हाल ही में खबर आई थी कि एयर इंडिया के रीजनल डॉयरेक्टर और पायलट रोहित भसीन को शॉपलिफ्टिंग करने के चलते निलंबित कर दिया गया है. खबरों के मुताबिक भसीन ने सिडनी एयरपोर्ट पर मौजूद ड्यूटी फ्री शॉप से एक वॉलेट उठा लिया था. बाद में ऑस्ट्रेलियन रीजनल डॉयरेक्टर की शिकायत पर उन्हें निलंबित करने के साथ उनके किसी भी एयर इंडिया परिसर में घुसने पर पाबंदी लगा दी गई. यह किसी हाई प्रोफाइल व्यक्ति द्वारा की गई बेजा हरकत की कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन चौंकाने और हर भारतीय को लजाने वाली जरूर है.

ऐसे ही एक और वाकये को याद करें तो साल 2018 में लंदन की एक घटना का जिक्र किया जा सकता है. लंदन के इस हाई प्रोफाइल इवेंट में ममता बनर्जी को भी आमंत्रित किया गया था. इस आयोजन में हिस्सा लेने उनके साथ पत्रकारों का एक दल भी गया था. ममता बनर्जी के लिए आयोजित किए गए डिनर में इन पत्रकारों में से कुछ ने वहां मौजूद कीमती कटलरी (छुरी, चम्मच, कांटे) को जेबों और पर्सों में भर लिया. सीसीटीवी निगरानी में पकड़े जाने के बाद जब होटल स्टाफ ने इन्हें कटलरी वापस करने के लिए कहा तो भरपूर शर्मिंदगी उठाते हुए पत्रकारों ने यह किया भी. लाजिम-सी बात है कि मुख्यमंत्री के साथ जाने वाले ये पत्रकार अपने-अपने संस्थानों के कुछ चुनिंदा और वरिष्ठ पत्रकारों में से ही रहे होंगे. जिम्मेदार लोगों की गलत हरकतों पर नजर रखने वाले पत्रकारों की यह हरकत अपने आप में बड़ी विडंबना थी और जाहिर है कि इसने भी भारतीयों की छवि को बुरी तरह खराब किया था.

कुछ समय पहले एक अमेरिकी संस्था द्वारा ईमानदारी पर किया गया एक अध्ययन सामने आया है जिसके संदर्भ में इन दोनों किस्सों को रखकर भारतीयों की स्थिति समझी जा सकती है. अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ एडवांस्ड साइंसेज द्वारा किए गए इस अध्ययन में 40 देश शामिल किए गए थे जिनमें भारत 30वें स्थान पर है. इस फेहरिश्त में अव्वल नंबर पर स्विट्ज़रलैंड और आखिरी स्थान पर चीन है. भारत से आगे रहने वाले देशों में कई यूरोपीय देशों सहित अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और थाइलैंड हैं, वहीं पीछे रहने वालों में मलेशिया, पेरू, मोरक्को, यूएई जैसे देश आते हैं.

इस अध्ययन के दौरान ईमानदारी परखने के लिए दुनियाभर के करीब 355 शहरों में कुछ प्रयोग किए गए थे. प्रयोग के दौरान, करीब 17 हजार बटुए (वॉलेट) जानबूझकर गुमाए गए. यानी प्रयोगकर्ताओं ने होटल, बैंक, सरकारी ऑफिस जैसी जगहों के काउंटर या रिसेप्शन पर जाकर ये बटुए दिए और कहा कि यह उन्हें पड़ा हुआ मिला है जिसका भी हो, उस तक पहुंचा दिया जाए. इन बटुओं में से कुछ खाली बटुए थे और कुछ में थोड़े पैसे, कुछ में ज्यादा पैसे और कुछ में पैसे और चाबियां रखी गई थीं. इसके अलावा कुछ बटुओं में सौ डॉलर (तकरीबन सात हजार रुपए) जैसी रकम भी रखी गई थी. पहचान के लिए हर बटुए में विजिटिंग कार्ड रखे गए थे जिन पर यूनिक ईमेल आईडी दिया गया था. इससे बटुआ पाने वाले को पता चल सकता था कि इसे कहां वापस करना है.

