निर्देशक : दीपा मेहता, शंकर रमन, पवन कुमार

लेखक : उर्मी जुवेकर, सुहानी कंवर, पैट्रिक ग्राहम, असद हुसैन (संवाद)

कलाकार : हुमा कुरैशी, सिद्धार्थ, राहुल खन्ना, आरिफ जकारिया, संजय सूरी, सीमा विश्वास, आकाश खुराना, अश्वथ भट्ट, मनीषा मैथरी

रेटिंग : 3.5/ 5

(समीक्षा में कुछ छोटे-बड़े स्पॉइलर मौजूद हैं, अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

‘श्रेष्ठता की सनक’ हमारे वक्त का एक भयावह सच है. धर्म, रंग और जात-पात को आधार बनाकर दुनियाभर में कुछ लोगों/समुदायों को लगता रहा है कि उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं. जैसे डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका में व्हाइट सुप्रीमिस्ट जैसे श्वेतों को और नरेंद्र मोदी के हिंदुस्तान में कई सारे हिंदुओ को.

शायद इसीलिए ‘लैला’ का एक संवाद इसके सभी छह एपीसोड खत्म हो जाने के बाद भी कानों में गूंजता रहता है. सीरीज देखने के बाद ये आपके भी कानों में गूंजेगा. जब जोशीजी मुस्कुराते हुए एक एपीसोड के अंत में सीरीज की हताश और क्रोधित नायिका से कहते हैं – ‘तुम आर्यावर्त से नहीं जीत सकतीं.’

आर्यावर्त यानी कि नेटफ्लिक्स की नयी वेब सीरीज का वह काल्पनिक देश जहां जोशीजी नाम के तानाशाह की हुकूमत है. लेकिन हुकूमत असल में उस ‘मानसिकता’ की है जो आम और खास दोनों को अपनी गिरफ्त में ले चुकी है. श्रेष्ठता की सनक, रक्त की शुद्धता, ऊंची जाति का खुद को नायाब समझना, जात-पात, धर्म और क्लास के आधार पर लोगों का विभाजन करना, अल्पसंख्यकों को दबाना, राष्ट्रवाद का आम जिंदगी का हिस्सा बन जाना और नागरिकों को समुदाय के नाम पर भिन्न-विभिन्न ‘सेक्टर’ में समेट देना.

दूर-पास दोनों से ही देखने पर आर्यावर्त नाम का यह काल्पनिक देश/मानसिकता, समकालीन भारत से बस दो-चार कदम दूर ही मौजूद हमारा भविष्य मालूम होता है. और, ‘तुम आर्यावर्तसे नहीं जीत सकतीं’ वाला संवाद असल में उसी मानसिकता की विजय का उद्घोषक है जो कि आज के भारत में चारों तरफ मौजूद मिल रही है.

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पत्रकार प्रयाग अकबर की बेहद असरदार नॉवल ‘लैला’ पर आधारित नेटफ्लिक्स की ताजा सीरीज ‘लैला’ अपनी डिस्टोपियन दुनिया एकदम कमाल और मारक रचती है. डिस्टोपिया का अर्थ होता है तकनीकी रूप से श्रेष्ठ ऐसा स्याह भविष्य जहां एक तानाशाह सरकार अपनी दमनकारी नीतियों के चलते नागरिकों के अधिकारों का हनन करती है, और उनके आगे सर झुकाने वाले कुछ तबकों को बेहतर जिंदगी देकर बाकी मानवता को कीड़े-मकोड़ों की तरह रहने पर मजबूर किया जाता है. अक्सर किताबों से लेकर सिनेमा तक में रचा गया डिस्टोपियन फ्यूचर असल में वर्तमान की ही असलियत उजागर करने का मकसद रखता है. चाहे वह जॉर्ज ऑरविल की ‘1984’ हो या रे ब्रैडबरी की ‘फैरनहाइट 451’ जैसी कालजयी किताबें और फीचर फिल्में.

