विष्णु खरे के साथ एक लंबी बातचीत हाल ही में प्रकाशित हुई है. उसमें उन्होंने श्रीकांत वर्मा को इसलिए खारिज किया है कि उन्होंने समझौता कर लिया- उनके पुरखे मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय ही एक लंबे संघर्ष में सच्चे धनुर्धर हैं. इस इस पर फ़ेसबुक पर बहस हो रही है. मैंने एक संक्षिप्त टिप्पणी में कहा कि अगर श्रीकांत वर्मा ने समझौता कर लिया होता तो वे सत्ता की अंततः विफलता प्रगट करनेवाली कविता ‘मगध’ नहीं लिख सकते थे. इस पर एक टिप्पणी आयी कि रघुवीर सहाय ने भी समझौते किये. मैंने उत्तर दिया कि रघुवीर सहाय ने कविता में कभी समझौता नहीं किया.

बहरहाल, यह समझने की ज़रूरत है कि समझौते से इस बहस में मुराद क्या है या होना चाहिये? लेखक साधारण नागरिक होते हैं और जीवन-यापन के दौरान, और सबों की तरह, वे भी तरह-तरह के समझौते करते रहते हैं. परिवार, घर-पड़ोस, नौकरी आदि में समझौते अनिवार्य होते हैं और लेखक भी उनसे बच नहीं पाते. जब हम लेखक के समझौते की बात करते हैं तो मुराद होती है कि क्या किसी लेखक ने राजनीति, धर्म, सत्ता, बाज़ार, विचारधारा आदि से कोई ऐसा समझौता किया जिससे उसका साहित्य, उसका मूल्यबोध भी प्रभावित हुआ. हो सकता है कि उसने किसी कारण या लाभ के लिए ही सही इनमें से किसी से समझौता किया हो लेकिन वह अपने साहित्य को इस समझौते से बचाकर रख पाया हो. अगर ऐसा होता है तो फिर उसके साहित्य से बाहर हुए समझौते अप्रासंगिक हो जाते हैं. यों किसी से जुड़ना ज़रूरी तौर पर समझौता करना नहीं होता.

इस सिलसिले में जिन तीन लेखकों की बात की जा रही है उनको देखा जा सकता है. मुक्तिबोध भयग्रस्त रहते थे, पूजापाठ आदि भी करते होंगे पर उनकी कविता और विचार इनका अतिक्रमण कर लिखे गये हैं और वे अपनी प्रखरता और बेचैनी दोनों में बेहद उजले हैं. रघुवीर सहाय ने आपातकाल का, अज्ञेय और निर्मल वर्मा की तरह, सीधा विरोध नहीं किया था पर उस दौरान बहुत तीख़ी कविताएं लिखी थीं जो आपातकाल समाप्ति के बाद प्रकाशित हुई. ज़ाहिर है कि उनकी उस समय की चुप्पी कायरता नहीं थी और न ही किसी तरह का समझौता उनकी कविता में हुआ. श्रीकांत वर्मा कांग्रेस पार्टी के निकट हुए, उसके महासचिव और राज्यसभा सदस्य बने. पर उन्होंने सत्ता के समर्थन में कुछ साहित्य कभी नहीं लिखा. लेखकों को आपातकाल के समर्थन में जुटाने की कोशिश की होगी, और इस तरह के अन्य साहित्येतर प्रयत्न. पर कविता में उन्होंने आत्मालोचन के भाव से लिखा था, ‘जब सब जयजयकार कर रहे थे/तुम क्या कर रहे थे/मैं भी जयजयकार कर रहा था.’ उनका कविता संग्रह ‘मगध’ तो सत्ता की अन्ततः विफलता और व्यर्थता का काव्य है. चलते-चलते यह कि विष्णु खरे ने कभी कमलनाथ, नरसिंह राव पर तीखी व्यंग्य कविताएं लिखी थीं लेकिन सोनिया गांधी पर बड़ी सकारात्मक कविता. इसे समझौता मानकर खारिज करना अनैतिक और अबौद्धिक दोनों हैं.

