स्तेफ़ान अस्केल एक फ़ोटोग्राफ़र पत्रकार हैं. उस समय उनकी उम्र करीब 40 साल रही होगी जब वे अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गये. चलना-फिरना बहुत मुश्किल हो गया. डॉक्टरों ने कहा, रीढ़ का ऑपरेशन करना पड़ेगा. ऑपरेशन हुआ. लेकिन ऑपरेशन के बाद कमर से नीचे के पूरे शरीर को लकवा मार गया. डॉक्टरों से जो कुछ बन पड़ा, सब कुछ किया.कोई लाभ नहीं हुआ. अंततः उन्हें कहना पड़ा कि अब तो जीवनपर्यंत लकवे के साथ ही जीना पड़ेगा.

फ़ोटो-पत्रकार होने के नाते स्तेफ़ान अस्केल बीमारी से पहले घूमने-फिरने के आदी थे. स्वाभाविक ही था कि शेष जीवन बिस्तर में पड़े-पड़े या पहियाकुर्सी में बैठे-बैठे निठल्ले बिताना उन्हें कतई स्वीकार नहीं था. संयोग से उन्हें योग करने के लाभकारी प्रभावों का पता चला और वे यौगिक-उपचार तथा योगाभ्यास द्वारा काफ़ी कुछ ठीक भी हो गये. ठीक होते ही उन्होंने लगभग आधी दुनिया की यात्रा की. हर जगह उनका ऐसे लोगों से मिलना-जुलना हुआ, जो योग और ध्यान के माध्यम से अपनी बीमारियों से या तो मुक्त हो गये थे या अपनी शारीरिक बाधाओं को पूरी तरह या काफ़ी कुछ साध कर सामान्य जीवन बिता रहे थे.

दस वर्षों के विश्वभ्रमण का निचोड़

स्तेफ़ान अस्केल की डेढ़ घंटे की फ़िल्म ‘योग-जीवनदायी शक्ति’ दस वर्षों तक चले उनके विश्वभ्रमण का सिनेमा के पर्दे के लिए आत्मकथा जैसा सांस्कृतिक-आध्यात्मिक चित्रण है. फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से ठीक पहले 13 जून से यूरोप के कई देशों में एक साथ दिखायी जा रही है.

अस्केल की यात्रा का अंतिम पड़ाव इसराइल का येरुसलेम शहर था. इस लंबी यात्रा ने एक समय लकवे से पंगु हो गये इस शख्स को जीवन को समर्पणभाव से जीने और दुनिया को सकारात्मक ढंग से देखने की एक नयी दृष्टि दी. फ़िल्म में वे कहते हैं, ‘दस साल पहले मैं एक दूसरी दुनिया में बंधक था.’ शराब की लत के कारण पत्नी छोड़कर चली गयी. 2006 में पैर संज्ञाशून्य हो गये. ऑपरेशन हुआ तो कमर से नीचे के अंगों को लकवा मार गया. जीवन घृणा और ईर्ष्या से भर गया था.’

इन्हीं परिस्थितियों में स्तेफ़ान अस्केल जब फ्रांस के एक प्रसिद्ध अस्पताल ‘ओस्पिताल दे ला सालपेत्रियेर’ में अपना इलाज करवा रहे थे तो वहां के एक डॉक्टर जौं-पियेर फ़ार्सी ने उन्हें सलाह दी कि वे आज की आधुनिक चिकित्सापद्धति से ठीक नहीं हो सकते. यौगिक उपचार की शरण लें, शायद ठीक हो जायेंगे. यह सलाह अत्यंत असामान्य थी क्योंकि आधुनिक चिकित्सापद्धति (एलोपैथी/ अंग्रेज़ी चिकित्सा) के फ्रांसीसी डॉक्टर हर प्रकार की वैकल्पिक चिकित्सापद्धति को केवल कोसना-धिक्कारना ही जानते हैं.

