ऐसा कभी सोचा नहीं था. नश्वरता के गणित और अनिवार्यता की छाया तो लंबे समय से साथ रही है. फिर भी ऐसा सोचा न था कि इतनी तेज़ी से हिंदी के साहित्य-संसार में अनुपस्थिति का वितान इतना फैल जायेगा. पिछले लगभग तीन वर्षों में हिंदी ने बड़ी संख्या में महत्वपूर्ण लेखक खोये हैं. कुंवर नारायण, चन्द्रकान्त देवताले, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती, नामवर सिंह, अर्चना वर्मा. लगता है कि हिंदी में कुछ वरिष्ठ और कुछ महत्वपूर्ण तो अब भी हैं पर मानों मूर्धन्यों का युगान्त हो गया. मेरे हिसाब से एकमात्र बचे मूर्धन्य कृष्ण बलदेव वैद भारत से बाहर हैं- अशक्त होने के बावजूद सौभाग्य से सृजन-सक्रिय हैं.

मेरा लंबा लगभग साठ वर्षों में फैला साहित्यिक-सांस्कृतिक जीवन इन दिवंगतों की सोहबत और कइयों से याराना संबंधों और संवादों में बीता है. उनमें से कइयों से बरसों मिलना नहीं भी होता था पर उनका होना एक तरह का आश्वासन था. वे थे तो हमारी दुनिया, सारे घिरते अंधेरों के बावजूद, रोशन थी. उनमें से प्रायः हरेक से असहमतियां थीं. हम एक-दूसरे पर प्रतिकूल टिप्पणियां करने से भी बाज़ नहीं आये पर सद्भाव और मिलकर बैठने और ग़पियाने की इच्छा कभी शिथिल नहीं पड़ी. वे थे तो यह स्पष्ट होता रहता था कि साहित्य-समाज-समय-व्यक्ति को समझने की कई दृष्टियां हैं, जिनके आपस के टकरावों के बावजूद, जिनकी आभा और आवश्यकता कभी कम नहीं होती थी. उनमें से कइयों से गिले-शिकवे थे, कई स्तरों पर गहरे असंतोष. फिर भी उनका होना एक तरह आश्वासन था कि साहित्य और विचार और समय जीवंत हैं.

सही है कि मेरा याराना लेखकों के अलावा चित्रकारों, कलाविदों, शास्त्रीय संगीतकारों और नर्तकों, रंगकर्मियों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि से भी रहा है. उनसे जब-तब मिलना, बहसना, ग़प लगाना, उनके साथ रसरंजन करना आदि सब बहुत मज़ा देते हैं. पर उन सब पर अब एक तरह की काली छाया जैसे मंड़राती रहती है. हमारी मंडली में कुछ जगहें हमेशा के लिए ख़ाली हो गयी हैं और उनका ख़ालीपन अब मानों हर याराना बैठक में आकर अलग से बैठ जाता है. यह एक तरह का ‘देह धरे को दण्ड’ ही है!

निजी के अलावा सामाजिक और व्यापक स्तरों पर भी यह बढ़ती अनुपस्थिति क्षतिकारी है. वाद-विवाद-संवाद आदि तो अब भी होते रहेंगे पर ऐसा लगता है कि उनमें वैसी धार, तेज़ी-तुर्शी, गहराई और ज़िम्मेदारी नहीं होगी. उनकी जैसी क़द-काठी के लेखक जल्दी ही उभरेंगे ऐसी उम्मीद भी थोड़ी व्यर्थ लगती है. हिंदी साहित्य, दुर्भाग्य से, अब अपने औसतपन से ही काम चलाने, सन्तुष्ट होने के लिए अभिशप्त सा है. यह आकलन कई मित्रों को अकारण अतिरंजित और बेवजह निराशावादी लग सकता है. शायद हो भी. ग़ालिब का एक मिसरा याद आता है. अगले वक़्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो..... हमारा वक़्त फिर भी तेज़ी से बीत ही रहा है. काम बहुत करता हूं पर ‘यार से छेड़’ के बिना उसमें रस छीजता सा है.