डिस्टोपियन सिनेमा अक्सर ‘चेतावनी सिनेमा’ भी होता है, और केवल इस लिहाज से ‘लैला’ हमारे वक्त का एक जरूरी सिनेमा बन जाती है. इसमें बात-बात पर और बिना किसी बात पर भी ‘जय आर्यावर्त’ के नारे लगते देखना आपको मौजूदा भारत की एक बहुत बड़ी आदत की याद दिलाता है. दीवारों में कैद कॉलोनियों का आवंटन धर्म और जात के आधार पर होना आपको हमारे समाज के उस उलझे हुए ताने-बाने की याद दिलाता है जिसमें हिंदू बस्तियों में मुसलमानों को घर नहीं दिए जाते, और ऊंची जात के प्रिवलेज्ड नागरिक कोशिश करते हैं कि अपने ही समुदाय के पड़ोसियों से घिरे रहें.

कुछ वक्त पहले ईद के रोज एक विज्ञापन ट्विटर पर खासा साझा हुआ था जिसमें मुसलमानों को अलग से रिहाइश देने की बात थी. ‘लैला’ देखकर आपको यह बंटा-बंटाया बंटाधार समाज किसी सुदूर भविष्य में नहीं, बल्कि अपनी आंखों के सामने वर्तमान में साकार होता हुआ नजर आता है.

‘लैला’ की खास बात है कि ये बेवजह के विवादों से बचने के लिए – हिंदूफोबिक, राष्ट्रद्रोही जैसे आरोपों से – बेहद समझदारी से कई सिनेमाई कल्पनाओं का उपयोग करती है. इसका विरोध तो होना तय है, और अभी से आईएमडीबी पर इसकी रेटिंग कम रखने (3.3) से लेकर ट्विटर पर दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थकों द्वारा नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन कैंसिल करने के फोटो डालने और बायकॉट नेटफ्लिक्स जैसे हैशटैग शुरू करने का सिलसिला तक रफ्तार पकड़ चुका है. लेकिन ‘लैला’ समझदारी का परिचय देते हुए सीधे-सीधे हमारे देश की आज की राजनीतिक भाषा और राजनीतिक बिंबों का इस्तेमाल नहीं करती है. ऐसा करके खुद को भारतीय रखने के साथ-साथ यूनिवर्सल भी बना लेती है.

हालांकि अपने संवादों से, सर्वाधिकारी सरकार (Totalitarian) की कारस्तानियों से, और आज की हृदयविदारक घटनाओं को भविष्य में स्थापित करने के चलते वह समझने वालों को भरपूर ‘क्लू’ दे जाती है कि वह आखिर किस देश और किस समय की बात कर रही है.

‘मेरा जन्म ही मेरा कर्म है’ जैसे संवादों से समझाया जाता है कि पुरानी मान्यताओं पर लौटकर इस स्याह भविष्य में जिस जाति में इंसान पैदा होता है वही उसका कर्म होना निश्चित हो जाता है. गरीबों की जिस बस्ती से नायिका गुजरती है वहां के ज्यादातर घरों की दीवारों का रंग नीला या हरा होता है. केवल रंगों के उपयोग से बिना कुछ बोले बता दिया जाता है कि आर्यावर्त नामक ‘महान देश’ की सीमा से बाहर फेंक दिए गए इन गरीब नागरिकों का धर्म और जाति क्या है. वहीं एक आश्रम में ‘आदर्श महिला की पहचान’ से लेकर ‘अभद्र महिला की पहचान’ तक की चेतावनियां टांग कर दिखाया जाता है कि ऐसी तानाशाह हुकूमत में महिलाओं की स्थिति कितनी बदतर होती है.

यह आश्रमनुमा महिला केंद्र जहां पर हुमा कुरैशी के पात्र शालिनी रिजवान चौधरी को शुद्धिकरण के लिए लाया जाता है – क्योंकि उसने मुसलमान से शादी की और ‘मिश्रित रक्त’ की संतान पैदा की - वहां की सर्वेसर्वा का नाम ‘गुरू मां’ है. लेकिन जब यह किरदार जिसकी पदवी महिला होने का भान देती है हमारे सामने आता है तो वह एक कठोर आदमी निकलता है!

