प्रिय ईश्वर,

आज जमाने भर बाद किसी को पत्र लिखने बैठा हूं. तुम तो जानते ही हो कि अर्सा हुआ खतो-किताबत का चलन तकरीबन खतम हो गया. अब संवाद के दूसरे त्वरित माध्यम मौजूद हैं. मगर चिट्ठी लिखने का अपना अलग ही आनन्द है. इस आनन्द को आज सालों बाद महसूस कर रहा हूं और इसके लिए तुम्हारा आभारी हूं ईश्वर.

जैसा कि पत्र लेखन का नियम सा है कि जिसे पत्र लिखा जाता है उसकी खैरियत दरयाफ्त की जाती है. पर मैं तुम्हारा हाल पूछकर अपनी बेवकूफी का प्रमाण पेश नहीं करूंगा. क्योंकि प्यारे, तुम अच्छे के सिवा और हो ही क्या सकते हो. मैं मान ही नहीं सकता कि तुम्हारा भी मिजाज नरम-गरम, तोला-माशा हो सकता है. पूरी कायनात को शफा बख्शने वाले से ‘तू कैसा है’ पूछना निरी बेवकूफी ही होगी. रही बात मेरी कि मैं कैसा हूं, तो भला यह बताने में क्यों वक्त जाया करना ? तुमसे बेहतर कौन जानता है कि मैं कैसा था, कैसा हूं और कल को क्या हो जाऊंगा?

तो प्यारे ईश्वर, यह रहा दोनों का हाल. यार तुमसे कई बातें करनी हैं. तुम्हारे और तुम्हारी बनाई हुई दुनिया के बारे में. मेरी कुछ जिज्ञासाएं हैं, कुछ सवाल हैं. कई ऐसी बातें हैं जिन्हें मैं समझ नहीं पाता पर समझना चाहता हूं. मैं अगर गलत हूं तो खुद को दुरुस्त करना चाहता हूं. शायद यह सब तुम्हें पसंद न आए, क्योंकि तुम्हारे कान सवालों के नहीं प्रार्थनाओं और याचना के आदी हैं. तुम्हें यह अच्छा नहीं लगेगा. तुम असहज महसूस करोगे. पर उससे क्या होना है. देखो, तुम्हें प्रिय कहा है तो पूछूंगा जरूर. प्यार से, मनुहार से, जिद से और अधिकार से भी. तुम बच नहीं सकते प्यारे, भाग नहीं सकते. मैं हूं कि पूछे बगैर रह नहीं सकता क्योंकि तुमने मुझे ऐसा ही बनाया है. अपनी ही रचना जब रचनाकार के लिए परेशानी का सबब बन जाए तो मैं मानता हूं कि या तो रचना में कुछ कमी रह गई या फिर रचयिता की कलात्मकता अपने चरम पर है. और तुम्हारी इस रचना को अशरफ-उल-मखलुक या सर्वश्रेष्ठ रचना यूं ही तो नहीं कहा जाता. तुम घबराओ मत प्यारे. हम बातें बड़े दोस्ताना अंदाज में करेंगे. जिस सवाल का जवाब न देना चाहो न देना. वीटो ऑन द क्वेश्चन का विकल्प भी खुला है. जबरिया जवाब नहीं उगलवाए जाएंगे. अरे यार तुम मेरे पहलू में बैठे हो दिलबर जानी, थाने में नहीं.

सबसे पहले तुम्हारा इस बात के लिए आभार व्यक्त करना चाहता हूं कि तुमने यह दुनिया इतनी विविध-रंगी बनाई वर्ना यार बड़ी बोरियत हो जाती. तुमने इतने रंग, इतनी सुगंधें बनाई, इतने फूल, कैसे-कैसे पेड़-पौधे बनाए. विविध रंगों, आकारों और बोलियां वाले पशु-पक्षी बनाए, दिन-रात, अंधेरा-उजाला, नीला आकाश, उर्वरा धरती, मीठे पानी के झरने, चांद-सूरज और सितारे बनाए … कहां तक गिनूं, कितना अनंत है तेरा यह जगत कि मैं नाचीज तेरी हर रचना को जान भी नहीं सकता. सब अच्छा है, सुंदर है, कल्याणकारी है, जीवनदायी है. शुक्रिया सद शुक्रिया पूरी मानवता की ओर से.

