मोदी सरकार में ग़ैर-राजनीतिक लोगों की पैठ बढ़ती जा रही है. लोकसभा चुनाव के बाद दूसरी बार प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने पहले पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर को विदेश मंत्री बनाया. यह पहली बार था जब किसी पूर्व नौकरशाह को सीधे कैबिनेट मंत्री बनाया गया. इसके बाद खबर आई कि नरेंद्र मोदी ने नृपेंद्र मिश्रा, पीके मिश्रा और अजीत डोभाल को दोबारा अपना (क्रमशः) मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) नियुक्त किया है और उन्हें भी कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया है. इनके अलावा आरके सिंह, हरदीप पुरी जैसे पूर्व नौकरशाह इस बार भी नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में शामिल हैं.

इन तथ्यों को देखते हुए बहुत से लोगों द्वारा सवाल उठाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अफसरों को इतनी तवज्जो क्यों देते हैं. क्या भाजपा नेताओं की योग्यता और निष्ठा दोनों पर विश्वास नहीं है? कुछ का कहना है कि नरेंद्र मोदी सत्ता का केंद्रीकरण चाहते हैं इसलिए वे अपने क़रीबियों को उन नेताओं के बराबर ताक़त दे रहे हैं जो चुनाव की कठिन परीक्षा पास कर मंत्रिमंडल में आए हैं.

प्रतिभाओं की कमी?

भाजपा को लेकर कई जानकारों की राय रही है कि पार्टी के पास मंत्रालय के स्तर का कामकाज देखने की योग्यता वाले नेता पर्याप्त संख्या में नहीं हैं. वे यह भी कहते हैं कि चुनाव जीतने के अलावा भाजपा के अधिकतर नेताओं की अन्य योग्यताओं पर विचार करें तो उनकी अवैज्ञानिक सोच और ऊट-पटांग बयान पहले ज़ेहन में आते हैं.

एमनेस्टी इंडिया के एक्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर और वरिष्ठ पत्रकार आकार पटेल अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘मेरी समझ में (भाजपा में) उचित प्रतिभा की कमी की समस्या कट्टर विचारधारा से जुड़ी है. यह विशेष तरह के व्यक्ति को आकर्षित करती है. हमें ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि जिन लोगों को गुरु गोलवलकर, वीर सावरकर और दीन दयाल उपाध्याय जैसे लोगों के लेख आकर्षित करते हों, वे लोग अपनी सोच में परिष्कृत होंगे.’ आकार पटेल की तरह एक और वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी ने कभी एक ट्टीट में कहा था, ‘1985 के बाद से अब तक किसी भी पार्टी के पास भाजपा जितने सांसद नहीं रहे हैं. फिर भी वो मंत्री पद के लिए नौकरशाहों की ओर देखती है. इससे साफ होता है कि पार्टी के पास प्रतिभा की कमी है.’

ऐसी बातों को तब और बल मिलता दिखता है जब भाजपा के ही नेता पार्टी की योग्यता पर सवाल खड़े करते हैं. पार्टी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी बार-बार कहते रहे हैं कि मोदी सरकार में किसी को अर्थशास्त्र की समझ नहीं है. अरुण जेटली भाजपा के सबसे योग्य नेता माने जाते हैं. लेकिन स्वामी कहते हैं कि जेटली को कुछ नहीं आता. वहीं, 2015 में भाजपा के उपाध्यक्ष रहे विनय सहस्रबुद्धे ने रॉयटर्स से बातचीत में माना था कि कांग्रेस की अपेक्षा भाजपा के पास अनुभवी और प्रतिभाशाली लोग कम हैं.

अधिकारी मोदी के पक्ष में रिज़ल्ट देते हैं

कइयों के मुताबिक नौकरशाहों को ज्यादा तवज्जो देने की यह भी एक वजह हो सकती है. नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो अपनी सरकार की नीतियों को जल्दी लागू करने के लिए उन्होंने नौकरशाहों को ज़्यादा अधिकार दिए. काम करने का यही तरीक़ा उन्होंने अपने पहले प्रधानमंत्रित्व काल में भी दिखाया. उस दौरान सितंबर, 2017 में जब उन्होंने तीसरी बार मंत्रिमंडल में फ़ेरबदल किया तो आरके सिंह, हरदीप सिंह पुरी, सत्यपाल सिंह और केजे अल्फ़ोंस जैसे पूर्व आईएएस, आईएफ़एस और आईपीएस अधिकारियों को मंत्री या राज्य मंत्री बनाया.

