अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोंपियो मंगलवार देर रात भारत पहुंचे. बुधवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की. अमेरिकी विदेश मंत्री के इस दौरे को लेकर कुछ बातें काफी गौर करने वाली हैं. पहली, यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब दो दिन बाद ही नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की जी-20 शिखर सम्मेलन में बैठक प्रस्तावित है. दूसरी, माइक पोंपियो का यह भारत दौरा तीन दिन का है, फिर भी पहले से कोई एजेंडा तय नहीं है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पोंपियो और एस जयशंकर के बीच बातचीत का कोई पूर्व निर्धारित एजेंडा नहीं है. बातचीत की मेज पर ही दोनों पक्ष मुद्दों और उनके समाधान पर आगे बढ़ेंगे.

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जी20 की बैठक से तुरंत पहले हो रही माइक पोंपियो की इस यात्रा का आखिर मकसद क्या है. कूटनीति के जानकार इस यात्रा की कई वजहें बताते हैं. उनके मुताबिक पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के बीच बहुत कुछ ऐसा देखने को मिला है जिससे दोनों देशों के आपसी संबंधों में कुछ तनाव पैदा हुआ है.

तनाव का पहला मुद्दा बीते साल भारत और रूस के बीच एस- 400 मिसाइल रक्षा प्रणाली को लेकर हुई डील है. एस-400 रूस का अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम है जिसमें दुश्मन की मिसाइल या विमान को 400 किलोमीटर दूरी पर ही नष्ट किया जा सकता है. 40 हजार करोड़ की इस डील पर अमेरिका को शुरू से ही गहरी आपत्ति है. अमेरिकी संसद ने दुनिया भर में एस- 400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की खरीद के समझौते रोकने के लिए प्रतिबंध कानून भी पास किया है. अमेरिका ने भारत पर भी प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी है. वहीं, भारत लगातार अमेरिका से इस मामले पर बातचीत कर रहा है. उसने अमेरिका से यह भी कहा है कि वह किसी भी हाल में अब यह डील रद्द नहीं करेगा. विदेश मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो माइक पोंपियो से बातचीत में सबसे बड़ा मुद्दा यही है.

इसके अलावा पिछले कुछ महीनों के दौरान डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के चलते भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध भी पूरी तरह से पटरी पर नहीं हैं. भारतीय स्टील और एल्युमिनियम पर शुल्क लगाने के बाद हाल में ही अमेरिका ने भारत को अपनी तरजीही व्यापार व्यवस्था यानी जीएसपी से भी बाहर कर दिया. इस व्यवस्था के तहत भारत को अमेरिका में 2,000 उत्पादों को बिना किसी शुल्क के निर्यात करने की छूट मिली थी. साल 2017 में इस व्यवस्था के चलते भारत को 5.7 अरब डॉलर के उत्पादों पर शुल्क में छूट मिली थी, और वह अमेरिका की इस विशेष नीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बना था. अमेरिका के इस फैसले के बाद भारत ने भी कड़ा रुख दिखाते हुए उसके 28 उत्पादों पर आयात शुल्क कई गुना तक बढ़ा दिया जिस पर अमेरिका ने नाराजगी जताई थी.

भारत और अमेरिका के बीच इस समय एक बड़ा मुद्दा ईरान पर लगे प्रतिबंधों का भी है. अमेरिका ने जब ईरान से तेल खरीदने पर प्रतिबंध लगाए थे तो उसने भारत को आश्वस्त किया था कि वह उसकी तेल की जरूरत को हर हाल में पूरा करेगा. इसके लिए उसने कई तेल उत्पादक देशों पर दबाव भी बनाया था. लेकिन हाल ही में मध्यपूर्व में तेलवाहक जहाजों के प्रमुख रास्ते हार्मुज में कई तेल टैंकरों पर हुए हमलों के बाद न केवल तेल की कीमतों में इजाफा हुआ है, बल्कि दुनिया भर में तेल की सप्लाई भी कम हुई है. बताया जाता है कि भारत इस मुद्दे पर अमेरिका से पूर्ण समाधान चाहता है.

विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि इस समय अमेरिका और भारत के बीच इतने ज्यादा मुद्दे हैं कि उनके चलते अमेरिकी विदेश मंत्री की यात्रा का कोई एजेंडा सेट नहीं है. भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के बयान से भी कुछ ऐसा ही मतलब निकलता है. माइक पोंपियो के साथ बैठक से पहले एस जयशंकर ने कहा, ‘भारत एक सकारात्मक रुख के साथ बातचीत की मेज पर जाएगा ताकि आपसी सहमति के आधार पर मुद्दे सुलझाए जा सकें.’

इस मामले में जानकार एक और बात भी बताते हैं. उनके मुताबिक इस महीने की शुरुआत में चीन से एक ऐसी खबर आयी थी जिसने अमेरिका को बेचैन कर दिया है और इसलिए भी अब वह जी-20 की बैठक से पहले ही भारत के साथ कई मुद्दों पर सहमति बनाना चाहता है. दरअसल, चीन ने पिछले दिनों कहा था कि भारत, रूस और चीन तीनों अमेरिका की कारोबारी तानाशाही को खत्म करने की दिशा में एक साझा रणनीति तैयार कर रहे हैं. इस रणनीति पर पहली बैठक इस महीने की शुरुआत में किर्गिस्तान में हो चुकी है. दूसरी जी-20 शिखर सम्मलेन के दौरान होगी.

इसकी जानकारी देते हए चीन के सहायक विदेश मंत्री झांग जुन ने का कहना था, ‘भारत, चीन और रूस के राष्ट्र प्रमुखों के बीच इसी तरह की पहली बैठक किर्गिस्तान के बिश्केक शहर में हुई थी. वहां शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन से इतर तीनों नेताओं ने अमेरिका की कारोबारी तानाशाही से निपटने के मसले पर शुरूआती विचार-विमर्श किया था. अब जापान में जी-20 शिखर सम्मलेन के दौरान इस तरह की दूसरी त्रिपक्षीय बैठक अहम साबित होने वाली है. इसमें तीनों देश मिलकर संयुक्त तंत्र (कारोबारी लिहाज़ से) विकसित करने पर सहमत हो सकते हैं.’