असंभव विकल्प

बुढ़ाती आंखों और शिथिल पड़ते हृदय ने, सारी विफलताओं के बावजूद, सपने देखना बंद नहीं किया है, भले कुछ बुरे सपने भी आते ही रहते हैं. हम सभी देख रहे हैं कि हमारे समय में राजनीति ने समाज को इस क़दर ग्रस लिया है कि उसका लगभग कोई क्षेत्र या वृत्ति उससे अनछुए नहीं रहे हैं. समाज का ऐसा सकल राजनैतिकीकरण लोकतंत्र के लिए हितकर नहीं है, भले वह लोकतंत्र की प्रक्रियाओं और संस्थाओं के किये ही इतनी तेज़ी, सफलता और व्यापक रूप से क्यों न हो रहा हो. यह अरण्यरोपन पहले भी हो चुका है कि राजनीति को मर्यादित करने के लिए उससे कहीं अधिक व्यापक समाजनीति की दरकार है. विडंबना यह है कि ऐसी समाजनीति बनाने के लिए पहल राजनीति को ही करनी होगी. ऐसा आत्मसंयम का मुक़ाम हमारी राजनीति में आ गया है या आनेवाला है जल्दी ही, ऐसा मानने का अभी कोई आधार नहीं है. बेहद ध्रुवीकृत राजनीति शिकार करने की वीरता में और शिकार हो जाने के क्लेश में आत्मतुष्ट नज़र आती है.

फिर भी, एक व्यापक असंभव विकल्प सोचने का उत्साह छोड़ने का मन नहीं हो रहा है. प्रधानमंत्री ने अपने विजय-भाषण में ‘सबका विश्वास’ जीतने की बात कही है. यह विकल्प उसी पर हिलगाने की एक कोशिश है. राज्य याने केंद्र सरकार और सभी सरकारें संयुक्त रूप से उच्चतम स्तरों से यह स्पष्ट घोषणा करें कि संविधान के प्रावधानों के अनुरूप सभी नागरिकों को, जाति-धर्म-सम्प्रदाय-लिंग के भेदों से परे और ऊपर उठकर नागरिक जीवन, सेवाओं आदि में शिरकत करने के समान अधिकार और अवसर दिये जायेंगे. इन भेदों के आधार पर काम करनेवालों से पूरी सख़्ती से क़ानूनन निपटा जायेगा. केंद्र सरकार एक अखिल भारतीय समरसता सम्मेलन बुलाये जिसके तीन सत्र हों. एक में राजनेता, दूसरे में धर्मनेता और तीसरे में सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, लेखक-कलाकार, अकादेमिक आदि. संसद के एक विशेष सत्र में गांधी जी के 150वें वर्ष के उपलक्ष्य में ऐसा ही संकल्प संसद सर्वसम्मति से पारित करे.

चुनाव में पैदा सारी कटुता भुलाकर सत्ताधारी दल विपक्ष के दलों के निरन्तर संवाद की एक अनवरत प्रक्रिया पर अमल करें. विपक्षी दल संसद के बहिष्कार से बाज़ आयें और उसमें उपस्थित और मुखर होकर अपना पक्ष रखें. जो नयी शिक्षा नीति बनने जा रही है उस पर अनेक स्तरों पर व्यापक विचार-विमर्श हो और संसद में पूरी बहस के बाद वह सर्वसम्मति से स्वीकार की जाये. देश के हर शहर और गांव में स्थायी सद्भाव समितियां गठित की जायें जिनमें सब धर्मों-सम्प्रदायों-जातियों-लिंगों के लोग शामिल हों और अपने क्षेत्र में समरसता और शान्ति के उपाय अमल में लायें और चौकसी करें.

ज्ञान, शिक्षा, विज्ञान, मानविकी, आर्थिकी आदि क्षेत्रों में संवाद और शास्त्रार्थ की संस्कृति विकसित करने और पोसने की ईमानदार चेष्टा की जाये. सरकारी तंत्र पर राजनैतिक नेतृत्व का प्रभुत्व नागरिक चौकसी विकसित कर कम किया जाये. उसकी बढ़ती असंवेदनशीलता को कम करने के लिए एक दीर्घकालीन योजना बनायी जाये. ज़मीनी स्तर पर घूसखोरी कम होने के बजाय बढ़ रही है. उसे रोकने-थामने के उपाय नागरिक परामर्श के बाद अमल में लाये जायें. राजनेता नहीं, नागरिक चौकीदार बनें.

