बिहार में ‘चमकी बुखार’ का क़हर लगातार जारी है. हर दिन बच्चे मर रहे हैं. इस महामारी जैसी बीमारी की चपेट में मुज़फ़्फ़रपुर और आसपास के कुछ जिले हैं. अब तक की रिपोर्ट के अनुसार इस साल 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है और 200 से ज्यादा अन्य बच्चे इसकी चपेट में हैं. इनका इलाज चल रहा है लेकिन स्थिति बहुत ही गंभीर है.

‘चमकी बुखार’ है क्या? इसे ‘चमकी’ नाम स्थानीय लोगों ने दिया है. मेडिकल शब्दावली में इसे ‘एईएस’, यानी एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम कहा जाता है. करेंट साइंस जर्नल के मई 2014 अंक में टी जैकब जॉन और मुकुल दास का एक लेख है - एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम इन चिल्ड्रन इन बिहार: हाइपॉथिसिस ऑफ़ टॉक्सिक ऑरिजिन.

इस लेख के अनुसार, यह रोग पिछले दो दशक से ज्यादा समय से है और अब तक इसका कोई ठोस कारण पता नहीं चल पाया है. इसीलिए इसे रहस्यमयी बीमारी भी कहा जाता है. यह हर साल अप्रैल से जुलाई के महीने में फैलता है. ज्यादातर तीन साल से सात साल के छोटे बच्चों को यह अपनी चपेट में लेता है. इससे सैकड़ों बच्चे प्रभावित होते हैं. एक स्थानीय फिज़ीशियन के हवाले से इस लेख में बताया गया है कि इस बीमारी में मृत्यु-दर 40 से 60 फ़ीसदी है.

मुज़फ़्फ़रपुर का एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम बाक़ी जगहों के जैपनीज़ इंसेफेलाइटिस (जेई) से अलग है. इस बीमारी की खोजबीन का एक सिरा ‘लीची’ फल से जुड़ा हुआ है. मुजफ्फरपुर और उसके आसपास के इलाके में देश में सबसे ज्यादा लीची पैदा होती है. एईएस लीची के सीजन में ही होता है. कुछ अध्ययनों के मुताबिक फलों को खाने वाले चमगादड़ों के जरिये इस बीमारी के वायरस बच्चों में पहुंचते हैं. कुछ अनुसंधानों में ऊष्माघात या लू लगने और नमी को भी इस बीमारी के लिए जिम्मेदार माना गया है. कुपोषण को भी इस बीमारी के कारकों में शामिल किया जाता है.

एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम का असर बिना किसी शुरुआती लक्षण के अचानक दिखता है. शाम तक ठीक रहने वाला बच्चा अगली सुबह अचानक इसकी चपेट में आ जाता है. तेज़ बुखार, शरीर में ऐंठन, मानसिक भटकाव, घबराहट, बेहोशी के दौरे और दिमाग़ी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं. एईएस की वजह से हाइपोग्लाइसीमिया यानी लो-ब्लड शुगर के लक्षण भी मरीजों में देखने को मिलते हैं.

नेशनल सेंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल (इंडिया), नेशनल सेंटर फ़ॉर एनवायर्नमेंटल हेल्थ और यूएस सेंटर फ़ॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के शोधकर्ताओं ने साल 2014 में इस बीमारी पर एक शोध किया था. साल 2017 में इस अध्ययन की रिपोर्ट मेडिकल जर्नल ‘द लैन्सेट’ में प्रकाशित हुई थी. इस शोध के अनुसार एक्यूट इंसेफेलाइटिस का प्रकोप एमसीपीजी विषाक्तता से जुड़ा हुआ है. एमसीपीजी विषाक्तता का संबंध लीची खाने से होता है. इसका प्रभाव तब और बढ़ जाता है जब इस बीमारी के शिकार बच्चे ने रात में भोजन नहीं किया हो. इसका मतलब यह हुआ कि कुपोषण से प्रभावित बच्चों में एईएस की संभावना अधिक रहती है.

इस शोधपत्र में एईएस से बचने के लिए सुझाव दिया गया है कि बच्चों को लीची नहीं खाने दें. किसी भी हालत में रात का खाना नहीं छूटना चाहिए और इसके लक्षण दिखने पर पर्याप्त मात्रा में ग्लूकोज़ दिया जाये ताकि मरीज के ब्लड शुगर का स्तर सही रह सके.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्थिति पर चिंता जाहिर की है. उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को इस समस्या से निपटने के लिए हर मुमकिन उपाय करने के निर्देश दिए हैं. स्थिति से निपटने के लिए एक केंद्रीय टीम भी राज्य में पहुंच गई है. मुजफ्फरपुर जिले के प्रशासन ने भी आठवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए छुट्टी की घोषणा कर दी है. इस बीच भाजपा ने भी इस बीमारी को देखते हुए अगले 15 दिनों तक प्रदेश में किसी भी स्वागत समारोह का आयोजन नहीं करने का फैसला लिया है.

लेकिन सवाल यह है कि सरकार, प्रशासन और दूसरे जिम्मेदार लोगों ने सैकड़ों बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाने के लिए समय पर क्या किया? इस रोग के कारण पूरी तरह से भले आपको पता न हों, इसका इलाज आपको पूरी तरह से भले पता न हो. लेकिन जो कुछ भी इसके बारे में पता है उस हिसाब से भी, इस साल भी कुछ नहीं किया जा सका. बच्चों पर यह प्रकोप हर साल आता है, यह तो सरकार और प्रशासन सबको पता ही था. तो फिर जो किया जा सकता था वह भी इतने सारे बच्चों की जान बचाने के लिए क्यों नहीं किया गया?

इसके उलट पहले तो इसकी संभावना से ही इनकार किया गया. जब तक स्वीकार नहीं करेंगे, समाधान क्या करेंगे! अब स्वीकार किया है तो हर साल की तरह भगवान और बारिश का ही भरोसा है. बारिश होगी, गर्मी कम होगी, तब सब ठीक हो जाएगा. पिछले ढाई दशकों से लगभग हर साल 100 से ज्यादा बच्चों को लीलने वाली इस बीमारी से निपटने के लिए अभी भी बिहार सरकार के पास कोई रणनीति नहीं है. और ये बच्चे असमय काल का शिकार होने को अभिशप्त हैं.