‘लैला’ में आरिफ जकारिया ऐसे ‘गुरू मां’ बने हैं जो बिगड़ी हुईं औरतों को शुद्ध करते हैं. ऐसे कई और भी उदाहरणों से यह सीरीज बेहद सटल अंदाज में दिखा जाती है कि इस तरह की टोटेलिटेरियन सोसाइटी अक्सर इस कदर घोर पुरुषवादी होती है कि महिलाओं को न सिर्फ दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जाता है बल्कि किसी भी सम्मानजनक पद पर आपको महिलाएं नजर नहीं आतीं. ‘द हैंडमेड्स टेल’ की तरह ‘लैला’ में भी आप इस विशेषता को पूरी सीरीज में महसूस कर सकते हैं.

‘फायर’, ‘अर्थ’ और ‘वॉटर’ जैसी मकबूल फिल्में बनाने वाली दीपा मेहता ने ‘लैला’ के शुरुआती दो एपीसोड का निर्देशन किया है. इन एपीसोड्स में नायिका आश्रमनुमा महिला केंद्र में यातनाओं से गुजरती है और कचरे के वृहद ढेर के पास मौजूद गरीबों की बस्ती में जान बचाने के लिए संघर्ष करती है. इन दोनों ही एपीसोड पर दीपा मेहता की जीनियस फिल्ममेकिंग की मुहर लगी हुई है. दीपा मेहता की एलीमेंट्स ट्रायोलॉजी अगर आपने देखी है – ‘फायर’, ‘अर्थ’, ‘वॉटर’ – तो आपको ‘लैला’ देखते वक्त समझ आ जाएगा कि महिलाओं के खिलाफ अत्याचार का जो खौफनाक मंजर इस सीरीज में रचा गया है, वह महिला उत्पीड़न पर ‘फायर’ से लेकर ‘अर्थ’ और ‘वॉटर’ जैसा सिनेमा बनाने वाली मेहता की ही जीनियस फिल्ममेकिंग का नतीजा है.

इस ‘महिला केंद्र’ में नायिका शालिनी रिजवान चौधरी का यातनाओं से गुजरना आपको उनकी ‘वॉटर’ की बहुत याद दिलाएगा, जिसमें बनारस के एक आश्रम में यातनाएं भोग रहीं विधवाओं की दास्तान दर्ज थी. बदहाली में जी रहे गरीबों की बस्ती से गुजरती नायिका के पीछे-पीछे चलते हुए आपका मुंह हलक में आ जाएगा और सामाजिक असमानता का जो ताना-बाना दीपा मेहता ने ‘अर्थ’ और ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ में बुना था उसका बेहद उम्दा एक्सटेंशन यहां देखने को मिलेगा.

डिस्टोपियन स्याह भविष्य और नायिका की बेचैनी को इस सीरीज में बेहद सलीके से स्थापित करने में शुरुआती दो एपीसोड की भूमिका बेहद अहम रही है, और ये दोनों ही दीपा मेहता के निर्देशन के चलते ही उम्दा बन पड़े हैं. महात्मा गांधी की तस्वीर को लेकर उनके द्वारा रचा गया एक सीन तो इस सीरीज की सबसे पॉवरफुल इमेजरी के तौर पर याद किया जाएगा.

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अमेरिकी टीवी सीरीज ‘द हैंडमेड्स टेल’ से ‘लैला’ की तुलना होना काफी हद तक जायज है. दोनों ही सीरीज टोटेलिटेरियन सरकारों में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को अपनी केंद्रीय थीम बनाती है और अत्याचारों से गुजरने को मजबूर नायिका के अपनी बेटी की तलाश करने की कहानी कहती है. कहानी के कई एलीमेंट्स मिलते-जुलते भी हैं, नायिका का स्वभाव भी एक जैसा है, और स्याह भविष्य को रचने वाला शिल्प भी एक-दूसरे के आसपास का रहता है.

लेकिन ‘लैला’ फिर भी एक मौलिक सिनेमा कहा जाएगा क्योंकि कहानी के इस जैनेरिक टेम्पलेट के अलावा इसकी पूरी यात्रा मौलिक है. कहीं से भी फिल्ममेकिंग में ‘द हैंडमेड्स टेल’ का प्रभाव नहीं दिखता, अमेरिकी सीरीज की तरह फर्स्ट पर्सन नेरेटिव में कहानी आगे नहीं बढ़ती, और सबसे बड़ी बात कि ये सीरीज यथार्थवादी होकर हमारे हिंदुस्तान की करारी सामाजिक और राजनीतिक आलोचना से समृद्ध नजर आती है.

