बिहार में सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) अरुणाचल प्रदेश में हुए हालिया विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के बाद दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला जेडीयू यह चुनाव भाजपा के साथ मिलकर नहीं लड़ा था जबकि बिहार में वह भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहा है. इसके बावजूद उसे पूर्वोत्तर भारत के इस राज्य में इतनी बड़ी सफलता मिली. अरुणाचल प्रदेश में 60 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा को 41 सीटें मिलीं. वहीं प्रदेश के लिए अनजान जेडीयू सात विधायकों के साथ विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गया. लंबे समय तक अरुणाचल प्रदेश की सत्ता में रहने वाली कांग्रेस पांच सीटों पर निपट गई.

जेडीयू को अरुणाचल प्रदेश में तकरीबन दस फीसदी वोट मिले हैं. इन वोटों की वजह से सात सीटें जीतने में कामयाब रहे जेडीयू को चुनाव आयोग ने अरुणाचल प्रदेश में राज्य पार्टी का दर्जा दे दिया है. किसी राज्य में हुए विधानसभा चुनावों में जब किसी पार्टी को छह फीसदी वोट मिलें और वह दो सीटें जीत जाए तो उसे वहां राज्य पार्टी का दर्जा दे दिया जाता है. बिहार के बाद अरुणाचल प्रदेश पहला ऐसा राज्य है जहां जेडीयू को राज्य पार्टी का दर्जा मिल गया है. पार्टी को इसका लाभ यह मिलेगा कि उसका चुनाव चिन्ह तीर अब अरुणाचल प्रदेश में किसी और को नहीं दिया जाएगा. इसका इस्तेमाल सिर्फ जेडीयू के उम्मीदवार ही कर पाएंगे.

ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि अरुणाचल प्रदेश के लिए हाल तक बिलकुल अनजान जेडीयू को इस राज्य में इतनी बड़ी सफलता मिली. इस बारे में जेडीयू के एक नेता बताते हैं, ‘हमने तकरीबन छह-आठ महीने पहले से विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दी थी. अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पार्टी पहली बार उतर रही थी. इसलिए पार्टी ने अपने कुछ प्रमुख नेताओं को वहां लगाया. स्थानीय स्तर पर जो प्रमुख चेहरे थे, उन लोगों को पार्टी ने अपने साथ करना शुरू कर दिया.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘इसके बाद जब जमीनी स्थिति का जायजा लिया गया तो पता चला कि प्रदेश की सभी 60 सीटों पर चुनाव लड़ना बेहद जोखिम वाला काम है. इससे हमारे लिए मुश्किल हो जाती. फिर हमने 15 ऐसी सीटों की पहचान की जहां हमारे पास मजबूत उम्मीदवार थे और इन 15 सीटों को ध्यान में रखकर हमने रणनीति तैयार की.’

जेडीयू अरुणाचल प्रदेश की जिन 15 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से सात सीटों पर उसे जीत हासिल हुई. इसमें भी हैरान करने वाली बात यह है कि इन सभी सीटों पर उसने सत्ताधारी भाजपा के उम्मीदवारों को हराया. चार सीटों पर जेडीयू के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे और तीन सीटों पर तीसरे.

​जेडीयू के जिस नेता का जिक्र पहले किया गया है, वे अरुणाचल प्रदेश में पार्टी की रणनीति के बारे में बताते हैं, ‘हम नीतीश कुमार की छवि को मुद्दा बना रहे थे. हमने सामाजिक न्याय की बात की. हमने सांप्रदायिकता के विरोध के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता की बात की. हमने बिहार में जिस तरह का विकास किया है, उसकी बात की. इन मुद्दों के आधार पर हमने लोगों को एकजुट करने की कोशिश की. लेकिन ये मुद्दे काफी नहीं थे. हमें कुछ वैसे स्थानीय मुद्दों की जरूरत थी, जिनके आधार पर स्थानीय लोगों को हम अपने पक्ष में लाकर जीत सुनिश्चित कर सकें.’

