बीते कुछ दिनों से स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी घटनाएं देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं. एक तरफ़ पूरे बिहार में लू से 90 लोगों और चमकी बुख़ार से 136 बच्चों की मौत हो गई, वहीं पश्चिम बंगाल में दो डॉक्टरों की पिटाई से ग़ुस्साए डॉक्टरों ने अपने राज्य समेत देश के कई शहरों में स्वास्थ्य सेवाएं ठप कर दीं. हालांकि बीते सोमवार को ममता बनर्जी से बातचीत के बाद डॉक्टरों ने हड़ताल वापस ले ली है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी डॉक्टरों की सुरक्षा से जुड़ी याचिका पर सुनवाई स्थगित कर दी. उसने कहा कि अब इस मामले में किसी तरह का फ़ैसला सुनाने की कोई जल्दी नहीं है और आगे इस समस्या के हर पहलू पर बारीकी से गौर किया जाएगा.

पश्चिम बंगाल में 10 जून को क्या हुआ था

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को आधार मानते हुए सबसे पहले उस घटना के अहम पहलुओं पर ग़ौर करते हैं जिसने पूरे देश के डॉक्टरों को आंदोलन करने पर मजबूर कर दिया. द टेलीग्राफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक़ 10 जून की शाम छह बजे के आसपास कोलकाता के एनआरएस अस्पताल में मोहम्मद सईद नाम के 75 वर्षीय मरीज़ की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई. अस्पताल के एक जूनियर डॉक्टर ने अख़बार को बताया कि सईद की मौत के बाद उनके रिश्तेदारों ने अस्पताल के डॉक्टरों को गालियां देना शुरू कर दिया और इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया. तीन रिश्तेदारों ने कथित रूप से महिला डॉक्टरों से धक्का-मुक्की तक की. उसके बाद वे वहां से चले गए.

रिपोर्ट के मुताबिक़ बाद में जब वे सईद का शव लेने आए तो जूनियर डॉक्टरों ने उनसे पहले माफ़ी की मांग की. सईद के दो रिश्तेदारों ने हमला करने वालों की तरफ़ से माफ़ी मांग ली. लेकिन डॉक्टर हिंसा करने वाले रिश्तेदारों से माफ़ी मंगवाने पर अड़ गए. इस बीच वहां पुलिस पहुंच गई लेकिन उसने कोई कार्रवाई नहीं की. वहीं, एक और डॉक्टर के मुताबिक रात पौने 11 बजे के आसपास 200 लोगों की भीड़ ने चार मेडिकल छात्रों पर हमला कर दिया. उन चारों ने अलार्म बजा दिया और जल्दी ही उनके साथी भी वहां पहुंच गए.

उधर, मोहम्मद सईद के दामाद मोहम्मद मंसूर आलम का दावा है कि उनके ससुर को घबराहट हो रही थी और वे उन्हें दिखाने के लिए डेढ़ घंटे तक डॉक्टरों के सामने मिन्नत करते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें समय पर अटेंड नहीं किया. बाद में जाकर एक डॉक्टर ने सईद को इंजेक्शन दिया और उसके बाद उन्होंने सांस लेना बंद कर दिया. आलम के मुताबिक़ इसीलिए उनका और बाक़ी रिश्तेदारों का ‘दिमाग़ गरम हो गया’ और वे अपने बुज़ुर्ग सदस्य को समय पर चेक नहीं करने को लेकर डॉक्टरों से झगड़ पड़े.

मंसूर आलम का यह भी आरोप है कि जब वे अपने सुसर का शव लेने अस्पताल पहुंचे तो जूनियर डॉक्टरों ने उन्हें शव देने से इनकार कर दिया और माफ़ी की मांग की. उनका कहना है कि उन्होंने ख़ुद डॉक्टरों से माफ़ी मांगी, लेकिन वे नहीं माने. इसके बाद आलम ने बताया, ‘देर रात डॉक्टरों का एक समूह हॉकी-डंडे लेकर अस्पताल की इमारत से बाहर आया और हम पर हमला कर दिया... फिर वहां हाथापाई शुरू हो गई. पुलिस ने दोनों समूहों को अलग करने के लिए केवल परिवार पर लाठीचार्ज किया... उन्होंने डॉक्टरों को एक बार भी नहीं मारा.’

