में झूला भी डाला जाता है और महिलाएं इन पर झूलते हुए पारंपरिक गीत गाती हैं. विख्यात कलाकार सुदर्शन पटनायक ने इसे अपनी रेत की कलाकृति में भी दर्शाया है (ऊपर चित्र देखें). इस दौरान आधी रात तक लूडो, ताश जैसे खेलों के साथ-साथ बागुड़ी या बोहु चोरी जैसे स्थानीय खेल खेलने की भी परंपरा है.

कुछ समय पहले शहरों में यह परंपरा धीरे-धीरे घटने लगी थी. लेकिन सोशल मीडिया और राज्य सरकार के प्रयासों की वजह से अब यह त्यौहार फिर से चर्चा बटोरने लगा है. ऐसी सांस्कृतिक धरोहर को बनाए रखने के लिए ओडिशा की तारीफ की जानी चाहिए. इसलिए भी कि इस तरह के उत्सव माहवारी जैसे विषय को हमारी संस्कृति का हिस्सा बनाकर समाज को इनके प्रति सहज बनाने का काम कर सकते हैं.