योगगुरू बीकेएस अयंगर से प्रेरणा

अस्केल ने जब इस दिशा में खोजबीन की, तो उन्हें पता चला कि भारत के योगगुरू बीकेएस अयंगर ने फिसलन-रोधी चटाइयों, रस्सियों, पट्टों और पीठ के बल लेटने लायक अर्धवृत्ताकार लकड़ी की काठियों की मदद से, गंभीर क़िस्म की शारीरिक बाधाओं वाले लोगों के लिए भी, योगासन संभव बनाने की विधियां विकसित की हैं. अस्केल ने पहली बार जब इन चीजों को देखा, तो वे सोचने लगे कि ये सब उपचार-सामग्रियां हैं या यातना-विधियां! तब भी उन्होंने अपना उपचार करवाया और जर्मनी में व्युर्त्सबुर्ग शहर के पास के एक ईसाई मठ में ध्यान साधना (मेडिटेशन) की जापानी ‘ज़ेन’ विधि भी सीखी. 2003 से एक जर्मन ईसाई फ़ादर विलीगिस यैगर बेनेडिक्ट पंथ के इस मठ में यह जापानी विधि सिखाते हैं.

उपचार के दौरान मिल रही राहतों से योग में स्तेफ़ान अस्केल की रुचि बढ़ती गयी. उनका लकवा जब काफ़ी कुछ ठीक हो गया, तो उन्हें विचार आया कि उन्हें योगविद्या के असीम और कई बार चमत्कारिक लाभों और अपने अनुभवों के बारे में एक फ़िल्म बनानी चाहिये. लकवे से उबरने के अपने कष्टमय संघर्ष की हल्की-सी झलक देने के बाद अस्केल दर्शक को सीधे अमेरिका में सैन फ्रांसिस्को के पास सेंट क्वेन्टिन की एक उच्चसुरक्षा जेल में ले जाते हैं. वहां गंभीर अपराध कर चुके कुछ ऐसे क़ैदियों से बातचीत करते हैं, जो कसरतों आदि के साथ-साथ योगाभ्यास भी करते थे. उन्हें मौत की सज़ा सुनायी गयी थी. अपने अंतकाल की प्रतीक्षा कर रहे उनमें से एक ने कहा, ‘योग तनावमुक्त करने के साथ-साथ नये अनुभवों का धनी भी बनाता है.’

सफ़ारी करने गईं, योग सिखाने लगीं

एक दूसरे दृश्य में अमेरिका की पेज एलेन्सन बताती हैं कि वे अफ्रीकी वन्यजंतुओं को देखने के लिए अपने माता-पिता के साथ कीनिया की सफ़ारी-यात्रा पर गयी थीं और वहीं रह गयीं. अब वे वहां राजधानी नैरोबी की ग़ंदी बस्तियों के बच्चों और मसाई कबीले के लोगों को योग सिखाती हैं. इसराइल में अस्केल को कट्टरपंथी यहूदियों के शहर बेत शेमेह में एक ऐसा यहूदी दंपति मिला, जो पहले धार्मिक नहीं था, पर योग करने से उसमें अपने धर्म के प्रति नयी आस्था जाग उठी. येरूसलेम में अस्केल ने देखा कि वहां तो फ़िलस्तीनी गृहणियां भी यहूदियों के साथ मिल कर योगाभ्यास करती हैं!

स्तेफ़ान अस्केल का कहना है कि योग हर प्रकार की संस्कृतियों, आयुवर्गों और शारीरिक बाधाओं वाले लोगों को लाभ पहुंचाता है. अमेरिका की पेज एलेन्सन नैरोबी के बधिर बच्चों को योग सिखाने के लिए सांकेतिक भाषा वाले एक निःशब्द तरीके से काम लेती हैं, जबकि सामान्य बच्चों के लिए उनका अलग तरीका है. 80 साल के एरिक स्माल कई दशकों से ‘मल्टिपल स्क्लेरोसिस’ से पीड़ित हैं. यह बीमारी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम) की एक बीमारी है, जो मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और आंखों में प्रकाश ग्रहण करने वाली ऑप्टिक तंत्रिका (नर्व) को दुष्प्रभावित करती है. भारत के बीकेएस अयंगर द्वारा विकसित विधि को आधार बना कर एरिक स्माल ने इस बीमारी से पीड़ित लोगों का जीवन आसान बनाने का अपना एक अलग तरीका विकसित किया है. इससे स्वयं उनका अपना जीवन तो आसान बना ही, दूसरों का जीवन भी आसान बन रहा है.

