23 मई, 2019 को जब लोकसभा चुनावों के परिणाम आ रहे थे तो उस दिन चारों तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की चर्चा हो रही थी. दिल्ली में हर ओर अमित शाह के राजनीतिक कौशल और संगठन की क्षमता का बखान किया जा रहा था. कहा जा रहा था कि अगर उनकी दिन-रात की अथक मेहनत न होती तो भाजपा के लिए इतनी प्रचंड जीत संभव न होती. लेकिन दिल्ली से दूर दक्षिण भारत में भी उसी दिन एक असाधारण घटना घट रही थी. आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के रूप में भी एक चमकते सियासी सितारे का उदय हुआ था. 175 सीटों वाली विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस 150 से अधिक सीटें जीतने में कामयाब हुई. 25 में से 22 लोकसभा सीटों पर उशका कब्जा हुआ. जगन मोहन की इस सफलता के बीच अचानक से चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी चर्चा में आए. बहुत से लोगों को उसी दिन पता चला कि जगन के लिए चुनावी प्रबंधन का काम प्रशांत किशोर कर रहे थे.

पिछले साल जब यह खबर आई कि प्रशांत किशोर बिहार में सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में बतौर उपाध्यक्ष शामिल हो गए हैं तो कइयों को लगा कि अब वे शायद अपनी पुरानी भूमिका से दूरी बनाएं और पूरी तरह से सक्रिय राजनीति में रम जाएं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जेडीयू भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में है. लेकिन आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस एनडीए का हिस्सा नहीं है. इसके बावजूद प्रशांत किशोर ने जगन के लिए काम किया.

इससे पहले जब 2017 में प्रशांत किशोर ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ और उत्तर प्रदेश में भी थोड़े समय तक कांग्रेस के साथ काम किया था तो उस वक्त नीतीश कुमार एनडीए के पाले में नहीं थे. उस वक्त प्रशांत किशोर भी जेडीयू का हिस्सा नहीं थे. इसलिए वह सब सामान्य माना गया. लेकिन जेडीयू के उपाध्यक्ष होने के बावजूद प्रशांत किशोर का जगन मोहन रेड्डी के लिए काम करना कई लोगों के लिए हैरान करने वाला था.

हालांकि, प्रशांत किशोर अपने फैसलों से राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान करते रहते हैं. जगन मोहन रेड्डी के साथ उनके काम करने को लेकर चर्चाएं चल रही थीं कि यह खबर आ गई कि वे अब पश्चिम बंगाल में भाजपा की धुर विरोधी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के साथ काम करेंगे. 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर की सेवाएं लेने का फैसला किया है. जब इस पर हो-हल्ला मचा तो उसके बाद हर किसी की नजरें जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर थीं. यह माना जा रहा था कि इस दौरान प्रशांत किशोर के इस निर्णय के बारे में कुछ जानकारी मिलेगी. लेकिन इस बैठक के बाद जेडीयू ने आधिकारिक तौर पर यह कह दिया कि प्रशांत किशोर की कंपनी किसी भी पार्टी के साथ काम करने को स्वतंत्र है और पश्चिम बंगाल में जेडीयू और तृणमूल कांग्रेस विरोधी खेमे में हैं.

तो क्या यह बात इतनी ही सरल है? इस सवाल पर जेडीयू के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘आपको क्या लगता है कि प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी को हां कहने के पहले नीतीश कुमार से इस संबंध में बात नहीं की होगी! याद रखिए कि इस बीच में दिल्ली से पटना तक कई राजनीतिक घटनाएं हुई हैं. दिल्ली की केंद्र सरकार में जेडीयू को वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो पटना में इसका जवाब नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए दिया. इसलिए यह अनायास नहीं है कि प्रशांत किशोर ममता बनर्जी के पास पहुंच गए हैं.’

प्रशांत किशोर एक योजना के तहत ममता बनर्जी के साथ काम कर रहे हैं, इसका अंदाजा इस बात से भी मिलता है कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस की ओर से उनकी सेवाओं के लिए पैसे भी नहीं मिल रहे हैं. खुद ममता बनर्जी ने ऐसे संकेत दिए जिनसे पता चलता है कि प्रशांत किशोर ने बगैर पैसे के उनके साथ काम करने का निर्णय लिया है. तृणमूल कांग्रेस मुखिया ने खुद कहा है कि प्रशांत किशोर से पैसों की कोई बात नहीं है और वे खुद ही बगैर पैसों के काम करना चाह रहे हैं.

अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब प्रशांत किशोर को पैसे नहीं मिल रहे हैं तो फिर वे एक ऐसे राज्य में क्यों काम कर रहे हैं जहां उनकी पार्टी की साझीदार भाजपा किसी भी कीमत पर सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है? इस बारे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार अभी से अपनी भविष्य की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

इन जानकारों के मुताबिक जिस तरह से भाजपा हर बात पर जेडीयू पर हावी होने की कोशिश कर रही है, उसमें 2020 का विधानसभा चुनाव एक निर्णायक मोड़ हो सकता है. संभव है कि गतिरोध मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषण को लेकर पैदा हो या फिर टिकटों के बंटवारे को लेकर. यह भी संभव है कि साथ चुनाव लड़ने के बावजूद भाजपा रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को अपने साथ मिलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना दावा ठोके. ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार के सामने एनडीए से बाहर निकलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रशांत किशोर के रूप में जेडीयू उपाध्यक्ष को विपक्षी पार्टियों के बीच में रखने का फायदा उस वक्त नीतीश कुमार को मिल सकता है जब वे फिर से एनडीए का साथ छोड़कर विपक्ष की राजनीति में आएं. उस स्थिति में प्रशांत किशोर अपने अनुभव का लाभ लेते हुए विपक्षी दलों को एक साथ लाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं.

नीतीश कुमार और जगन मोहन रेड्डी के बाद अब ममता बनर्जी को भी मिला लें तो तीन बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व से प्रशांत किशोर के संबंध बहुत अच्छे हैं. इसी तरह से बिहार विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के सर्वेसर्वा लालू यादव से भी उन्होंने 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान सहज संबंध विकसित करने में सफलता हासिल की थी. विश्लेषकों का कहना है कि अब जब लालू यादव की पार्टी का लोकसभा चुनावों में खाता भी नहीं खुल पाया है तो नीतीश कुमार के एनडीए से निकलने की स्थिति में प्रशांत किशोर एक बार फिर से आरजेडी को जेडीयू के साथ लाने में उपयो​गी साबित हो सकते हैं.

विपक्षी एकजुटता में प्रशांत किशोर के कांग्रेस से संबंधों का भी उपयोग हो सकता है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ उनके अच्छे संबंध बताए जाते हैं. कहा जाता है कि कि प्रियंका गांधी से भी उनके रिश्ते ठीक हैं. कांग्रेस में अभी बेहद प्रभावी लोगों में से एक कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ उन्होंने पंजाब विधानसभा चुनावों के वक्त काम किया है. इन सब बातों को देखते हुए कहा जा रहा है कि अगर भविष्य में कोई स्थिति ऐसी बनती है कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की कवायद हो तो प्रशांत किशोर इस काम में मुख्य भूमिका निभाते हुए नजर आ सकते हैं.