मगर प्यारे, तूने मेरे कंधों में जो यह सर रखा और उसमें एक अदद जो भेजा डाला न, वह अकसर शोर करता है. जहां कहीं विसंगति देखता है वहां सवाल पूछता है. बड़े ही सीधे, मासूम-से सवाल. काफी कोशिशें की पर मैं उन सवालों के जवाब नहीं पा सका. और यह मेरी नहीं, तेरी असफलता और अयोग्यता मानी जाएगी. क्योंकि मैं तेरी ही तो रचना हूं. माल जिस कम्पनी का होगा शिकायत भी उसी से की जाएगी न!

तू सर्वशक्तिमान है, सर्वव्यापी है सर्वद्रष्टा है, संपूर्ण जगत का रचियता और पालनहार है. यहां तेरे चाहे बगैर न तो पत्ता उग सकता है , न हिल सकता है. झड़ने की तो सोच भी नहीं सकता. तेरी इन खूबियों के आगे अनन्त काल तक सजदे में पड़ा रह सकता हूं. बशर्ते कि ऐसा कुछ होता हुआ तो दिखाई दे. कई बार दिमाग तेरी तुलना किसी राजनेता से करने लगता है. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं. क्योंकि तूने कभी कोई आश्वासन नहीं दिया. तेरा कोई मैनीफैस्टो भी नहीं. न दिखाई देना या विपरीत नजर आना यह मेरी आंख का भी दोष हो सकता है. पर बात फिर वहीं आकर ठहरी कि यह आंख बनाई किसने. मैनीफैक्चर्ड बाई ईश्वर. तुम्हें पत्र लिखना क्या तेरी रजा के बिना मुमकिन है?

मैंने विविधता की बात की थी. यह बड़ी अच्छी चीज है. मैं इसका घनघोर समर्थक हूं. पर यह सार्थक होनी चाहिए, सुंदर होनी चाहिए. ऐसी नहीं जैसी तेरी दुनिया में प्रकृति के अलावा दूसरी चीजों में बड़े ही क्रूर तरीके से दिखती है. इसे पोषित नहीं किया जा सकता. मसलन तूने अपनी संतानों का भाग्य इतना विविधापूर्ण क्यों लिखा कि एक आदमी दिनभर तपते सूरज तले बैठकर पत्थर तोड़ता है और दूसरा एसी दफतर में बैठ फाइलों में चिड़िया बिठाने का काम करता है. पहले वाला शाम मेहनताना कम और दुत्कार ज्यादा पाता है और दूसरा राजाओं जैसा जिंदगी जीता है ? अपनी संतानों को इतने भेद-भावपूर्ण तरीके से मनुष्य नहीं पालता, तू तो ईश्वर है भाई. क्यों कुछ लोग कत्ल होने और कत्ल करने के लिए पैदा होते हैं ? तूने क्यों कुछ लोगों के हाथों अपनी ही संतानों पर एटम बम गिरवा दिया? तेरी मर्जी और प्रेरणा के बिना तो यहां कुछ होता ही नहीं. सवाल तो तुझी से ही पूछा जाएगा. तेरी इस दुनिया में इतना शोषण, अन्याय, भुखमरी और नाबराबरी क्यों है. तेरी एक संतान खुलेआम कत्ल कर दी जाती है और दूसरी रसूखदार औलाद आराम से बरी हो जाती है. तेरे कान में जूं नहीं रेंगती.

तेरी सगी सन्तानें जाति-धर्म, प्रान्त-भाषा, रंग-रूप और न जाने किन-किन बातों पर लड़ती हैं, एक-दूसरे से नफरत करती हैं, सीमाओं के नाम पर युद्व लड़ती हैं और हजारों की तादात में कट मरती हैं. तू ऐसा होने ही क्यों देता है? क्यों तूने ऐसा होने दिया कि हमने देश के नाम से अपने-अपने दड़बे बना लिए. तूने हमें विश्वनागरिक होने से क्यों रोक लिया? ‘सबै भूमि गोपाल की’ , ‘साहिर’ साहब लिख गए कि ‘कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती, हमने कहीं भारत, कहीं ईरान बनाया’. किसकी मर्जी से बनाया. सब तेरा ही किया है ईश्वर!

