केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जब संविधान में संशोधन करते हुए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्ल्यूएस) लोगों के लिए आरक्षण (जिसे सवर्ण आरक्षण भी कहा जाता है) का प्रावधान किया, तब इस पर कई तरह के सवाल उठे थे. उस समय से वंचित तबक़ों के प्रतिनिधियों समेत कई जानकार कह रहे हैं कि मोदी सरकार का यह क़दम संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है.

इस सवाल के साथ यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सरकार ने इसे ख़ारिज करते हुए कहा कि उसने ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए आरक्षण सामान्य श्रेणी से ही सुनिश्चित किया है, लिहाज़ा यह आरक्षण किसी भी तरह अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए तय कोटे से छेड़छाड़ नहीं करता.

हो सकता है सरकार की इस दलील से कुछ लोग इत्तेफ़ाक़ रखते हों, लेकिन हाल में कुछ जानकारियां सामने आई हैं जो सामान्य आरक्षण के चलते एससी-एसटी और ओबीसी श्रेणियों के उम्मीदवारों के साथ होने वाले भेदभाव की ओर ध्यान दिलाती हैं, ख़ास तौर पर ओबीसी के मामले में.

हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने 2019-20 के पोस्ट-ग्रेजुएशन कोर्स के लिए एक नोटिफ़िकेशन जारी किया है. इसमें दाख़िले के लिए भरे जाने वाले फ़ॉर्म की फ़ीस आरक्षित और अनारक्षित वर्गों के लिए अलग-अलग है, जो सामान्य बात है. लेकिन इसमें अनारक्षित और ओबीसी उम्मीदवारों के लिए 750 रुपये फ़ीस जमा कराने के बात कही गई है, जबकि ईडब्ल्यूएस श्रेणी को एससी-एसटी के साथ रखकर उनके नामांकन की फ़ीस 300 रुपये रखी की गई है.

डीयू के फ़ीस तय करने का यह तरीक़ा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है. कई लोगों ने सवाल किया है कि जब आरक्षण का लाभ पाने के लिए ईडब्ल्यूएस और ओबीसी दोनों वर्गों को आठ-आठ लाख रुपये की आय सीमा के तहत रखा गया है, तो ओबीसी वर्ग की फ़ीस 750 और ईडब्ल्यूएस की फ़ीस 300 रुपये रखने का क्या तर्क है.

सामान्य आरक्षण लागू करते समय भी आठ लाख रुपये की आय सीमा को लेकर ख़ासी चर्चा हुई थी. तब कई लोगों ने यह कहते हुए ईडब्ल्यूएस आरक्षण का विरोध किया था कि सालाना कम से कम आठ लाख रुपये कमाने वाले किसी परिवार का उम्मीदवार ग़रीब कैसे माना जा सकता है. जबकि इतनी ही कमाई वाले ओबीसी उम्मीदवार को क्रीमीलेयर का बताया दिया जाता है. ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि अब ईडब्ल्यूएस उम्मीदवार के लिए तय की गई फ़ीस ओबीसी से ढाई गुना कम क्यों है.

यहां इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी है कि मोदी सरकार ने सामान्य आरक्षण लागू करने के बाद कहा था कि सवर्णों के लिए तय की गई आय सीमा अंतिम नहीं है और वह इसकी समीक्षा कर इसे कम कर सकती है. लेकिन आरक्षण लागू होने के बाद अब तक ऐसा कुछ नहीं किया गया. इस बीच चुनाव बीत गए और विश्वविद्यालयों ने भी ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू करने में ज़बर्दस्त सक्रियता दिखाते हुए भर्तियों के लिए एक के बाद एक नोटिफ़िकेशन जारी कर दिए.

