बिहार में एक्यूट इंसेफ़ेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) या ‘चमकी’ बुख़ार से अब तक 150 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है. इस बीमारी ने बिहार में स्वास्थ्य सेवा व सुविधाओं की ज़मीनी हक़ीक़त सामने लाने के अलावा सूबे की नीतीश कुमार सरकार के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक संकट भी खड़ा कर दिया है. कई लोगों का कहना है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में चमकी की त्रासदी ‘सुशासन बाबू’ के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है.

लेकिन आलोचनाओं के घेरे में केवल नीतीश कुमार और उनकी सरकार नहीं है. इस बीमारी को लेकर आई कुछ मीडिया रिपोर्टों में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की आयुष्मान भारत योजना पर भी सवाल उठाए गए हैं. इनमें योजना के सीमित रूप से लागू होने की जानकारी दी गई है और बिहार के आम लोगों के हवाले से सवाल किया गया है कि आख़िर ऐसी योजना का क्या फ़ायदा जो लोगों की जान बचाने में काम नहीं आई.

रिपोर्टों के मुताबिक़ आयुष्मान भारत योजना के तहत जिन बीमारियों को शामिल किया गया है उनमें एईएस भी शामिल है. बताया जा रहा है कि बिहार में चमकी बुख़ार के केवल 32 ‘आयुष्मान’ लाभार्थी सामने आए हैं. इस आधार पर सोशल मीडिया पर कई लोगों ने केंद्र सरकार की इस योजना को लेकर नाराज़गी ज़ाहिर की है और चमकी बुख़ार से बच्चों की मौतों के लिए इसे भी कहीं न कहीं ज़िम्मेदार ठहराया है.

लेकिन यह आलोचना कहां तक सही है? कई चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि चमकी बुख़ार के बारे में अभी भी ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने भी कहा है कि इस बीमारी की वजह के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. ऐसे में आयुष्मान भारत की आलोचना होने पर एक सवाल यह भी बनता है कि क्या इस योजना का उद्देश्य बीमारियों पर शोध कर उनकी वजहों का पता लगाना है.

आयुष्मान योजना का उद्देश्य इलाज का ख़र्च उठाने तक सीमित

केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना में स्वास्थ्य क्षेत्र के सुधार से जुड़े कुछ प्रावधान ज़रूर शामिल किए गए हैं, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य ग़रीब परिवारों का मुफ़्त इलाज सुनिश्चित करना है. इसके लिए सरकार ने बीमारियों और योजना के लाभार्थियों की सूची तैयार की है और इलाज के लिए सालाना पांच लाख रुपये तक की राशि तय की है.

लेकिन अगर सूची में शामिल अस्पताल में चिकित्सा सुविधाओं (दवाइयां, बेड अन्य चिकित्सा उपकरण) का हाल बदतर है तो इसमें आयुष्मान भारत योजना की क्या भूमिका है? कई जानकारों के मुताबिक केंद्र के समक्ष यह मुद्दा उठाया जाना चाहिए, लेकिन यह भी देखना चाहिए कि इस समस्या के लिए सीधे तौर पर सबसे ज्यादा राज्य सरकार ज़िम्मेदार है.

आयुष्मान भारत का दायरा केवल मरीज़ का मुफ़्त इलाज सुनिश्चित करने तक सीमित है. इसलिए जानकारों के मुताबिक यह समझना होगा कि अगर बिहार में चमकी बुखार से जूझ रहे इस योजना के लाभार्थियों की संख्या 32 से ज़्यादा भी होती, तो भी बदहाल चिकित्सा सुविधाओं में उनका उचित इलाज संभव नहीं होता.

कुछ जानकारों के मुताबिक आयुष्मान भारत योजना की आलोचना के समर्थन में यह सवाल भी ठीक नहीं कि इसके दायरे में निजी अस्पतालों को रखने का क्या फ़ायदा क्योंकि चमकी बुख़ार से जिन परिवारों ने अपने बच्चे खोए हैं, उनमें से 75 प्रतिशत ग़रीबी रेखा से नीचे के हैं. इनमें से अधिकतर पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग से आते हैं जिनके पास पैसा और शिक्षा दोनों का अभाव है. ऐसे में किसी केंद्रीय योजना को लेकर उनसे जागरूक होने की उम्मीद करना उचित नहीं है. जानकारों के मुताबिक ऐसे ज्यादातर लोग परिवार के किसी सदस्य के बीमार होने पर उसे सीधे सरकारी अस्पताल ही ले जाएंगे. ऐसे में आयुष्मान योजना के दायरे में निजी अस्पतालों के होने पर भी सरकारी अस्पतालों की ज़िम्मेदारी और उनकी बदहाली की अनदेखी नहीं की जा सकती. उधर, कुछ लोग मानते हैं कि इस मामले में केंद्र सरकार की आलोचना भी होनी चाहिए क्योंकि यह उसकी भी कमी है कि जिन लोगों के लिए उसने योजना चलाई, उन्हीं को इसके बारे नहीं पता.

सिर्फ़ पानी और पर्याप्त खाना मिल जाता तो बच्चे इतनी संख्या में नहीं मरते

चमकी से हुई मौतों के सिलसिले में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने कुछ दिन पहले एक बयान दिया है. उसके एक दल ने बिहार में इस बीमारी से होने वाली मौतों में ‘लीची ’ खाने को मुख्य वजह नहीं मानते हुए कहा है कि इस बीमारी से नवजात भी प्रभावित हुए हैं. चिकित्सा विशेषज्ञों के इस दल की मानें तो चमकी से हुई मौतों में कुपोषण के अलावा मौजूदा गर्मी और उमस का पर्याप्त योगदान है. उसका कहना है कि बीमारी से ग्रस्त बच्चों में पानी और उनके ख़ून में चीनी की अत्यधिक कमी पाई गई है. भोजन उन्हें पहले से उचित रूप से नहीं मिल रहा था. ऊपर से इस साल बारिश नहीं हुई, जिससे यह बीमारी त्रासदी में तब्दील हो गई. विशेषज्ञों के मुताबिक इसलिए कुपोषण से ग्रस्त कई बच्चे यह बीमारी नहीं झेल पाए और उनकी मौत हो गई.

ये तथ्य बताते हैं कि अगर बिहार में पानी और अन्न जैसी बुनियादी ज़रूरतों का अभाव नहीं होता तो चमकी से इतने बच्चों की मौत नहीं होती. आईएमए के चिकित्सा विशेषज्ञों ने कहा है कि भले ही चमकी से जुड़ी जानकारी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है, लेकिन गुनगुने पानी से स्पंज करने, उचित मात्रा में पानी पीने और पर्याप्त भोजन लेने से इस बीमारी के मरीज़ों (बच्चों) को फ़ायदा मिल सकता है. लेकिन यह काम कैसे होगा जब समाज का एक बहुत बड़ा तबक़ा जल संकट से त्रस्त होते हुए भी बेफ़िक्र है और (बिहार) सरकार बीमारी से बचाने के लिए ग़रीबों को अन्न और इलाज तक मुहैया कराने में असमर्थ है. वह तो निजी अस्पतालों का उद्घाटन करने और उन्हें सरकारी अस्पताल से बेहतर बताने में लगी हुई है.