क्रिकेट विश्व कप में भारत- पाकिस्तान का बहुप्रतीक्षित मैच हो चुका है और इसमें भारत ने शानदार जीत हासिल की है. भारत-पाकिस्तान की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता के अलावा इस मैच की एक और खास बात यह थी कि इसमें सचिन तेंदुलकर मैच के टीवी प्रसारण के दौरान हिंदी में कॉमेंट्री कर रहे थे. हालांकि, इससे पहले वे विश्व कप के मैचों में अंग्रेजी में कॉमेंट्री कर चुके थे. इस विश्व कप में ही सचिन ने आधिकारिक तौर पर कॉमेंट्री करने की शुरुआत की है. हालांकि, इससे पहले वे यदा-कदा बतौर एक्सपर्ट हिंदी-अंग्रेजी के कॉमेंट्री बॉक्स में आते रहे थे.

क्रिकेट मैचों के टीवी प्रसारण पर पिछले कुछ सालों से हिंदी कॉमेंट्री पर काफी जोर दिया जा रहा है और टीवी पर हिंदी कॉमेंट्री लोकप्रिय भी हो रही है. लेकिन, इसके साथ-साथ लगातार इसकी गुणवत्ता पर भी सवाल उठते रहे हैं. हिंदी कॉमेंट्री में सचिन का आना इसीलिए भी ध्यान खींचने वाला है. उन्होंने पूर्व क्रिकेटर्स की ‘दशा खराब तो दिशा खराब’ और ‘पकड़ो कैच, जीतो मैच’ जैसी जुमलों से भरी कॉमेंट्री के बीच एक अलग रूख अपनाया और खेल की बारीकियों की अपनी समझ को बहुत आसान भाषा में दर्शकों तक पहुंचाया. भारत-पाक मैच के दौरान सचिन की कॉमेंट्री में क्या-क्या अलग था, इस पर आगे बात करने से पहले भारत में क्रिकेट कॉमेंट्री के परिदृश्य पर चर्चा करना जरूरी है.

एक जमाने में क्रिकेट मैचों के सीधे प्रसारण का जरिया रेडिया था. लेकिन, रेडियो कॉमेंट्री का मिजाज अलग होता था. मैच के पूरे रोमांच के साथ आंखों देखा हाल सुनाने के लिए कॉमेंटेटर के पास भाषायी दक्षता होना एक जरूरी चीज होती थी. इसलिए रेडियो के दौर में पेशेवर कॉमेंटेटर उभरे और खासे लोकप्रिय हुए. लेकिन, टीवी पर मैचों का प्रसारण शुरु होने के साथ कॉमेंट्री में पूर्व क्रिकेटर्स की आमद शुरु हुई. जाहिर है कि खिलाड़ियों से पेशेवर कॉमेंटेटर्स की तरह के भाषायी लालित्य की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, लेकिन पूर्व खिलाड़ियों की आमद ने मैच के वर्णन में एक अलग तरह का नयापन पैदा किया. कुछ चीजें छूटीं तो कुछ नई चीजें आ गईं.

टीवी कॉमेंट्री में खेल के तकनीकी पक्ष पर चर्चा इसका खास आकर्षण है. रेडियो कॉमेंट्री में सुनने वाले के सामने पूरा दृश्य का सजीव चित्र खींचना पड़ता था, वहीं, टीवी में मैच के दौरान क्या हो रहा है यह तो दर्शकों को दिख ही रहा होता है. ऐसे में टीवी स्क्रीन पर जो दिख रहा है कॉमेंटेटर अगर उससे इतर कुछ बता पाता है तब तो ठीक, नहीं तो दर्शकों की कॉमेंटरी सुनने में ज्यादा रूचि नहीं रह जाती. इन्हीं द्वंदों में उलझी टीवी की हिंदी कॉमेंट्री लोकप्रिय तो हो रही है, लेकिन उसकी गुणवत्ता पर अक्सर सवाल भी उठते रहते हैं.

टीवी पर हिंदी कॉमेंट्री सुनने वाले इस बात को महसूस कर सकते हैं कि खेल की तकनीकी जानकारी रखने वाले ये पूर्व कमेंटेटर धीरे-धीरे एक तय ढर्रे में बंध जाते हैं और मैच के दौरान बार-बार वही बातें दोहराते हैं. मसलन, फलां बल्लेबाज लेग स्टंप पर बहुत अच्छा खेलते हैं और अगर बॉलर इनके पैर पकड़ेगा तो बहुत पिटाई खाएगा. इस तरह के ‘शब्द-खेल’ एक-दो बारगी तो ठीक लगते हैं, लेकिन बार-बार उनका दोहराव वर्णन को बोझिल बना देता है.

जैसे, आकाश चोपड़ा अपनी कॉमेंट्री के दौरान खिलाड़ियों के नाम के सहारे कौतुक पैदा करने की कोशिश करते हैं. अफगानिस्तान के बल्लेबाज नूर अली के आउट होने पर वे कहते हैं कि नाम इनका नूर है, लेकिन इनकी बैटिंग में नूर नहीं दिखा. इसी तरह भारतीय स्पिनर कुलदीप यादव के अच्छी गेंदबाजी करने पर वे अक्सर कुलदीपक शब्द के साथ उसका तुक मिलाते हैं. ये तुकबंदी एक प्रवृत्ति हो सकती है, लेकिन क्रिकेट के खेल का रोमांच सिर्फ इसी के सहारे नहीं बयान हो सकता है. स्टार स्पोर्ट्स के प्रेजेंटर जतिन सप्रू भी हिंग्लिश नुमा भाषायी जोड़तोड़ का सहारा लेते दिखते हैं. इन जुमलों से राहत तब मिलती है. जब खिलाड़ी अपने दौर के ड्रेसिंग रूम के चर्चे शुरु कर देते हैं, जिसे कमेंट्री का एक पक्ष कहा जा सकता है, लेकिन इसकी भी एक सीमा है.