इस प्रयोग के नतीजे बहुत चौंकाने वाले रहे. वे बटुए जो खाली थे उन्हें वापस किए जाने की दर, पैसों वाले बटुओं की तुलना में कहीं कम रही. मैक्सिको और पेरू को छोड़ दें तो बाकी 38 देशों में लोगों ने वे बटुए ज्यादा लौटाए जिनमें पैसे और चाबियां थीं. स्विट्जरलैंड में जहां खाली बटुए 75 फीसदी लौटाए गए वहीं पैसे वाले बटुओं को लौटाने की दर 80 फीसदी रही. इसी तरह सबसे निचले स्तर पर आने वाले चीन में भी खाली बटुए आठ फीसदी और पैसे वाले 22 फीसदी तक लौटा दिए गए. भारत के मामले में 21 फीसदी खाली तो करीब 45 फीसदी भरे बटुए वापस लौटे.

बटुआ लौटाने वालों से जब इसकी वजह पूछी गई तो पता चला कि खाली बटुआ न लौटाने पर लोगों में अपराध भाव कम आता है जबकि पैसों वाले बटुए रख लेने पर उन्हें लग रहा था कि उन्होंने चोरी की है. इसके अलावा पैसों के साथ चाबी पाने वाले लोगों का कहना था कि उन्हें लग रहा था कि जिस व्यक्ति का बटुआ गुमा है, वह पैसों के लिए न सही लेकिन चाबी के लिए तो परेशान हो ही रहा होगा. ऐसे में उन्होंने बटुए जल्द से जल्द लौटाने की कोशिश की. यह अध्ययन बताता है कि लोग अच्छे काम इसलिए तो करते ही हैं कि वे दूसरों के बारे में सोचते हैं. लेकिन इस वजह से ज्यादा करते हैं कि वे अपने बारे में सोचते हैं और उन्हें खुद को भी जवाब देना होता है.

अब यहां पर सवाल किया जा सकता है कि ईमानदारी कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे किसी भी प्रयोग या अध्ययन के जरिए नापा जा सके. साथ ही कई बार लोग अपनी परिस्थितियों के चलते छोटी-छोटी चीजों के लिए भी बेईमानी कर जाते हैं तो वहीं कई बार बहुत बड़े लालच में भी नहीं फंसते. ऐसे में इस तथ्य पर गौर करना सही रहेगा कि इस प्रयोग के दौरान सैंपल साइज बहुत बड़ा रखा गया था. करीब सत्रह हजार बटुओं के साथ किए गए इस प्रयोग में लगभग आधे से अधिक बटुओं का लौट आना बताता है कि इसमें कई तरह की परिस्थितियों और मनोस्थितियों के लोग शामिल रहे होंगे जिन्होंने इन्हें वापस किया है. इस तरह प्रयोग में गलती की गुंजाइश कम ही रह जाती है और यह भरोसा किया जा सकता है कि यह अध्ययन मानवीय व्यवहार के बारे में करीब-करीब ठीक निष्कर्ष पर पहुंचा है.

इस अध्ययन के दौरान अगर भारत के प्रदर्शन की बात करें, और ऊपर बताए गए दो उदाहरणों को ध्यान रखें तो उसकी स्थिति वाजिब ही लगती है. साथ ही इस बात पर खुश हुआ जा सकता है कि दुनिया के तमाम अन्य देशों की तरह ही भारत में भी पैसे वाले बटुए ज्यादा लौटाए गए. यह आंकड़ा 46 फीसदी होने का मतलब है कि लगभग हर दो में से एक बटुआ वापस कर दिया गया. दिलचस्प ये है कि यह अध्ययन करने से पहले एक सर्वे कर लोगों से पूछा गया था कि अगर ऐसा कोई प्रयोग किया जाए तो किस तरह के बटुए ज्यादा वापस आएंगे. सर्वे के दौरान ज्यादातर लोगों ने इस बात पर यकीन दिखाया था कि खाली बटुओं के लौटने की संख्या ज्यादा होगी. नतीजों का इसके ठीक उलट आना बताता है कि दुनिया उतनी भी बुरी नहीं है जितनी हम समझते हैं.