आलम ने जो दावा किया उसकी एक पुलिस अधिकारी ने भी पु्ष्टि की थी. उन्होंने कहा, ‘यह तय किया गया कि अस्पताल परिसर की एक खुली जगह पर (रिश्तेदारों और डॉक्टरों के बीच) बातचीत होगी. लेकिन रिश्तेदार और पुलिस जब वहां पहुंचने को थे, तभी डॉक्टरों का एक समूह वहां आया और रिश्तेदारों के साथ पुलिस के पीछे दौड़ा.’ रिपोर्ट के मुताबिक़ इसी दौरान किसी ने एक नारियल उठाकर फेंका जो एक डॉक्टर के सिर पर जा लगा. इसके बाद तीन लोगों को मौक़े से और दो को बाद में गिरफ़्तार कर लिया गया.

बीती दस जून को हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में पहली ग़लती किसकी थी, यह बताना मुश्किल है. लेकिन इसने देश के स्वास्थ्य संकट से जुड़े कई मुद्दे उठा दिए हैं जिनके हर पहलू पर गौर किया जाना चाहिए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है. इस संबंध में डॉक्टरों का पक्ष पहले रखना ज़रूरी है, क्योंकि मरीज़ों की जान उन्हीं के भरोसे है और अगर वे असुरक्षित महसूस करते रहे तो दवाइयों और अन्य संसाधनों में सुधार के बाद भी हालात नहीं बदलेंगे.

डॉक्टरों की सुरक्षा ज़रूरी

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने अपने आंकड़ों के आधार पर कहा है कि देश के 75 प्रतिशत डॉक्टर किसी न किसी तरह की हिंसा (अपशब्द या हाथापाई) का शिकार हुए हैं. आईएमए के अध्ययन के अनुसार हिंसा की 50 प्रतिशत घटनाएं अस्पतालों के सघन चिकित्सा इकाइयों (आईसीयू) में हुई हैं और 70 फ़ीसदी मामलों में मरीज़ों के रिश्तेदार ऐसी घटनाओं में संलिप्त रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में आईएमए ने कहा है कि डॉक्टर, विशेषकर सरकारी अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सक हमारे रक्षक हैं और वे राष्ट्र की, विशेषकर देश के गरीब और उपेक्षित तबक़े की बेहद विपरीत परिस्थितियों में सेवा करते हैं, लिहाज़ा उन्हें संरक्षण प्रदान किए जाने की आवश्यकता है.

जानकार कहते हैं कि आईएमए ने डॉक्टरों के पक्ष में जो बातें कहीं वे बिलकुल सही हैं. उनके साथ होने वाली हिंसा की घटनाओं की निश्चित ही निंदा होनी चाहिए और उनकी सुरक्षा का इंतज़ाम किया जाना चाहिए. लेकिन इसके साथ यह भी देखा जाए कि आख़िर ग़रीब और मध्यम वर्ग के लोग क्यों और कब उन पर हमला करते हैं.

सरकारी बदइंतज़ामी और निजी अस्पतालों की लूट

देश में मरीज़ों की संख्या करोड़ों में है. रिपोर्टें बताती हैं कि देश में प्रति 11,000 मरीज़ों के लिए केवल एक डॉक्टर उपलब्ध है. कुछ राज्यों में यह अनुपात और भी ख़राब है. ज़्यादातर मरीज़ इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से बदहाल हैं. वहां सस्ती दवाइयां और बेड पर्याप्त नहीं हैं और न ही सभी प्रकार के टेस्ट हो पाते हैं. डॉक्टर अक्सर बाहर से टेस्ट कराने और दवाई ख़रीदने के लिए लिख देते हैं. ये टेस्ट निजी क्लिनिकों या अस्पतालों में होते हैं जहां मरीज़ और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति से किसी को कोई मतलब नहीं होता. वे जानते हैं कि अपनी क़रीबी की जान बचाने के लिए परिजन पैसे का इंतज़ाम करेंगे ही. बाहर से टेस्ट कराते और दवाइयां ख़रीदते-ख़रीदते लोगों के कमाए काफ़ी रुपये ख़त्म हो जाते हैं.

