‘दी क्विंट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 से अब तक भारत में भीड़ द्वारा हत्या (मॉब लिंचिंग) के 94 मामले सामने आ चुके हैं. और यदि उसमें मुरादाबाद के आलियाबाद गांव के गंगाराम की हत्या को जोड़ दें तो यह संख्या 95 हो जाती है. इन पीड़ितों में प्रायः सभी धर्मों, जातियों और क्षेत्रों के लोग शामिल हैं. इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2012 से 2019 में अब तक सामुदायिक घृणा से प्रेरित ऐसी 128 घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें 47 लोगों की मृत्यु हुई है और 175 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं.

इंडियास्पेंड की ही एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक एक जनवरी, 2017 से पांच जुलाई, 2018 के बीच दर्ज 69 मामलों में केवल बच्चा-चोरी की अफवाह के चलते 33 लोग भीड़ द्वारा मारे जा चुके हैं और 99 लोग पीट-पीटकर गंभीर रूप से घायल किए जा चुके हैं. जाहिर है इनमें से कुछ हत्याएं ही राजनीतिक सुभीते के आधार पर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन पाती हैं.

भारत के राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2001 से 2014 तक देश में 2,290 महिलाओं की हत्या डायन होने की आशंका में पीट-पीटकर की गई. इनमें 464 हत्याएं अकेले झारखंड में हुईं. ओड़िशा में 415 और आंध्र प्रदेश में 383 ऐसी हत्याएं हुईं. राजधानी दिल्ली से सटे अपेक्षाकृत एक छोटे राज्य हरियाणा में 209 ऐसी हत्याएं हुईं. ध्यान रहे कि डायनों की हत्याएं प्रायः अंधविश्वासी और भयभीत ग्रामीणों की भीड़ या सुनियोजित जनसमूह द्वारा ही की जाती हैं. ये बात और है कि विभिन्न आंकड़ों में इन हत्याओं को लिंचिंग या भीड़हत्या के रूप में नहीं गिना जाता. विडंबनात्मक रूप से इसका कारण संभवतः यह हो सकता है कि ये हत्याएं स्वयं आदिवासियों द्वारा आदिवासी महिलाओं की की गई होती हैं. या इनमें दलितों ने दलित महिला को ही मारा होता है. भारत के मौज़ूदा बौद्धिक विमर्श में भीड़हत्या में गिने जाने के लिए सामुदायिक और राजनीतिक रूप से परस्पर-विरोधी समुदायों का पीड़ित या पीड़क के रूप में शामिल होना जरूरी होता है.

आज भारत में इस प्रकार की हत्याओं में साल-दर-साल बढ़ोतरी देखी जा रही है. किसी समय जब संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में इस तरह की हत्याएं शुरू हुईं, तो जहां 1890 में केवल 137 ऐसी घटनाएं सामने आईं, वहीं दो साल बाद 1892 में यह आंकड़ा बढ़कर 235 हो चुका था. इसलिए भारतीय समाज के लिए यही अच्छा होगा कि समय रहते इस पर एक व्यापक विमर्श हो और इसके लिए जिन-जिन स्तरों पर जो किया जाना हो, वह किया जाए. इस विमर्श में केवल लक्षणों का उपचार नहीं, बल्कि मौलिक कारणों को समझकर उसका सर्वांगीण उपचार करने की जरूरत होगी. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह की हिंसा कुछ खास समुदायों के खिलाफ ज्यादा दिखाई दे रही है, इसलिए इसका एक राजनीतिक कोण भी इस पर हावी हो जाता है. लेकिन केवल राजनीतिक नज़रिए से इस समस्या का इलाज ढूंढ़ने जाएंगे तो यह सुलझने के बजाए और उलझता जाएगा.

भारत में भीड़हत्या पर मौजूदा राजनीतिक विमर्श पीड़ित तबकों में पीड़ाबोध और भय को बढ़ा रहा है और इससे एक सामाजिक अलगाव और बिखराव पैदा होने का खतरा बढ़ रहा है. न केवल पीड़ितों, बल्कि पीड़ितों के पक्ष में खड़े होकर विरोध का स्वर बुलंद कर रहे बौद्धिकों को भी हर प्रकार के छल-बल-कल से डराने-धमकाने की कोशिशें हो रही हैं. ऐसे वातावरण में कोई स्वस्थ बहुपक्षीय संवाद संभव नहीं हो पा रहा.