अब फिर सचिन की कॉमेंट्री की तरफ लौटते हैं. विश्व कप में भारत-पाकिस्तान के मुकाबले के दौरान सचिन को लंबे समय तक हिंदी बोलते देखकर सबसे पहले तो बहुत सारे दर्शकों की यही धारणा टूटी होगी कि उनकी ‘आइला-जाइला’ वाली मुंबइया हिंदी है. इसके उलट उन्होंने बड़े साफ-सुथरे तरीके से आसान और अच्छी हिंदी बोली. इसके अलावा खेल के विभिन्न पहलुओं पर लगभग हर कॉमेंटेटर बात करता है, लेकिन सचिन ने ऐसा बिलकुल अलग अंदाज में किया.

रोहित शर्मा के खेल के बारे में बात करते हुए सचिन ने हमें समझाया कि ज्यादातर बल्लेबाज बैकफुट पर पुल शॉट खेलते हैं, लेकिन रोहित फ्रंटफुट पर भी पुल करने की क्षमता रखते हैं. बैकफुट पर आकर पुल करने पर आम तौर पर शॉट एक ही दिशा में जाता है और वहां पर फील्ड की घेराबंदी कर बल्लेबाज को आउट किया जा सकता है. लेकिन, रोहित जब फ्रंटफुट पर आकर पुल करते हैं तो यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि गेंद किधर जाएगी. ऐसे में फील्डिंग सेट करना टेढ़ी खीर होती है. बैट-पैड साथ होने और सिर के स्थिर होने जैसी बल्लेबाजी की सैद्धांतिक बातें ज्यादातर कॉमेंटेटर दोहराते हैं, लेकिन सचिन ने रोहित की बल्लेबाजी और केएल राहुल के फुटवर्क की निहायत क्रिकेटीय बातों का काफी सरलता से विश्लेषण किया जोकि कमाल था.

कॉमेंट्री बॉक्स में अक्सर पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की मौजूदगी रहती है और उनका अनुभव बहुत बड़ा होता है. लेकिन, सचिन तेंदुलकर की तरह सभी उसे कॉमेंट्री में नहीं उतारते या उतार नहीं पाते हैं. सचिन की कॉमेंट्री में यह दिखा कि अपने लंबे क्रिकेटीय जीवन के अनुभवों को उन्होंने बहुत बारीकी से महसूस किया है और उन अनुभवों के चलते उनके पास हर परिस्थिति में कहने के लिए पूरा एक खजाना है.

इंग्लैंड की ओवरकास्ट परिस्थितों में तेज गेंदबाजों के स्विंग मिलने और बल्लेबाजी के मुश्किल होने की बात आम है. लेकिन, सचिन ने बताया कि ऐसी परिस्थितों में स्पिनर्स अगर गेंद को हवा (फ्लाइट) दें तो उन्हें कैसे मदद मिलती है. बॉलिंग की दिशा और लंबाई ऐसी रखी जाए कि बल्लेबाज हवा के विपरीत शॉट खेलने को मजबूर हो जाए. हवा के खिलाफ लगाए गए शॉट कई बार बाउंड्री के अंदर रह जाते हैं और बल्लेबाज आउट हो जाता है. मैच के दौरान यह दिखा भी कि जब चहल और कुलदीप ने धीमी और फ्लाइटेड गेंदे फेंकनी शुरु कीं तो उन्हें सफलता मिली.

भुवनेश्वर कुमार के चोट लगने के बाद सचिन ने उनके हाव-भाव देखकर बता दिया कि उन्हें समस्या है और यह समस्या उनके घुटनों में है. यह बताता है कि सचिन अपने विशद अनुभव को कैसे आसानी से अपने वर्णन में समाहित कर लेते हैं. इसके अलावा मैच जब बारिश के चलते रूका और फिर सभी लोग खेल शुरु होने के लिए अंपायर की ओर देखने की बात कर रहे थे तो सचिन ने कहा कि अंपायर की तरफ देखने के बजाय हमें ग्राउंडस्टाफ की तरफ देखना चाहिए क्योंकि मैदान की हालत क्या है, यह उनके हाव-भाव देखकर पता चल जाएगा. फिर तेजी से दौड़ते ग्राउंड स्टाफ को देकखर उन्होंने कहा कि खेल जल्द शुरु हो जाएगा. और कुछ देर बाद अंपायर्स ने खेल शुरु होने की इजाजत दे भी दी. क्रिकेटिंग अनुभवों की इन्हीं बारीक बातों को अपनी कमेंट्री में समेटकर उन्होंने उसे भी अपने खेल की तरह दिलकश सहजता दी है.

सचिन ‘क्रिकेट के भगवान’ हैं. बतौर क्रिकेटर वे पूरी दुनिया के लिए मिसाल हैं और सभी उनसे कुछ न कुछ सीखते ही रहते हैं. लेकिन, क्रिकेट कॉमेंट्री में उनकी आमद से पूर्व खिलाड़ी कॉमेंटेटर्स भी चाहें तो काफी कुछ सीख सकते हैं. सचिन की हिंदी कॉमेंट्री सबसे ज्यादा यह बताती है कि आपको सबसे ज्यादा बात उस खेल की करनी चाहिए, जिसके आप माहिर हैं, न कि तुकबंदियों और घिसे-पिटे जुमलों के सहारे आपको अपना भाषायी कौशल दिखाने की कोशिश करनी चाहिए.