सरकारी क्षेत्र की दूरंसचार कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने अपना परिचालन बरकरार रखने और कर्मचारियों के जून महीने के वेतन के भुगतान के लिए सरकार से मदद मांगी है. खबरों के मुताबिक इस संबंध में बीएसएनएल ने सरकार को एक चिट्ठी भी लिखी है. साथ ही कहा है कि ऐसा नहीं होने से उसके अस्तित्व पर मंडरा रहा संकट और गहरा सकता है. दूसरी तरफ सरकार की तरफ से इस मुद्दे पर फिलहाल कोई फैसला नहीं किया गया है.

मौजूदा समय में बीएसएनएल पर 13 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है. इसके अलावा बीते साल ही इसे आठ हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान भी उठाया पड़ा था. हालांकि अतीत पर नजर डालें तो उस वक्त बीएसएनएल की स्थिति आज के जैसी बदहाल न थी. इसके प्रदर्शन को देखते हुए इसे ‘मिनी रत्न’ का दर्जा भी दिया गया था. लेकिन साल 2016 में निजी क्षेत्र की रिलायंस जियो के दूरसंचार क्षेत्र में उतरने के बाद ‘सस्ते डाटा और टैरिफ प्लान’ का युद्ध छिड़ गया. जियो के बाजार में आने के बाद पहले मौजूद इस सेक्टर की दूसरी कंपनियों की तरह बीएसएनएल को भी राजस्व के रूप में भारी नुकसान उठाना पड़ा.

बीएसएनएल की बदहाली के पीछे हालांकि सिर्फ यही एक कारण नहीं बल्कि सरकारी नीतियां भी काफी हद तक जिम्मेदार रही हैं. आज जब देश में ‘5जी’ नेटवर्क की तैयारी हो रही है तो उस दौर में बीएसएनल ‘4जी’ आवंटन के लिए ही संघर्ष कर रहा है. इसके अलावा बीते कुछ समय के दौरान बीएसएनएल अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने में भी कुछ खास काम नहीं कर सका. वहीं मौजूदा संकट से उबरने के लिए बीते दिनों इसने सरकार को अपनी कुछ संपत्तियों को बेचने का प्रस्ताव भी दिया है. इसके साथ ही वित्तीय संकट के मद्देनजर कंपनी ने अपने पूंजी खर्च को भी रोक दिया है.

उधर करीब तीन महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बीएसएनएल की स्थिति का जायजा लिया था. तब उन्होंने इस कंपनी के चेयरमैन से मुलाकात की थी. हालांकि इसके बाद भी यह सवाल उठ रहा है कि वित्तीय संकट से जूझती यह कंपनी क्या अपना अस्तित्व बचा पाने में कामयाब हो पाएगी? इसका जवाब तो फिलहाल किसी के पास नहीं. फिर भी इस दौरान ऐसी खबरें जरूर आई हैं कि सरकार बीएसएनएल को संकट से उबारने के लिए नए प्रस्तावों पर विचार कर रही है.