अयंगर ने योग से असाध्य रोग भी साधे

बीकेएस अयंगर का 2014 में इस दुनिया से चले गये. उन्होंने लगभग 70 वर्षों तक स्वयं योगाभ्यास किया और अनगिनत लोगों को सिखाया भी. फ़िल्म में उनके साथ बातचीत का एक दृश्य भी है. असाध्य समझे जा रहे रोगों को भी योग द्वारा ठीक करने या उनसे काफ़ी हद तक राहत दिलाने की उनकी विधियां आज ऐसे कई अस्पतालों आदि में अपनायी जाती हैं, जहां वैकल्पिक चिकित्सा की सुविधा भी है.

स्तेफ़ान अस्केल मूलतः फ्रेंच भाषा में बनी अपनी फ़िल्म में योग के न केवल शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी लाभों के ही उदाहरण दिखाते हैं, उसके अदृश्य, पर उतने ही सकारात्मक सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक पक्ष पर भी प्रकाश डालते हैं. वे विभिन्न देशों के ऐसे लोगों के मुंह से उनके अनुभव सुनाते हैं, जो जीवन से निराश हो चले थे, पर योग और ध्यान ने जिन्हें उनका खोया जीवन वापस लौटा दिया.

आध्यात्मिक अनुभूति

इन भुक्तभोगियों की आपबीतियां बताती हैं कि जब भी किसी के घोर कष्टमय जीवन में कोई सुखद चमत्कार होता है, तो इससे उसे जो आत्मिक तृप्ति मिलती है, वह सभी धर्मों-पंथों से परे एक अलौकिक आध्यात्मिक अनुभूति बने बिना नहीं रहती. इसीलिए आसन, प्रणायाम और ध्यान के रूप में अपने तीनों अंगों वाला योगाभ्यास, खुशहाल लोगों की ‘वेलनेस’ कहलाने वाली खुशफहमी से कहीं अधिक, भारत का दिया एक ऐसा अनुभवसिद्ध विज्ञान बनता जा रहा है जिस पर अनगिनत शोधकार्य हो रहे हैं और जिसे सुख, स्वास्थ्य और संतोष की सर्वांगीण कुंजी माने जाने लगा है.

योग से डीएनए की ‘मरम्मत’

विज्ञान पत्रिका ‘फ्रन्टियर्स इन इम्यूनोलॉजी’ में जुलाई 2017 में प्रकाशित एक खोज में यहां तक सिद्ध हुआ पाया गया है कि योग में तन और मन को जिस तरह जोड़ने का प्रयास किया जाता है, उससे हमारे डीएनए की शब्दशः ‘मरम्मत’ तक हो सकती है.

नॉर्वे में कुछ समय पहले हुए एक अध्ययन में दस लोगों को एक सप्ताह तक हठयोग के तीनों अंगों – यानी आसनों, प्राणायाम और ध्यानधारण का अभ्यास कराया गया. चार-चार घंटे चलने वाले अभ्यास-सत्रों से पहले और बाद में प्रतिभागियों के रक्त-नमूने लिये गए और प्रयोगशाला में उनकी तुरंत गहराई से जांच की गई. दस दिन बाद पाया गया कि इन लोगों की रोगप्रतिरक्षण प्रणाली की ‘टी’ कोशिकाओं के 111 जीन पहले की अपेक्षा बदले हुए थे. तुलना के लिए जो लोग दौड़ लगाते हैं या कोई पश्चिमी नृत्य करते हैं, उनमें ऐसे 38 जीन ही बदले हुए मिलते हैं.

योग यदि विज्ञान-सम्मत न होता, तो यूरोप-अमेरिका में हर साल योग पर सिनेमा फ़िल्में नहीं बनती और लाखों-करोड़ों की संख्या में ऐसे लोग योग-ध्यान सीख नहीं रहे होते, जिन्हें हिंदू धर्म में कोई रुचि नहीं है.