इन सबके बीच यह सवाल कहीं गुम हो गया कि तमाम सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में पहले से ही अपनी जनसंख्या से कहीं ज़्यादा नेतृत्व वाले सवर्ण वर्ग को आरक्षण देने के लिए आठ लाख रुपये की आय सीमा में रखना क्या सही है. इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा चुने गए देश के 445 उच्च शिक्षा संस्थानों के डेटा पर आधारित एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है. यह बताती है कि 2016-17 में इन संस्थानों में 16 लाख छात्र-छात्राओं का नामांकन हुआ था. रिपोर्ट के मुताबिक़ इनमें से 28 प्रतिशत यानी क़रीब चार लाख 55 हजार छात्र आर्थिक रूप से ग़रीब वर्ग (सामान्य वर्ग के) से ही थे. यह आंकड़ा ईडब्ल्यूएस को मिलने वाले दस प्रतिशत आरक्षण से लगभग तीन गुना ज़्यादा है.

रिपोर्ट यह भी बताती है कि ज़्यादातर शिक्षा संस्थान दो से 5.50 लाख रुपये तक सालाना आय वाले परिवारों को आर्थिक रूप से पिछड़ा मानते हैं. यह मोदी सरकार द्वारा तय की गई सीमा से दो-ढाई लाख रुपये कम है. ऐसे में अगर विश्वविद्यालय आठ लाख रुपये वार्षिक आय वाले उम्मीदवारों को फ़ीस में ढाई गुना रियायत देंगे तो लाज़मी है इससे ईडब्ल्यू आरक्षण पर सवाल उठेंगे.

पोस्ट-ग्रेजुएशन कोर्स के लिए डीयू के फ़ीस स्ट्रक्चर के अलावा धर्मशाला केंद्रीय विश्वविद्यालय का नया एडमिशन रोस्टर भी ‘सवर्ण’ आरक्षण के अतार्किक होने का संकेतक बताया जा रहा है. इस विश्वविद्यालय ने 2019-20 के सत्र के लिए जो मेरिट सूची जारी की है, उसके मुताबिक़ अगर कोई ईडब्ल्यूएस (या ग़रीब सवर्ण) उम्मीदवार सौ में से एक से दस अंक भी लाता है, तो भी उसे दाख़िला मिल जाएगा. अमर उजाला ने मेरिट सूची के हवाले से बताया कि 1.25 अंक वाला ईडब्ल्यूएस विद्यार्थी बॉटनी में पोस्ट-ग्रेजुएशन कर सकता है. वहीं, दस अंक लाने पर इसी कैटेगरी के उम्मीदवार को अंग्रेज़ी विषय में एमए करने दिया जाएगा.

हालांकि इसी तरह की रियायत एससी-एसटी वर्ग के उम्मीदवारों को भी दी गई हैं. लेकिन दिक़्क़त यह है कि उन्हें ईडब्ल्यूएस से बाहर रखा गया है. वे इसका लाभ नहीं उठा सकते. इसके जवाब में यह कहा जा सकता है कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवार भी एससी-एसटी व ओबीसी को मिले आरक्षण के दायरे से बाहर हैं लेकिन ऐसा सीधे-सीधे कह देना सही नहीं होगा.

यह कई रिपोर्टों से साबित हुआ है कि देश के वंचित तबक़ों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया है. विश्वविद्यालयों में दलित, आदिवासी और ओबीसी वर्ग के शिक्षकों की संख्या उनकी जनसंख्या के हिसाब से बहुत कम है. वहीं, आरक्षण का कोटा पूरा नहीं होने की सूरत में ख़ाली रह जाने वाली सीटों को सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से भरा जाता रहा है. इस व्यवस्था के होते यह नहीं कहा जा सकता कि सवर्ण वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी से ज़्यादा सीटें नहीं मिलतीं.

बहरहाल, इन सबके बीच एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए राहत की बात यह रही कि सरकार ने विवादित 13 पॉइंट रोस्टर को हटा कर दोबारा लाए गए पुराने 200 पॉइंट रोस्टर से जुड़े विधेयक को मंज़ूरी दे दी है. बीते बुधवार को कैबिनेट ने विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती से जुड़े इस रोस्टर को हरी झंडी दिखा दी. अब उच्च शिक्षा संस्थानों में भर्तियां विभाग की जगह विश्वविद्यालय को इकाई मानते हुए की जाएंगी. हालांकि इससे सामान्य आरक्षण से जुड़ा विवाद ख़त्म नहीं होने वाला.