अमेरिका और चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध में परस्थितियां और खराब होती जा रही हैं. बीते महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को बड़ा झटका देते हुए उसके 200 अरब डॉलर के उत्पादों पर आयात शुल्क ढाई गुना तक बढ़ा दिया. इसके चलते अमेरिका में चीनी सामान की कीमत में 10 से 25 फीसदी तक का उछाल आ गया. उधर, चीन ने भी अमेरिका के इस कदम का जवाब दिया. उसने 60 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पादों पर 25 फीसदी का आयात शुल्क लगा दिया. चीन ने अमेरिकी खेती की रीढ़ माने जाने वाले सोयाबीन के आयात पर भी अस्थाई रोक लगा दी.

यह सब तब हुआ जब व्यापार युद्ध खत्म करने को लेकर अमेरिका और चीन के बीच बीते सात महीनों से बैठकों का दौर जारी है. लेकिन, दोनों के बीच कोई बात बनती नहीं दिख रही है. इन बैठकों की जानकारी रखने वाले कई जानकार यह बताते हैं कि जैसी परस्थितियां बनी हुई हैं उन्हें देखकर निकट भविष्य में दोनों देशों के बीच समझौते को लेकर कोई आशा नहीं जगती. ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर वे क्या कारण हैं जिनके चलते सात महीने बाद भी अमेरिका और चीन के बीच सुलह नहीं हो पायी है.

सब्सिडी योजना और विदेशी कंपनियों के लिए बने नियम बड़ी रूकावट

जानकारों के मुताबिक दोनों देशों के बीच कुछ ऐसी बुनियादी योजनाओं पर बात नहीं बन पा रही है, जो सालों से चीनी अर्थव्यवस्था की जान हैं. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर अमेरिकी अर्थशास्त्री ग्रेग राइट के मुताबिक इनमें पहली चीनी सरकार द्वारा अपनी कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी है. अमेरिका का कहना है कि चीनी सरकार की इस सब्सिडी की वजह से वहां की कंपनियां अमेरिका में कम कीमत पर उत्पाद बेचती हैं और इसकी वजह से अमेरिकी कंपनियों के उत्पादों को लोग खरीदते नहीं हैं. इसके चलते न सिर्फ अमेरिका को चीन से भारी व्यापार घाटा उठाना पड़ता है बल्कि अमेरिकी कंपनियों में नई नौकरियां भी पैदा नहीं होतीं.

अमेरिका और चीन के बीच चल रही बातचीत में दूसरा पेंच अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन में बनाए गए नियमों पर अटका है. चीन ने बाहरी कंपनियों के अपने देश में निवेश को लेकर नियम काफी कड़े कर रखे हैं. इन नियमों के मुताबिक किसी विदेशी कंपनी को चीन में व्यापार करने के लिए किसी चीनी कंपनी से साझेदारी करनी जरूरी है. नियमों के तहत दोनों कंपनियों को मिलकर एक साझा प्रोडक्ट तैयार करना पड़ता है. अमेरिकी कंपनियां इस नियम का काफी विरोध करती रही हैं. इनका कहना है कि साझा प्रोडक्ट के जरिए चीन उनके तकनीक ज्ञान यानी बौद्धिक संपदा की चोरी कर लेता है. बीते साल डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा कराई गयी जांच में सामने आया है कि चीन अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी कर उसे हर साल 250 से 500 अरब डॉलर तक का नुकसान पहुंचाता है.

चीन इन नियमों को क्यों नहीं बदल सकता?

जानकारों के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के सामने इन दोनों नियमों को बदलने की शर्त रखी जिस पर चीन तैयार नहीं है. अमेरिकी और चीनी जानकार चीन के तैयार न होने के पीछे कई वजहें बताते हैं. इन लोगों की मानें तो कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी व्यवस्था में चीन अभी इसलिए कोई बदलाव नहीं कर सकता क्योंकि इस समय उसकी अर्थव्यवस्था दो दशक के सबसे कमजोर दौर से गुजर रही है. अगर ऐसे में चीन अपनी इस बुनियादी योजना में बदलाव करता है तो यह उसकी अर्थव्यवस्था के लिए और जोखिम भरा साबित हो सकता है.

विदेशी कंपनियों के चीन में व्यापार करने संबंधी नियमों में भी चीन अचानक बदलाव नहीं कर सकता क्योंकि अगर वह अमेरिकी कंपनियों के लिए नियम बदलता है तो अन्य देश भी उससे ऐसा करने को कहेंगे. यूरोपीय संघ काफी पहले से इस मुद्दे पर चीन से बातचीत कर रहा है. विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में कई यूरोपीय कंपनियों ने चीनी कंपनियों द्वारा उनके तकनीकी ज्ञान की चोरी किए जाने की शिकायतें भी दर्ज कराई हैं. अब जाहिर है कि अगर चीन अमेरिकी कंपनियों को नियमों में रियायत देगा तो यूरोप भी अपनी कंपनियों को रियायत देने के लिए चीन पर दबाव बनाएगा.

