प्रेम भारद्वाज द्वारा संपादित एक नयी पत्रिका ‘भवन्ति’ के प्रवेशांक के अवसर पर ‘साहित्य में जनतंत्र’ विषय पर एक परिचर्चा हुई. हम यह अक्सर भूल जाते हैं कि पिछले लगभग सात दशकों में जो साहित्य लिखा-पढ़ा गया है, वह जनतंत्र के अंतर्गत लिखा-पढ़ा गया है और ऐसा हमारे और साहित्य के इतिहास में पहली बार हुआ है. जनतंत्र के पांच तत्व विशेष हैं- चुनने की स्वतंत्रता, दृष्टियों की बहुलता, प्रश्नवाचकता, संवाद और असहमति की जगह और हर तरह की अल्पसंख्यकता का समावेश. हमें यह भी याद करना चाहिये कि संवैधानिक जनतंत्र लागू होने के सदियों पहले से साहित्य में जनतंत्र रहा है. भक्ति काव्य में तो कविता और अध्यात्म को एक साथ प्रश्नवाची, जनसुलभ और जनतांत्रिक बना दिया गया था. कबीर और तुलसी दोनों ही प्रश्नवाची हैं. एक हर धार्मिक सत्ता को चुनौती देता है तो दूसरा दी गयी सत्ता का रामराज्य के रूप में विकल्प सुझाता है जिसमें हर नागरिक को राजा द्वारा अनीति करने पर टोकने का अधिकार और अवसर हो.

राजनैतिक स्वतंत्रता हमें जब मिली उससे बहुत पहले से साहित्य में स्वतंत्रता थी. छायावाद, राष्ट्रीयतावादी काव्य, गद्य आदि सभी औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिरोध में थे और मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, प्रेमचंद, अज्ञेय आदि सभी स्वतंत्रतापूर्व के लेखक सत्ता-विरोधी थे. स्वतंत्रता मिलने और संविधान के अंतर्गत जनतंत्र स्थापित होने के थोड़े ही दिनों बाद मोहभंग हुआ और लोकतांत्रिक सत्ता के बारे में साहित्य में प्रश्न उठे. यह आकस्मिक नहीं है कि पिछले 70 के हिंदी साहित्य का मुख्य स्वर व्यवस्था-विरोध का रहा है. उसमें प्रश्नवाचकता, धर्मनिरपेक्षता, संवाद, असहमति, वाद-विवाद-संवाद आदि की जनतांत्रिक जगह और संभावना रही है. इधर हिंदी प्रदेश में जो व्यापक राजनैतिक परिवर्तन हुए हैं. उनकी एक विडंबना यह है कि उसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ऐसी शक्तियों को अपना समर्थन फिर दिया है जो अब लोकतांत्रिक कटौती के लिए अधिकृत महसूस करेंगी.

इसकी फिर पुष्टि हुई है कि आज हिंदी साहित्य हिंदी समाज का असली और टिकाऊ प्रतिपक्ष है. हिंदी लेखक को यह स्वीकार करना चाहिये कि साहित्य राजनीति के लिए पूरी तरह से अप्रासंगिक हो गया है. इतना दिलासा हम अपने को दे सकते हैं कि कट्टरता-हिंसा-हत्या-घृणा-अन्याय-जातिवाद की राजनीति से हमारा कुछ लेना-देना नहीं है. हम बहुलता, प्रश्नवाचकता, सच और असहमति पर अपना इसरार तेज़ करेंगे तो आज की राजनीति और सत्ता के लिए हमारी अप्रासंगिकता बढ़ेगी. हम आज अप्रासंगिक माने जाकर ही सच बोल सकते हैं, जनतांत्रिक हो सकते हैं. हिंदी अंचल की राजनीति से अलग, उसके विरुद्ध हिंदी साहित्य संकीर्णता, हिंसा-हत्या-घृणा की मानसिकता, दलितों-स्त्रियों-मुसलमानों आदि पर अत्याचारों का विरोध कर अपना नैतिक, सांस्कृतिक और जनतांत्रिक धर्म निभा सकता है.