वे आगे कहते हैं, ‘इसके लिए हमने उन मुद्दों को चुना जिससे स्थानीय लोग प्रभावित हो रहे थे. नागरिकता कानून में संशोधन का विरोध सबसे पहले जेडीयू ने राष्ट्रीय स्तर पर किया था. इस कानून में प्रस्तावित संशोधन की वजह से अरुणाचल प्रदेश के लोगों में चिंता का एक माहौल था. हमने इस मसले को प्रदेश में बहुत अच्छे से उठाया. लोगों को लगा कि हम उनकी चिंताओं के प्रति संवेदनशील हैं. इससे हमारे पक्ष में समर्थन बढ़ा.’

लेकिन इन सबके बावजूद जेडीयू के लिए अरुणाचल प्रदेश में जीतने लायक उम्मीदवार तलाशना बेहद मुश्किल काम था. क्योंकि ​अगर किसी पार्टी का कोई सांगठनिक ढांचा किसी प्रदेश में नहीं हो तो उस प्रदेश में उसके लिए ठीक-ठाक उम्मीदवार तलाश पाना बेहद मुश्किल होता है. इस बारे में जेडीयू के ये नेता बताते हैं, ‘निश्चित तौर पर यह बहुत बड़ी चुनौती थी. क्योंकि विधानसभा चुनावों में अंतत: उम्मीदवारों की छवि की बड़ी भूमिका होती है. इसका समाधान हमने पहले तो ये तय करके किया कि हमें सिर्फ 15 सीटों पर ही चुनाव लड़ना है. इसका मतलब ये हुआ कि हम अपनी इस मुश्किल को 60 सीटों से कम करके 15 सीटों पर ले जाए. इसके बाद काम थोड़ा आसान हो गया. स्थानीय स्तर पर जो मजबूत चेहरे थे, उन लोगों को हमने पार्टी के साथ जोड़ा. दूसरी पार्टियों के कुछ जीतने लायक उम्मीदवार हमारी पार्टी और हमारे नेता नीतीश कुमार की विचारधारा से प्रभावित होकर जेडीयू में आए. हमने इसमें से योग्य लोगों को टिकट दिया और हमारे 15 में से सात उम्मीदवार चुनाव जीत गए.’

अरुणाचल प्रदेश में मिली सफलता से जेडीयू के अंदर यह बात चल रही है कि पार्टी को कुछ और राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत करते हुए राज्य पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए काम करना चाहिए. इस दिशा में पहली कोशिश झारखंड में होने की संभावना है. झारखंड में इसी साल विधानसभा चुनाव हैं. जेडीयू के अंदर यह बात चल रही है कि झारखंड में भी पार्टी को अकेले चुनाव लड़ना चाहिए.

झारखंड के अलावा जेडीयू हरियाणा, दिल्ली और जम्मू कश्मीर में भी अकेले चुनाव लड़ने की योजना पर काम कर रही है. 2017 में दिल्ली में हुए निगम चुनाव में पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे थे. लेकिन उसे कोई खास सफलता नहीं मिली थी. इसके बावजूद दिल्ली में बिहार के लोगों की अच्छी-खासी संख्या को देखते हुए जेडीयू को यह उम्मीद है कि अगर वह ठीक से विधानसभा चुनावों में उतरी तो दिल्ली विधानसभा में जेडीयू के कुछ विधायक पहुंच सकते हैं. दिल्ली में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं.

पार्टी के कुछ नेताओं को लगता है कि अगर दो और राज्यों में जेडीयू को राज्य पार्टी बनने में सफलता मिलती है तो वह राष्ट्रीय पार्टी बन सकती है. पटना में जून के पहले सप्ताह में जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद यह घोषणा की गई कि जेडीयू 2020 तक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लक्ष्य के साथ काम करेगी. जाहिर है कि जेडीयू के इस उत्साह में अरुणाचल प्रदेश में मिली सफलता की बड़ी भूमिका है.