अस्तित्व का आशय

सब कुछ होता है, भले धीरे-धीरे. यह ख़याल आया उस शाम जब हममें से कई राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय में प्रभाकर बर्वे की एक बड़ी मरणोत्तर लगभग पुनरवलोकी प्रदर्शनी ‘अस्तित्व’ देखने गये. यह एक ऐसा कलाकार है जो कलाचर्चा और स्मृति से लगभग बाहर चला गया था. जैसल ठकार के सुघर और अध्यवसायी संग्रहण ने, एक तरह से, प्रभाकर बर्वे को पुनर्जीवन दिया है. उन की सौ से अधिक कृतियां प्रदर्शित हैं. प्रदर्शनी पहले मुंबई के राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय में दिखायी जा चुकी है और, उचित ही, बहुप्रशंसित है.

‘कोरा काग़ज’ नाम से एक कलापुस्तक लिखनेवाले बर्वे को स्पेस की असाधारण समझ थी और उस पर पकड़ भी. कला प्रथमतः और अन्ततः स्पेस में घटती है और स्पेस को ही सीमित और विन्यस्त करती है. ऐसा करने में उसे स्पेस और समय दोनों से याने हमारे पारंपरिक युग्म देश और काल से जूझना पड़ता है. कला इस स्पेस को एक लयात्मक वितान में बदलती है या कि उसकी आन्तरिक लय को हमारे सामने स्पष्ट कर देती है. काल को भी कला उसकी सीमाओं से मुक्त कर स्पेस पर छाने देती है. ऐसा लग सकता है कि कला देश को सीमित या ससीम करती है और इसके ठीक उलट काल को असीम कर देती है. कम से कम प्रभाकर बर्वे की कला में यह होता दीख पड़ता है. उनके यहां व्यापक स्पेस और कैनवास पर सीमित स्पेस एक-दूसरे का संस्करण है. उन्होंने कहा भी है कि ‘आन्तरिक स्पेस जो हमारा मन रचता है और बाह्य स्पेस जिसमें हम और हमारी कला समाये होते हैं उनका अन्तस्सम्बन्ध हमें भौंचक कर देता है. कला में हम इस स्पेस को संयुक्त और एकीकृत महसूस करते हैं और हम उससे तदाकार हो जाते हैं और अपने आत्म से मुक्त.’

बर्वे के यहां साधारण जीवन की कई चीजें अपने पारंपरिक या स्वाभाविक समझे जाने वाले प्रसंग या सम्बन्ध से अलग हटकर स्पेस में तैरती सी हैं. स्पेस एक तरह का प्रवाह है जिसमें ये चीजें बिना किसी रूढ़ सन्दर्भ के तैरती सी रहती हैं. यह उत्तरण उन्हें नये आशयों से भर देता है. यह स्थिति आकृतिमूलकता और अमूर्तन दोनों से अलग है. वह उन दोनों को जैसा ज़रूरी हो वैसा बरतती है पर किसी एक में दूसरी को वर्जित या बाहर या दूर कर बंद नहीं होती. बर्वे की कला का, एक ऐसे समय में, जो बेहद सिकुड़ा और बन्द होता समय होता जा रहा है, यह इसरार मानो अचानक दुहराता है कि कला इस सिकोड़ और संकुचन का हिस्सा या समर्थक नहीं हो सकती. उसमें सबके लिए जगह है पर वह किसी के वर्चस्व का मुक़ाम या इजाजत नहीं है.

प्रदर्शनी का एक महत्वपूर्ण और असाधारण हिस्सा बर्वे की 52 डायरियों में से एक संचयन भी ‘रूपविचार’ नाम से है। बर्वे एक विचारशील कलाकार थे और उनकी सृजन-बुद्धि का यह बहुत रोचक साक्ष्य है. ‘प्रकृति की अपनी वर्णमाला के अपने हिज्जे खुद गढ़ो’, ‘उड़ते हुए पोस्टकार्ड’, ‘कछुआ और आइना’ तथा ‘फल और बातचीत’ शीर्षक गतिविधियां दर्शकों में सोये कलाकार को जगाने की कोशिश है.