इसके बाद भी उनके अपनों की मौत हो जाए तो वे किससे शिकायत करें. सरकारें, प्रशासन, अस्पताल यहां तक की मीडिया भी उनकी अनदेखी करता है. बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में चमकी बुख़ार से मरते बच्चों का मामला इसका ताज़ा उदाहरण है. वहां सालों से इस बीमारी से बच्चों की मौतें हो रही हैं. इसे लेकर एहतियातन तैयारी कभी नहीं की गई. लेकिन सरकार से सवाल करने के बजाय न्यूज़ चैनलों के पत्रकार आईसीयू में घुसकर डॉक्टरों पर चिल्ला रहे हैं!

बेहाल व्यवस्था का ग़ुस्सा डॉक्टरों पर निकल रहा है

कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह डॉक्टरों की छवि दो तरह से ख़राब होती है. पहले मरीज़ उन पर सही इलाज नहीं करने का आरोप लगाते हैं, फिर मीडिया भी उन्हें ही दोषी बताता है. ऐसे में चिकित्सा कमियों की वजह से होने वाली मौतों से ग़ुस्साए लोगों से कैसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वे हर बार शांत रहेंगे. सरकार और मीडिया दोनों तक उनकी पहुंच नहीं है. लेकिन डॉक्टरों तक वे पहुंच सकते हैं, इसलिए अक्सर उनके साथ हिंसा की घटनाएं हो जाती हैं.

सोशल मीडिया पर भी कई लोगों का यह कहना है कि सरकारी अस्पतालों की बदइंतज़ामी और निजी अस्पतालों के आर्थिक शोषण के बीच पिस रहे ग़रीब तबके और मध्यम वर्ग के लोग अचानक इतने बिफर जाएं कि किसी डॉक्टर पर या अस्पताल पर हमला कर दें तो इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है. वे कहते हैं कि स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ा यह संकट जितना सामाजिक है उतना ही मनोवैज्ञानिक भी.

डॉक्टरों और अस्पतालों का रवैया भी सवालों के घेरे में है

हिंसा की इन घटनाओं के लिए डॉक्टर और अस्पताल भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. आए दिन यह जानने को मिलता है कि किसी ग़रीब परिवार के सदस्य की मौत के बाद उसके परिजनों को शव ले जाने के लिए अस्पताल ने गाड़ी तक नहीं दी और उसे मजबूरी में साइकिल, रिक्शे या ख़ुद ही कंधे में डालकर शव को ले जाना पड़ा. कभी किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा में भी अस्पताल के लोग भर्ती नहीं करते. इस कारण महिला को सड़क पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ता है. ऐसी घटनाओं में जन्म देने वाली महिला की मौत भी हो जाती है.

इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि अस्पताल का स्टाफ़ और कई बार डॉक्टर भी लोगों से सही व्यवहार नहीं करते. बिहार में चमकी बुख़ार से 136 बच्चे मर चुके हैं. मौतों का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है. ऐसे में जो बच्चे अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं उनके माता-पिता कैसे शांत रह सकते हैं. लेकिन यह समझने की जगह अस्पताल स्टाफ़ का एक सदस्य एक बच्चे के पास रो रही महिला को डांटता दिखाई देता है.

इसी हफ़्ते उत्तर प्रदेश के बरेली में एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की लापरवाही की वजह से चार दिन के नवजात की मौत हो गई. डॉक्टरों ने उसके माता-पिता को तीन घंटे तक अस्पताल की पुरुष और महिला ब्रांच के बीच घुमाया, लेकिन बच्ची को भर्ती नहीं किया. इस बीच बच्ची ने दम तोड़ दिया. क्या इस तरह की घटनाओं से डॉक्टरों के प्रति लोगों में आक्रोश पैदा नहीं होगा?