अज्ञानतावश अत्याचारी पक्ष के साथ मौन सहमति रखने वाले लोग समझ नहीं पा रहे कि भीड़हिंसा एक सामाजिक बीमारी है जिसे यदि बढ़ने का मौका दिया जाए तो अंततोगत्वा उसके भीड़शाही या भीड़तंत्र में बदलने का खतरा रहता है. देर-सवेर सभी समुदाय इसके निशाने पर आने लगते हैं और कोई भी सुरक्षित नहीं रह जाता. भीड़हत्या के इतिहास पर एक नज़र डालने से यह बात और भी साफ हो जाती है.

अलग-अलग संस्कृतियों में भीड़हत्या (मॉब लिंचिंग) के क्या कारण थे

चोरों, अपराधियों या अन्य नस्लों, कबीलों के लोगों को आशंकाजनित भय या सजा देने के उद्देश्य से बांधकर पीटने और जान तक से मारने की घटनाएं दुनिया के उन सभी समाजों में कमोबेश मौजूद रही हैं जो मनुष्यता के विकासक्रम में अपनी बर्बरता को समझ और छोड़ नहीं पा रहे हैं. कुछ समाज इससे पूरी तरह उबर चुके हैं, लेकिन कई समाजों में विभिन्न कारणों से इन घटनाओं में कमी आने के बजाय बढ़ोतरी देखी जा रही है. हमारी उम्र के अधिकतर लोगों ने अपने बचपन में देखा होगा कि किस तरह चोर को पकड़ लिए जाने पर उसका सर मूंडकर कालिख और चूना लगाकर और गदहे पर बिठाकर पूरे गांव-कस्बे में घुमाया जाता था. कई बार उन्हें जूते-चप्पलों की माला भी पहनाई जाती थी. किसी को भी उन्हें लात-मुक्कों से पीटने की छूट होती थी. ऐसे मामलों में प्रशासन प्रायः मूकदर्शक ही बना रहता था.

भीड़हत्या पर दुनियाभर में किए गए अध्ययनों में पाया गया है कि रूस के किसान अपने घोड़ों को सबसे बहुमूल्य संपत्ति मानते थे और उनके घोड़े चुराने वालों को वे प्रायः पीट-पीटकर जान से मार देते थे, क्योंकि पुलिस और अदालतों पर उनको भरोसा नहीं होता था. जर्मनी के दो इतिहासकारों मैनफ्रेड बर्ग और साइमन वेंट ने अपने अध्ययन में पाया है कि बर्लिन में भी ऐसे दृश्य आम होते थे, जहां लोगों की भीड़ किसी भी संदिग्ध बलात्कारी या अपराधी को बुरी तरह पीट रही होती थी. जर्मन पुलिस ऐसे पीड़ितों को उनके चंगुल से छुड़ाती जरूर थी लेकिन भीड़ में शामिल लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती थी. जर्मन अखबारों में प्रायः ऐसी भीड़ की प्रशंसा की जाती थी और ऐसी भीड़हिंसा में हुई मौतों की खबर कभी नहीं छापी जाती थी.

लिंचिंग का सबसे क्रूरतम इतिहास संयुक्त राज्य अमेरिका का रहा है

‘लिंचिंग’ शब्द अमेरिका से ही आया है जिसे कुछ लोग विलियम लिंच, तो कुछ विद्वान चार्ल्स लिंच नाम के एक कैप्टन से जोड़ते हैं. कहा जाता है कि अमेरिकी क्रांति के दौरान वर्जीनिया के बेडफर्ड काउंटी का चार्ल्स लिंच अपनी निजी अदालतें बिठाने लगा और अपराधियों तथा विरोधी षड्यंत्रकारियों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सजा देने लगा. धीरे-धीरे ‘लिंचिंग’ के रूप में यह शब्द पूरे अमेरिका में फैल गया. इस अत्याचार का सर्वाधिक शिकार अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में बसे अश्वेत अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय के लोग हुए. लेकिन बाद में मैक्सिकन, इतालवी और स्वयं श्वेत अमेरिकी भी इसके शिकार हुए.