संग-साथ

रज़ा के देहावसान को अगले महीने जुलाई में तीन वर्ष हो जायेंगे. हम मण्डला में, जहां वे जन्मे थे और जहां उनकी कब्र है, हर वर्ष ‘रज़ा स्मृति’ नाम से एक आयोजन करते हैं जिसमें कला-शिविर, प्रदर्शनी, लोकसंगीत सभाएं, कवितापाठ आदि होती हैं नर्मदा जी के किनारे, जिन्हें रज़ा जीवन भर बहुत आदर के साथ याद करते रहे.

30 जून से हम दिल्ली की श्रीधराणी कलावीथिका में ‘संग-साथ’ नाम से एक प्रदर्शनी आयोजित कर रहे हैं, रज़ा स्मृति में ही. रज़ा का अपने मित्रों के साथ बहुत लगाव था. यह अनोखी पीढ़ी थी जो कुल कुछ बरस तो साथ रही पर जीवन भर किसी न किसी तरह से पत्रों, आपसी सहायता, जब-तब किसी कला प्रदर्शनी में सहयोग,देश-विदेश में जहां-तहां मिलने आदि के माध्यम से उसका एक-दूसरे से सम्पर्क बना रहा. दिलचस्प बात यह रही कि हर कलाकार की अपनी दृष्टि थी, अपनी शैली-मुहावरे-सरोकार, अपनी अनूठी राह, अपनी पसंद के शहर और देश जहां वे रहते थे. पर संग-साथ, फिर भी, किसी न किसी रूप में बना रहा.

मैंने पेरिस में अकबर पदमसी या रामकुमार के कुछ दिनों के लिए आने पर रज़ा को उनके लिए व्यवस्था करने में बहुत उत्साहित और प्रसन्न होते देखा है. ऐसी गरमजोशी, आपस में सद्भाव दबी-छुपी ईर्ष्या के बावजूद एक दूसरे की मदद के लिए तत्परता रज़ा, रामकुमार, अकबर पदमसी, तैयब मेहता, मक़बूल फ़िदा हुसैन, कृष्ण खन्ना, वासुदेव गायतोण्डे, फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा में कमोबेश अदम्य रही है. रज़ा को तो कई बार लगता था कि वे अपने इन मित्रों के बिना रह ही नहीं सकते और जैसे कलाकार वे बने उसमें इन मित्रों का भी योगदान रहा.

हम इसी वर्ष से रज़ा जन्मशती के सिलसिले में उनके इन कलाकारों-मित्रों में से हरेक पर एक स्वतंत्र आयोजन करने की भी योजना बना रहे हैं. अभी तो तलाश है ऐसे युवा संग्राहकों की जो इसका नियोजन कर सकें. ‘संग-साथ’ प्रर्दशनी में रज़ा के अलावा कृष्ण खन्ना, हुसैन, रामकुमार, अकबर पदमसी, रज़ा की पत्नी फ्रेंच कलाकार जानीन मोंजिला के चित्र शामिल किये जा रहे हैं.

कलाकारों की मित्रताएं सीधी-सादी नहीं होतीं. उनमें समय और उपलब्धि या प्रसिद्धि के साथ वक्रताएं भी आती हैं. कई तरह के तनाव भी उपजते हैं. उनके से अधिकांश अतिसंवेदनशील होने के कारण कई बार ग़लतफ़हमियां भी फैलती हैं. कलाकारों के बीच खटास हो जाये इसकी कोशिश भी कई बार कुछ लोग विभिन्न कारणों या स्वार्थवश करते हैं. वे कई बार सफल भी हो जाते हैं. लेकिन यह बहुत दुर्लभ और काफ़ी हद तक विस्मयकारी बात है प्रोग्रेसिव आटिस्ट ग्रुप के अन्तर्गत मिले इन कलाकारों का गहरा संग-साथ कभी स्खलित या स्थगित नहीं हुआ. शायद उसे बनाये रखने में रज़ा और कृष्ण खन्ना की भूमिका निर्णायक रही है बाल छाबड़ा के साथ. ‘संग-साथ’ उस भूमिका को एक विलम्बित पर आवश्यक प्रणति है.