इसका काफी-कुछ श्रेय निर्देशकों (दीपा मेहता, शंकर रमन, पवन कुमार) और लेखकों (उर्मी जुवेकर, सुहानी कंवर, पैट्रिक ग्राहम) के अलावा प्रयाग अकबर को भी जाता है. सीरीज ने प्रयाग अकबर की नॉवेल ‘लैला’ की तुलना में अपनी कहानी में काफी-कुछ बदला है और घटनाएं तो तकरीबन सभी नए सिरे से लिखी गईं हैं. नॉवेल में नायिका 43 साल की होती है और 16 साल पहले उससे उसकी छोटी-सी बेटी छीन ली जाती है. सीरीज में नायिका हुमा कुरैशी 30-35 से ज्यादा की नहीं हैं और उनकी छोटी-सी बच्ची को दो साल ही पहले उनसे दूर किया गया है.

नॉवेल में ज्यादा चीजों के नाम अंग्रेजी में हैं – प्योरिटी वॉल, रिपीटर्स – वहीं सीरीज में संस्कृतनिष्ठ शुद्ध हिंदी में इस टोटेलिटेरियन सरकार से जुड़ी चीजों को रचा गया है. जैसे आर्यावर्त, दूष, पंचकर्मी, विकास की तर्ज पर उन्नति, शुद्धि परीक्षा, पवित्र पलटन वगैरह.

लेकिन, अच्छी बात यह है कि नॉवेल की तकरीबन सभी मुख्य थीम्स को सीरीज में तमीज से शामिल कर कहानी को मजबूती दी गई है. प्रयाग अकबर की किताब ने किसी खास राजनीतिक विचारधारा की सीधे-सीधे आलोचना करने की जगह राजनीतिक उन्माद से जन्मे सामाजिक परिवर्तनों को किताब में प्रमुखता से एक्सप्लोर किया था. जाति के समीकरणों को, धर्म के नाम पर अर्बन स्पेस में एक-साथ नहीं रहने को तरजीह दिए जाने को, प्रदूषण को और पानी के दुर्लभ हो जाने को. सबसे अहम, अमीर-गरीब के बीच के वर्गभेद को स्याह भविष्य की टेक लेकर अचंभित कर देने वाले तरीके से एक्सप्लोर किया था. नॉवेल में वर्गभेद की बुनियादी इक्वेशन में सबकुछ उलटा-पुलटा हो जाता है और बतौर पाठक आप लेखक की कल्पनाशीलता के मुरीद बन जाते हैं!

वेब सीरीज ‘लैला’ खासकर इस वर्गभेद को कुशलता से उकेरती है और भले ही किताब जितनी डिटेलिंग आपको यहां नहीं मिलती, लेकिन इस एक थीम में ही नायिका शालिनी की जिंदगी का एक बहुत बड़ा राज छिपा होता है. अगर आपने किताब नहीं भी पढ़ी, तब भी शुरू से ध्यान देकर सीरीज देखने पर आखिर में आप इसकी संवेदनशीलता और वर्गभेद को लेकर अपनाए अनोखे नजरिए से अचंभित रह जाएंगे! इसका पूरा श्रेय प्रयाग अकबर को मिलना चाहिए.

अचंभित हुमा कुरैशी का अभिनय भी करता है! उम्मीद नहीं थी कि वे ऐसे मुश्किल किरदार को इस कदर आत्मसात कर पाएंगीं. बिना मेकअप के अपने चेहरे को सैकड़ों टाइट क्लोजअप के लिए तैयार रखना, चेहरे के खुरदुरेपन को दुनिया के सामने लाने से डरना नहीं केवल उनके शालिनी बनने की प्रकिया का एक आयाम भर है. मानसिक के साथ-साथ उनकी शारीरिक मेहनत भी काबिले-तारीफ है और पहले दो एपीसोड में तो वे अलग ही स्तर की अभिनेत्री मालूम होती हैं. उनके अभिनय के कई सारे आयाम शालिनी के किरदार में देखकर ढेर सारी प्रसन्नता होती है और सीरीज में उनका होना इसे इसका स्थायी और मजबूत चेहरा देता है. ‘लैला’ उनका अबतक का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है और आगे लंबे समय तक भी सर्वश्रेष्ठ ही बना रहेगा.

