बिहार की सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड और उसकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन को लेकर चल रही खटपट को लेकर तरह-तरह की बातें चल रही हैं. इस बार लोकसभा चुनाव दोनों पार्टियां मिलकर लड़ी थीं. दोनों ने बिहार में जबर्दस्त कामयाबी हासिल की. दोनों पार्टियां 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ी थीं. भाजपा ने अपनी सभी 17 सीटों पर जीत हासिल की. वहीं जेडीयू ने 16 सीटों पर विजय पताका फहराई.

2014 लोकसभा चुनाव जेडीयू अकेले लड़ी थी और उसे सिर्फ दो लोकसभा सीटें ही मिली थीं. ऐसे में दो लोकसभा सांसदों से 16 लोकसभा सांसदों तक पहुंची पार्टी को उम्मीद थी कि उसे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में तवज्जो दी जाएगी. लेकिन अपने दम पर 300 से अधिक लोकसभा सीटों का आंकड़ा पार करने वाली भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह तय कर दिया कि हर सहयोगी दल से सिर्फ एक-एक मंत्री ही बनाया जाएगा. 18 सांसदों वाली शिव सेना को भी एक ही मंत्री पद दिया गया. लेकिन जब यह प्रस्ताव बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार तक पहुंचा तो वे इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने तय किया कि जेडीयू का कोई भी मंत्री मोदी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होगा.

हालांकि, सार्वजनिक तौर पर नीतीश कुमार ने एनडीए में किसी तरह की खटपट से इनकार किया. लेकिन सब कुछ सामान्य नहीं है, यह कुछ ही दिन बाद साफ हो गया. नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल विस्तार किया और अपनी पार्टी जेडीयू के आठ नेताओं को मंत्री बना दिया. भाजपा के किसी भी नेता को उन्होंने मंत्री नहीं बनाया. राजनीतिक जानकारों ने यह माना कि जो काम नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में जेडीयू के साथ किया, उसी का जवाब नीतीश कुमार ने भाजपा को पटना में दिया. इसके बाद से जेडीयू और भाजपा के संबंधों में तनातनी दिख रही है. दोनों पार्टियों के अलग-अलग नेताओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि संबंध पहले की तरह सहज नहीं हो पाए हैं.

तो इसका क्या यह मतलब निकाला जाए कि जेडीयू और भाजपा का गठबंधन टूट सकता है? इसके जवाब में बिहार भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘गठबंधन जारी रखने के पक्षधर लोग भी दोनों तरफ हैं और तोड़ने की बात करने वाले भी दोनों तरफ हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि अगले कुछ दिनों में यह गठबंधन टूट जाएगा. अभी सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा.’

ऐसे में सवाल यह उठता है कि एक ही गठबंधन में रहने के बावजूद दोनों पार्टियां संबंधों में आए तनाव को दूर करने के लिए कुछ क्यों नहीं कर रही हैं? इसके बारे में बिहार भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘दरअसल, दोनों पार्टियों की ओर से चल रहा शह और मात का खेल 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनावों के संदर्भ में है. विधानसभा में जेडीयू की अधिक सीटें हैं तो लोकसभा में बिहार से सबसे अधिक सीटें भाजपा के पास हैं. पारंपरिक तौर पर भाजपा बिहार में जेडीयू की जूनियर पार्टनर रही है. अब वह बराबरी की पार्टनर है. लेकिन भाजपा की कोशिश अगले विधानसभा चुनावों में खुद सीनियर पार्टनर और जेडीयू को जूनियर पार्टनर बनाने की है.’

वे आगे कहते हैं, ‘नीतीश कुमार भी इस खेल को समझ रहे हैं. लेकिन वे उस तरह से भाजपा के सामने आत्मसमर्पण नहीं करना चाह रहे हैं जिस तरह से शिव सेना ने महाराष्ट्र में कर दिया. नीतीश कुमार का आकलन यह होगा कि अगर भाजपा के साथ चलना एकदम ही मुश्किल हो जाए तो वे अलग होकर या तो फिर से लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल को अपने साथ ले आएं या फिर उसको तोड़कर एक मजबूत धड़ा अपने साथ ले आएं.’

लोकसभा चुनावों में खाता भी नहीं खोल सकने वाले आरजेडी के बारे में माना जा रहा है कि अगर कोई ऐसी स्थिति आती है कि नीतीश कुमार भाजपा से छिटककर बाहर आ जाएं तो वह फिर से उनके साथ हो सकता है. ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है कि आरजेडी के अंदर ही एक धड़ा ऐसा है जो दबी जुबान से ही सही लेकिन तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रहा है. ऐसी स्थिति में कांग्रेस भी जेडीयू और आरजेडी के साथ आ सकती है. जानकारों के मुताबिक बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरण इस तरह के हैं जिनमें एक बार फिर से जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस का महागठबंधन बड़ी जीत हासिल कर सकता है. बिहार की स्थिति उत्तर प्रदेश की तरह नहीं है, जहां समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल का महागठबंधन नाकाम रहा.

जेडीयू और भाजपा गठबंधन में आगे की दिशा के बारे में जेडीयू के एक पदाधिकारी बताते हैं, ‘संकेतों में शह और मात का खेल अभी ऐसे ही चलेगा लेकिन ऐसा नहीं लगता कि दोनों में से कोई भी पक्ष गठबंधन तोड़ने की गलती करेगा. दो ही स्थितियों में गठबंधन टूट सकता है. पहली - अगर अगले कुछ महीने में मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार हो और दूसरे दलों को जगह मिले और जेडीयू को फिर से नजरअंदाज किया जाए. या फिर मंत्रिमंडल विस्तार हो ही नहीं और अगले साल चुनावों के कुछ महीने पहले विधानसभा सीटों का जो बंटवारा हो, उसमें भाजपा जेडीयू से अधिक सीटों की मांग करे.’

अगर नीतीश कुमार फिर से भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो क्या विपक्ष के लिए वे फिर से स्वीकार्य हो पाएंगे? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्ष की अभी जो हालत है, उसमें उसके सामने नीतीश कुमार को फिर से स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. विपक्ष नीतीश कुमार को इसलिए भी स्वीकार कर सकता है कि कि अकेले उनका वोट बैंक भले ही उनको नहीं जिता पाता, लेकिन वे जिस पाले में जाते हैं, अपना वोट बैंक उस पाले में लेकर चले जाते हैं और जबर्दस्त जीत हासिल करते हैं. हिंदी पट्टी में किसी और क्षत्रप ने अपनी यह ताकत नहीं ​साबित की है.

कहा तो यह भी जा रहा है कि अगर नीतीश कुमार एनडीए से बाहर निकलते हैं तो विपक्ष की राजनीति के केंद्र में उन्हें लाने में जेडीयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर भी उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि उन्होंने कांग्रेस के लिए भी काम किया है और हाल ही में आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने वाले जगन मोहन रेड्डी के साथ भी. अब वे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस के साथ काम कर रहे हैं.