उस समय मंत्रिमंडल के फ़ेरबदल को आम चुनाव से भी जोड़ कर देखा गया था. कइयों का कहना था कि प्रधानमंत्री ने ऐसे लोगों को मंत्री पद दिया जो अपने कामकाज के ज़रिये बेहतर चुनावी परिणाम देने का काम करें. हाल में संपन्न हुआ आम चुनाव बताता है कि उनका यह क़दम सही साबित हुआ. ज़ाहिर है ऐसे में अधिकारियों को और पद व अधिकार मिलने थे.

नरेंद्र मोदी ने यह भी ध्यान रखा है कि उनके इन पसंदीदा अधिकारियों के बीच किसी तरह का असंतुलन या नाराज़गी पैदा न हो. कुछ जानकारों की मानें तो मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्रा, अतिरिक्त मुख्स सचिव पीके मिश्रा और एनएसए अजीत डोभाल का मामला यही बताता है. इन तीनों से जूनियर एस जयशंकर को मोदी ने विदेश मंत्री बना दिया है. अगर उन्होंने दोनों सचिवों और डोभाल को मंत्री पद नहीं दिया होता तो भविष्य में दिक़्क़तें हो सकती थीं क्योंकि जयशंकर को रिपोर्ट करना इन तीनों को नागवार गुजरता.

केंद्र में ‘गुजरात मॉडल’?

एक वर्ग का मानना है कि पीएमओ में अपने पसंदीदा अधिकारियों को कैबिनेट मंत्री के बराबर रख कर नरेंद्र मोदी केंद्र में ‘गुजरात मॉडल’ लागू कर रहे हैं. इसके ज़रिये वे सरकार के सभी मंत्रालयों की नीतियों, प्रस्तावों, योजनाओं आदि पर अपना नियंत्रण रखना और नौकरशाहों को कड़ा संदेश देना चाहते हैं.

लेकिन इसमें नई बात क्या है? नरेंद्र मोदी के बारे में यह काफ़ी पहले से कहा जाता रहा है कि वे अपने समानांतर किसी और को उभरने नहीं देते. गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के समय से ही वे सबकी लगाम अपने हाथ में रखते आए हैं. इसके लिए वे वरिष्ठ साथियों के साथ योग्य सहयोगियों को भी हाशिए पर डाल देते हैं और ऐसे लोगों को सामने लाते हैं जिनकी सियासी हैसियत नहीं होती या वे कभी भी उनको चुनौती देने की स्थिति में नहीं होते.

लेकिन क्या ऐसा केवल नरेंद्र मोदी के साथ है? जवाब है - नहीं. देश में ऐसे और भी नेता हैं. साल 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद मुख्यमंत्री बनीं मायावती ने पायलट रहे शशांक शेखर सिंह को कैबिनेट सचिव बनाने के साथ उन्हें मंत्री का दर्जा दे दिया था. तब उनके उस क़दम की काफ़ी आलोचना हुई थी, लेकिन मायावती पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा.

बचाव

नौकरशाहों को नरेंद्र मोदी की इस तवज्जो की कई आलोचना कर रहे हैं तो बहुतों ने उनका बचाव भी किया है. उनके मुताबिक अगर नरेंद्र मोदी अपनी सरकार के विश्वस्त लोगों को और मज़बूत कर रहे हैं तो इसमें ग़लत क्या है. इन लोगों का यह भी सवाल है कि यह मुद्दा केवल नरेंद्र मोदी सरकार से जोड़ कर क्यों देखा जा रहा है, जबकि पहले की सरकारों में भी ग़ैर-राजनीतिक या राजनीतिक रूप से असफल लोगों को मंत्री पद दिए जाते रहे हैं. मनमोहन सिंह या अरुण जेटली का उदाहरण देते हुए वे यह दलील भी देते हैं कि जब भारत में मंत्री पद देने के लिए किसी का चुनाव जीतना ज़रूरी नहीं है, तो बहस के दायरे में केवल पूर्व अधिकारी क्यों हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने राजनीतिक करियर में केवल एक बार चुनाव लड़े और हार गए. फिर भी वे देश के प्रधानमंत्री बनाए गए. इसके लिए सोनिया गांधी पर न सिर्फ़ मनमोहन सिंह की राजनीतिक योग्यता को अनदेखा करने के आरोप लगे, बल्कि यह भी कहा गया कि उन्होंने सिंह के लिए प्रणब मुखर्जी जैसे बेहद सफल राजनेता को नज़रअंदाज़ कर दिया. यह बात ख़ुद मनमोहन सिंह कहते रहे हैं कि प्रधानमंत्री के रूप में प्रणब मुखर्जी उनसे बेहतर विकल्प थे.

मनमोहन सिंह के दोनों कार्यकालों में अर्थशास्त्री और लोक सेवक मोंटेक सिंह अहलूवालिया कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे. इंफ़ोसिस के सह-संस्थापक और उद्यमी नंदन नीलेकणी को भी भारतीय विशिष्ट पहचान पत्र प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाए जाने के साथ कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था.