हिंदी समाज का अंत:करण संक्षिप्त हो रहा है. साहित्य इस समय अंत:करण होकर ही अपनी जनतांत्रिक भूमिका निभा सकता है. एक हताश प्रश्न उठता है, क्या हमारा जनतंत्र इस समय साहित्यातीत हो गया है? शायद जनतंत्र ने अपने मौजूदा स्वरूप में साहित्य को पीछे छोड़ दिया है. अब हम राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल नहीं, स्वयं जनतंत्र द्वारा उपजाये-पोसे-बढ़ाये अंधेरे में कुछ मोमबत्तियां भर हैं. रवीन्द्रनाथ ने कभी कहा था कि एक नन्हा सा दीपक भी संसार को आलोकित करता है.

विचार में विलाप

समाजशास्त्री और कलाप्रेमी सुरेश शर्मा के लिए आयोजित स्मृति सभा में यह स्पष्ट हुआ है कि इस सौम्य, शान्त पर अपनी दृष्टि पर दृढ़ विचारक के लिए बौद्धिक समाज में कितना गहरा सम्मान रहा है. वे जड़ों पर जमे थे पर उनकी जिज्ञासा अथक थी. उन्होंने आदिवासी समाज, जीवन और विश्वदृष्टि का गहरा और ज़मीनी अन्वेषण किया था. आधुनिकता से उनकी एक बड़ी शिकायत यह थी कि उसने आदिवासी जीवनबोध और पेगन दृष्टि को अतिक्रमित कर दिया.

सुरेश शर्मा को गांधी-150 में, बहुत कृतज्ञतापूर्वक, उनके द्वारा बहुत जतन से संपादित ‘हिन्द-स्वराज’ के नये संस्करण के लिए भी याद किया जाना चाहिये. उनके निजी और सामाजिक व्यवहार में उनकी सौम्यता और दृढ़ता को एक तरह के गांधी-व्यवहार की तरह आसानी से देखा-समझा जा सकता है. अपने इतिहास और नृतत्व के अनुशासन से अलग सुरेश की कई क्षेत्रों के मूर्धन्यों से गहरी मित्रता और संवाद थे. उसमें दार्शनिक रामचन्द्र गांधी, चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन, लेखक निर्मल वर्मा, फ्रेंच बुद्धिजीवी एलांसूपियो आदि शामिल हैं. उन्होंने रज़ा की चित्रकला के बहाने ‘शून्य’ पर एक रोचक संवाद आयोजित किया था और कई बरस बाद रज़ा फ़ाउंडेशन के लिए ‘शब्द और बिम्ब’ पर एक अन्तरराष्ट्रीय परिसंवाद भी जो कि निर्मल वर्मा और जगदीश स्वामीनाथन की स्मृति में था.

सुरेश ने उदयन वाजपेयी के साथ एक लंबी बातचीत में कहा था, ‘आधुनिक चेतना का स्वबोध यह है कि उसने मानव इतिहास में पहली बार सर्वव्यापकता के स्वप्न को साकार कर दिया है. उसका यह मानना है कि उसके पहले की सर्वव्यापकता की कल्पना संकीर्ण और आंशिक थी और वह कभी भी सचमुच साकार नहीं हो सकती थी. वह स्वप्न मात्र थी. आधुनिक चेतना यह मानती है कि उसने मानव कल्पना में निहित दीर्घ प्रामाणिक तत्वों को यथार्थ रूप दिया है. एक अर्थ में जो आधुनिकता के पहले धुंधले विराट् अतीत में मात्र स्वप्न की मरीचिका या सान्त्वना थी, उसने उसे यथार्थ कर दिया है. ... उसका दावा है कि वह स्वर्ग को एक अर्थ में ज़मीन पर ले आयी है. पेगन बोध में सत्य की सर्वव्यापकता ऐसी है कि ऐसा कोई स्थान नहीं, ऐसा कोई काल नहीं, कोई ऐसी भाषा नहीं जिसमें वह घटित न होता हो.’