भारतीय कथा विश्व

हिंदी अंचल में राजनीति द्वारा फैलायी जा रही विस्मृति पर हम, उचित ही, बहुत उत्तेजित होते हैं. पर अपने कभी इस पर ध्यान दिया है कि हिंदी साहित्य का समकालीन बड़ा हिस्सा स्वयं तरह-तरह की विस्मृति से ग्रस्त है? मुझे इसका ध्यान आया जब मैंने गुजराती के वरिष्ठ लेखक शिरीष पंचाल द्वारा लिखे गये दो ग्रंथ देखे. भारतीय कथा विश्व 1 और 2। सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रकाशित इन ग्रंथों के सिलसिले में मुझे फरवरी में गुजरात जाना था पर स्वास्थ्य की गड़बड़ी के कारण नहीं जा पाया. इधर जब इन ग्रंथों को देखना-पलटना शुरू किया तो खेद गहरा हो गया.

भारतीय कथा विश्व के पांच भाग निकलना है. अभी दो ही आये हैं. पहले भाग में वेदों-उपनिषदों-ब्राह्मणों से कथाएं हैं. उनमें से कुछ हैं. होता बने हुए प्रजापति, उषस्ति की कथा, शौव साम की कथा, श्वेतकेतु की कथा. दूसरे भाग में हमारे दो महाकाव्यों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ से कथाएं ली गयी हैं. उनमें से कुछ हैं- कुशनाभ कन्याओं की कथा, ईल राजा की कथा, त्रिजट ऋषि की कथा, दुःशला के जन्म की कथा, कल्माषपाद की कथा, मुद्गल की कथा, उशीनर की कथा, अंगिरा की कथा, परपुरंजय की कथा, दम्भोद्भव की कथा, त्रिपुरासुर की कथा, बलाक व्याध की कथा, देवल मुनि की कथा, महोदर मुनि की कथा, कृतघ्न गौतम की कथा, कीट और व्यास, उशना की कथा, च्यवन ऋषि और मछुआरे, गौतम और चिरकारी की कथा, सूर्य और जमदग्नि की कथा, अगत्स्य ऋषि का यज्ञ, युधिष्ठिर का यज्ञ और नेवला.

तीसरा भाग प्राकृत साहित्य से कथाओं का है. चौथे में पुराण की कथाएं होंगी. पांचवें में भारतीय लोकथाएं होंगी. यह है भारतीय कथा का विश्व, आधुनिकता के शुरू होने से पहले का. यह संसार की सबसे समृद्ध और विविध कथा-परम्पराओं में से एक है. इस परंपरा की कितनी कम अंर्तध्वनियां हमारे कथा-साहित्य में आज हैं. याद आता है कि पाकिस्तान के उर्दू कथाकार इंतज़ार हुसेन ने कई बौद्ध कथाओं को हमारे समय के लिए, नवाचार कर, फिर से लिखा था. यह विश्वास करने का आधार है कि इन कथाओं को पढ़ने से यह सहज ही ज़ाहिर हो जायेगा कि हमारी कथा-परम्परा में सच्चाई, मूल्यों, कथायुक्तियों, चरित्रों, अतियथार्थ, गहरे जीवनबोध आदि की अपार और अदम्य बहुलता रही है. हमारी आधुनिकता ने, विशेषतः कथा के क्षेत्र में, इस सबको भुला दिया. दास्तानों की जो लम्बी परंपरा रही है वह भी संज्ञान में नहीं ली गयी. कविता में थोड़ी स्मृति और अंर्तध्वनि नयी कविता के ज़माने तक थीं जो अब लगभग ग़ायब हो चुकी हैं. नाटक में वे कभी-कभी मार्मिक ढंग से जागती हैं.

विस्मृति के अभियान और संस्कृति-इतिहास की भयानक पर व्यापक दुर्व्याख्या के समय में अपने कथाविश्व को स्वायत्त करना और उसे सृजनात्मक रूप से याद करना एक तरह का प्रतिरोध हो सकता है.