कुछ लोग आजीवन इतने दुखी क्यों रहते हैं कि उन्हें सुख के अस्त्तित्व तक का पता नहीं होता. और कुछ आमरण इतने सुखी कि उनके जीवन में सिवाय ऐशो-आराम के कुछ होता ही नहीं. ऐसा क्यों, पूछने पर तेरे अनगिनत अवैतनिक प्रवक्ता जिनमें से कुछ आंखें तरेरते हैं, समझाते हैं कि यह सब कर्मों का फल है. अच्छी बात है भाई, वाजिब बात है. काम के हिसाब से शाबाशी या डांट तो मिलती ही है. मिलनी भी चाहिए. पहली नजर में यह हिसाब बड़ा ही न्यायसंगत लगता है. बशर्ते कि हम आगे सोचना और सवाल करना बंद कर दें. और जो सोचेगा वो तेरा गिरेबान जरूर पकड़ेगा. तू सर्वव्यापी है और सर्वदृष्टा भी. संसार के चप्पे-चप्पे पर तेरे कैमरे लगे हैं. दिन हो कि रात कोई बात तुझसे छिपी नहीं है. अब जरा बता कि तू कुछ लोगों से बुरे और कुछों से नेक काम करवाता ही क्यों है? बुरा करने वाले को रोक क्यों नहीं लेता. पहले तो तू उसे ऐसा करने की प्रेरणा ही क्यों देता है? तेरे ही इस संसार में क्रूर से क्रूर आदमी भी घुटनों के बल चलते हुए बच्चे को चूल्हे की तरफ जाता देख उसे रोक लेता है. ऐसा कौन करता है कि बच्चे को आग की तरफ जाने दे और जब वह अपना हाथ झुलसा ले तो कर्मफल के रूप में उसे दो तमाचे मारे? ऐसा कोई नहीं करता सिवाय तेरे. तेरे नाम के साथ हमेशा दया और करुणा ही सुना. क्रूरता का जिक्र तो कभी नहीं आता. फिर तू ऐसा क्यों करता है भाई?

कुल मिलाकर मजा नहीं आया प्यारे तेरे इस निजाम में. तू अगर सचमुच है और ये दुनिया तेरे इख्तियार में है तो इसे बदल यार. कुछ ठीक कर. तू सर्वशक्तिमान है. फिलहाल तेरी सत्ता निरापद है. मगर भाई शाम को जब हाथों में जाम लेकर इत्मीनान से बैठेगा तो मेरी बातों को एक बार सोचना जरूर.

तेरी अनगिनत संतानें आखिर कब तक यूं मर-मर के जिएंगी? सच तो यह है कि वो जीने के नाम पर रेंगती हैं. बेहतर तो यह होगा कि तू उन्हें पैदा ही करना बंद कर दे. यार! उनको भी थोड़ा फूल, रंग और खुशबू दे दे. पेट-भर अनाज, तन-भर कपड़ा, थोड़ा खुशी बख्श दे. और थोड़ी सी गरिमा दे. इसमें कौन सी चीज नावाजिब या हक से ज्यादा है? कोई पिता अपनी संतान को ऐसे कैसे भूल सकता है? शिकायतें तुझसे अनगिनत हैं, कहां तक गिनवाऊं. पत्र को और ज्यादा नहीं खींचना चाहता क्योंकि तुझे भी दुनिया-जहान संभालना है. थोड़ा कहना बहुत समझना और समझदार को इशारा काफी, सुना ही होगा. तो प्यारे जो कहना था उसमें से थोड़ा कह चुका. अब गेंद तेरे पाले में है. तुझे अच्छा लगे तो अच्छी बात, बुरा लगे तो मेरी बला से. अपनी तरह नहीं एक दर्दमन्द इंसान की तरह मेरी बातों पर गौर करना कभी. खुश रहो प्यारे, आबाद रहो. हम कोशिश करते रहेंगे कि अपनी खुशी का सामान खुद पैदा करें.

‘डाकिया करे’ कि खत तुझ तक पहुंचे.

तेरा एक जानने वाला

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