सिद्धार्थ हिंदी फिल्मों में कम नजर आते हैं लेकिन जितने वे ट्विटर पर ‘सही बातें’ करते हुए सक्रिय रहते हैं उतने ही उन्हें हिंदी फिल्मों में रहना चाहिए. उनका अभिनय भी इस सीरीज में खासा प्रभावी है और कठोर, भावरहित चेहरा बनाए रखने की उनकी अभिव्यक्ति खासा प्रभाव पैदा करती है.

सीमा विश्वास, आरिफ जकारिया से लेकर आकाश खुराना तक बढ़िया अभिनय करते हैं. वरिष्ठ अभिनेता आकाश खुराना को ताजमहल के अलावा फैज अहमद फैज से जुड़ा हुआ एक बेहद प्रभावी सीक्वेंस मिलता है और उस घटनाक्रम में मौजूद आइरनी खासी मारक है! रूप नाम की गरीब लड़की का रोल करने वाली मनीषा मैथरी का जिक्र अलग से करना जरूरी है क्योंकि तेजतर्रार संवाद बोलने वाली इस बालिका ने कम लंबाई के रोल में भी यादगार काम किया है.

आलोकनंदा दासगुप्ता को भी इसी जगह याद करना होगा. उनके बैकग्राउंड स्कोर ने ‘सेक्रेड गेम्स’ की तरह ही यहां भी जैसे अभिनय ही किया है और दृश्यों की भावनाओं को संवेदना से सतह पर लाने का उत्कृष्ट काम अंजाम दिया है.

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‘लैला’ के साथ मुख्य दिक्कत उसके थ्रिलर जॉनर से जुड़ी आवश्यकताएं पूरी करने के चलते पैदा होती हैं. यह ‘सेक्रेड गेम्स’ सीजन वन के स्तर की सीरीज हो सकती थी और हिंदुस्तान की अबतक की सर्वश्रेष्ठ सीरीज में इसका नाम शामिल हो सकता था अगर ये आखिरी के दो एपीसोड्स में जैनेरिक थ्रिलर फिल्मों वाले पथ पर नहीं चल पड़ती. शुरुआती दो एपीसोड स्याह भविष्य को रचने में कमाल तरीके से उपयोग किए गए हैं, अगले दो में मोटे-मोटे तौर पर नायिका द्वारा अपनी बेटी लैला की तलाश करने की बेहद दर्शनीय कहानी कही गई है. अंतिम दो में एक बहुत बड़े काम को अंजाम देने का प्लॉट है जिसके दौरान ही लैला शालिनी को मिलेगी या नहीं ये पता चल पाता है.

दिक्कत ये है कि ‘लैला’ को ढूंढ़ने की इस कहानी और एक मकसद को पूरा करने का प्लॉट कहानी की केंद्रीय थीम से ध्यान बंटाकर थ्रिलर तत्वों की जरूरत को पूरा करने में खर्च होता है. ये थ्रिलर तत्व भी इतने जैनरिक हैं, बॉलीवुड के क्लीशे इतने सारे मौजूद हैं, कि आखिरी के एपीसोड्स में ‘लैला’ अपने पथ से जैसे भटक जाती है. आपको बार-बार ‘द हैंडमेड्स टेल’ याद आती है और आप तुलना करने लगते हैं कि नायिका की सतत तकलीफों का वह कभी न खत्म होने वाला उम्दा चित्रण ही उस सीरीज को महान बना गया था. यहां एक योजना बनाना, उसे क्रियान्वित करना, उसके लिए जासूसी करना जैसे साधारण प्लॉट-पाइंट्स का उपयोग एक अलहदा सीरीज में साधारणपन और नीरसता भरता है.

वह तो ‘लैला’ का अंत इतना जोरदार है, कि ये कमियां खलने के बावजूद आप सीरीज खत्म होते ही इसके अगले छह एपीसोड तुरंत देखने के लिए बेचैन हो उठते हैं! हमारी तरह आप भी तैयार हो जाइए, क्योंकि ‘सेक्रेड गेम्स’ सीजन दो का जिस शिद्दत से इंतजार एक बरस से किया जा रहा है, अब वैसा ही इंतजार अगले एक साल तक ‘लैला’ के सीजन दो के लिए करना होगा!