चीन और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत पर पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के पूर्व गवर्नर दाई ज़ियांगलोंग का मानना है कि दोनों के बीच जल्द समझौता नहीं होने वाला है. एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, ‘चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप अगले महीने भी जापान में मुलाकात करेंगे, उम्मीद करता हूं कि कुछ अच्छी खबर आये. लेकिन मेरा मानना है कि इस मुलाकात के बाद भी व्यापार युद्ध हाल-फिलहाल खत्म होने के आसार नहीं हैं.’ दाई ज़ियांगलोंग इसका कारण बताते हुए कहते हैं, ‘अभी व्यापार युद्ध खत्म होना इसलिए मुश्किल है क्योंकि मुझे नहीं लगता कि अमेरिका उन शर्तों में इतनी जल्दी कोई बदलाव करेगा जिन पर डोनाल्ड ट्रंप एक साल से अड़े हुए हैं.’

2020 के अंत तक सुलह की उम्मीद

अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध पर कुछ जानकार एक और भी बात बताते हैं. इनके मुताबिक भले ही डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हों कि इस व्यापार युद्ध में अमेरिका की ही जीत होगी, लेकिन ऐसा नहीं होने वाला. जानकारों के मुताबिक इसमें आने वाले समय में चीन के साथ-साथ अमेरिका को भी भारी नुकसान उठाना पड़ेगा.

हाल ही में हुए सर्वेक्षणों को देखने पर इसका अंदाजा भी लगता है. न्यूयॉर्क स्थित फेडरल रिजर्व बैंक, कोलंबिया विश्वविद्यालय और प्रिंसटन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्रियों द्वारा बीते मार्च में किए गए एक अध्ययन के अनुसार 2018 में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन के स्टील पर लगाए गए शुल्क की वजह से अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं को स्टील और उससे बने उत्पादों के लिए हर महीने तीन अरब डॉलर ज्यादा आयात शुल्क देना पड़ा है. ये लोग कहते हैं कि अब जैसे-जैसे डोनाल्ड ट्रंप चीनी उत्पादों पर टैक्स बढ़ाएंगे, अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर इसका बोझ बढ़ेगा.

बीते दिसंबर में अर्जेंटीना में हुई एक बैठक के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने शी जिनपिंग को तीन महीने का समय दिया था. लेकिन इस समयावधि में भी सहमति नहीं बन सकी | एएफपी
बीते दिसंबर में अर्जेंटीना में हुई एक बैठक के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने शी जिनपिंग को तीन महीने का समय दिया था. लेकिन इस समयावधि में भी सहमति नहीं बन सकी | एएफपी

अमेरिकी न्यूज़ चैनल ‘फॉक्स न्यूज़’ के विशेष संवाददाता चाड पेरग्राम अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं, ‘चीन के उत्पादों पर शुल्क बढ़ने के बाद अब प्रत्येक अमेरिकी को औसतन 800 डॉलर हर वर्ष अपनी जेब से ज्यादा खर्चने होंगे.’ अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कई अमेरिकी कंपनियों ने डोनाल्ड ट्रंप से व्यापार युद्ध खत्म करने की अपील की है. इनका कहना है कि अगर जल्द व्यापार युद्ध खत्म नहीं हुआ तो वे कर्मचारियों की छंटनी करने को मजबूर हो जाएंगी.

एक अध्ययन के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल में लगाए गए शुल्क की वजह से साल 2020 में अमेरिकी विकास दर में 0.30 फीसदी की गिरावट आएगी. इन लोगों का यह भी कहना है कि अगर राष्ट्रपति ने अपने कहे के मुताबिक आने वाले कुछ महीनों में चीनी सामान पर शुल्क और बढ़ा दिया तो अगले साल विकास दर में 0.50 फीसदी की कमी आ सकती है और इससे तीन लाख अमेरिकियों की नौकरियां संकट में पड़ सकती हैं.

व्यापार युद्ध के चलते अमेरिकी किसानों की भी हालत खराब होती नजर आ रही है. अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक देश है और चीन उसका 60 फीसदी तक सोयाबीन खरीदता है. लेकिन अब चीन ने अमेरिकी सोयाबीन का आयात फिलहाल बंद करने का फैसला किया है जिसकी सीधी मार अमेरिकी किसानों पर पड़ने वाली है.

दुनिया भर के जानकार कहते हैं कि अगले साल के अंत में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है जिसमें रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से डोनाल्ड ट्रंप ही फिर मैदान में होंगे. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक यह चुनाव जिस समय होगा, उस समय अमेरिकी अर्थव्यवस्था ट्रंप की नीतियों की वजह से मुश्किल दौर में घिरी होगी, अमेरिकी उपभक्ताओं से लेकर वहां के किसान भी खासे परेशान होंगे. ऐसे में उम्मीद है कि चुनाव जीतने के लिए डोनाल्ड ट्रंप इन परस्थितियों से बचना चाहेंगे और चुनाव से कुछ महीने पहले चीन से समझौते के लिए तैयार हो जाएंगे.