उसी बातचीत में आगे सुरेश ने कहा, ‘गांधी भले ही महान उपनिवेश-विरोधी आंदोलन के महान् नायक रहे हों, उनके लेखन-अभिव्यक्ति में राष्ट्र-राज्य के विषय या आदर्श पर लगभग कुछ नहीं है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के महान प्रणेता सावरकर के पास संस्कृति पर कहने को कुछ नहीं है. गांधी का बड़ा योगदान यह रहा है कि विराट राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व करते हुए कठिन से कठिन संघर्ष के क्षणों में उन्होंने राष्ट्रवाद के प्रति अपनी आलोचनात्मक दृष्टि को जीवंत बनाये रखा.’

सुरेश ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘... इस तरह का सभी प्राणियों के प्रति दायित्वबोध दूसरी परम्पराओं में भी मिलता है पर यह दायित्वबोध केवल मनुष्य प्रजाति के लिए नहीं था. पेगन परंपराओं में उत्तरदायित्व सभी के प्रति माना जाता था जो सबसे अधिक जीवंत रूप में आदिवासी जीवन में दिखायी देता है.’ बस्तर में गहन काम करनेवाले इस विचारक ने यह भी दर्ज़ किया था. ‘हमारे आदिवासी समुदायों में महिलाएं अंडा नहीं खातीं. उसके पीछे भाव यह है कि अंडे में जिस जीव के जीवन की संभावना सुषुप्त है उसे कम से कम एक बार पनपने का अवसर दिया जाना चाहिये. ऐसा न हो कि जीवन को अवसर न मिले प्रकट होने का और वह समाप्त हो जाये . जीवन को जीने से पहले ही समाप्त न करने का यह भाव सुन्दर है.’

सुरेश बार-बार पेगन दृष्टि की ओर लौटते थे, ‘पेगन परम्परा में सृष्टि की कल्पना में कोई सर्जक नहीं है. यहां ऐसा नहीं माना जाता कि यहां जो कुछ भी आंखों के सामने का अनुभव है, वह परम सत्य से भिन्न है. यह अवश्य है कि सत्य पारगामी है पर वह सृष्टि से अलग नहीं है. पेगन बोध और दृष्टि के अनुसार परम सत्य समस्त जगत में व्याप्त है. उसकी उपस्थिति के संकेत और उसका यथार्थ मानव प्रजाति तक सीमित नहीं है.’

कई बार लगता है कि सुरेश शर्मा का विचार आधुनिक समय में पेगन दृष्टि और आदिवासी जीवन के लगातार अतिक्रमण पर एक तरह का बौद्धिक और मानवीय विलाप है. कम होता है पर होता है जब हम विचार को विलाप की तरह देख और महसूस कर सकते हैं.

गिरीश कर्नाड

यह कहना अपर्याप्त है कि कन्नड़ लेखक, रंगकर्मी और अभिनेता गिरीश कर्नाड की मृत्यु भारतीय रंगजगत, साहित्य जगत और सिनेमा जगत की गहरी क्षति है. इन सभी क्षेत्रों में उनका अवदान असाधारण रूप से उत्कृष्ट था. पर उन्हें याद उनकी सामाजिक सक्रियता, अन्याय, स्वतंत्रता की कटौती के मुखर विरोध और अपने सृजन और विचार में अथक प्रश्नशीलता के लिए भी किया जायेगा. वे कांग्रेसी सरकार में अनेक संस्थानों जैसे संगीत नाटक अकादेमी, फ़िल्म इन्स्टीट्यूट, लंदन के नेहरू सेंटर आदि उच्च पदों पर आसीन रहे पर उन्होंने कभी किसी सत्ता का समर्थन नहीं किया और जब-तब अपनी असहमति सशक्त रूप से ज़ाहिर की.

हममें से कई याद कर सकते है कि साठ के दशक में मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर और बादल सरकार के साथ कर्नाड उन नाटककारों में से थे जिन्होंने भारतीय रंगमंच की शिथिल हो गयी प्रश्नवाचकता को उद्दीप्त और सजग करने में मूल्यवान् भूमिका निभायी थी. मेरे घनिष्ठ मित्र यूआर अनन्तमूर्ति से, दुर्भाग्यवश, कर्नाड के गहरे मतभेद थे. लेकिन अब दोनों के न रहने से कन्नड़ परिदृश्य बहुत विपन्न हो गया है जैसे कि समूचा भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य भी.