तब सैकड़ों लोगों की भीड़ के सामने पेड़ों या पुलों से लटकाकर पहले अंग-भंग कर और जिंदा जलाकर घोर अमानवीय तरीके से हत्याएं की जाती थीं. कान और उंगलियों को काटकर स्मृतिचिह्न के रूप में रखा जाता था. कई बार ये हत्याएं जेल में घुसकर कैदी को बाहर निकालकर उसे सरेआम नृशंसतापूर्वक मारने-जलाने के रूप में होती थीं. अमेरिका स्थित ‘नेशनल एसोसिएशन फॉर दी एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपुल’ के एक आंकड़े के मुताबिक सन् 1882 से 1968 तक अमेरिका में 4,743 लोगों की हत्या भीड़ द्वारा की गई. लेकिन लिंचिंग के शिकार लोगों में जहां 3,446 अश्वेत अफ्रीकी अमेरिकी थे, वहीं 1,297 श्वेत लोग भी थे.

आज भी लिंचिंग को अमेरि­­की समाज के ऊपर सबसे बड़ा कलंक का धब्बा माना जाता है. न केवल अमेरिकी समाज बल्कि वूड्रो विल्सन जैसे स्वनामधन्य राष्ट्रपति और थॉमस राई जैसे टैनेसी के गवर्नर की इन घटनाओं के प्रति उदासीनता को भी रेखांकित किया जाता है. फरवरी, 1918 में एक भीड़ ने जिम मैकलेहरॉन नाम के एक अफ्रीकी-अमेरिकी की सरेआम बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी.

वह प्रथम विश्वयुद्ध का दौर था और अमेरिका दुनियाभर में स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवता की रक्षा के नाम पर इसमें शामिल हो चुका था. ‘नेशनल एसोसिएशन फॉर दी एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपुल’ के सचिव ने अमेरिकी राष्ट्रपति को एक टेलीग्राम भेजकर कहा कि दुनियाभर में यदि हम मानवता और न्याय की दुहाई दे रहे हैं तो हमारे अपने देश को कलंकित कर रही ऐसी भीड़हत्याओं की खुलकर सार्वजनिक निंदा आप क्यों नहीं करते? राष्ट्रपति के कार्यालय ने इस टेलीग्राम को अटॉर्नी जनरल को अग्रेषित कर दिया. अटॉर्नी जनरल के कार्यालय ने जवाब दिया कि ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के मुताबिक संघीय सरकार को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने का बिल्कुल भी कोई न्यायाधिकार नहीं है.’

एसोसिएशन ने इसके बाद टैनेसी के गवर्नर थॉमस राई से अपील की कि अपने राज्य के सम्मान को बचाने के लिए दोषियों को सजा दिलाने हेतु वे कार्रवाई करें. गवर्नर ने जवाब दिया, ‘मैं पहले से कैसे मानकर चल सकता हूं कि स्थानीय अधिकारी जिनका कर्तव्य है कि वे कैदियों की सुरक्षा करेंगे, वो इसमें विफल रहेंगे. और न ही मैं तब तक कोई कारर्वाई कर सकता हूं जब तक कि स्थानीय अधिकारीगण या न्यायाधिकारी मुझसे इसके लिए अनुरोध न करें.’ तो इस तरह साबित हुआ कि बेचारी संघीय सरकार के मुखिया अमेरिकी राष्ट्रपति और राज्य सरकार के पास अपने अश्वेत नागरिकों की रक्षा के लिए कोई अधिकार ही नहीं था. हालांकि साल 2005 में अमेरिकी सीनेट ने सामूहिक रूप से इसके लिए सार्वजनिक माफी मांगी कि जब अमेरिका में भीड़ हत्याओं का सबसे खूनी दौर चल रहा था, तब वह इसके खिलाफ कोई एंटीलिंचिंग कानून बनाने में विफल रही.

अमेरिका में लिंचिंग की बढ़ती प्रवृत्ति से वहां के पूरे समाज पर क्या असर पड़ा

जैसा कि ऊपर कहा गया है कि 1882 से 1968 के बीच अमेरिका में 1,297 श्वेत लोग भी भीड़हत्या का शिकार हुए. इनमें से कुछ लोग ऐसे थे जो अश्वेतों से सहानुभूति रखते थे या उनके लिए आवाज उठाते थे. उदाहरण के लिए 1870 में नॉर्थ कैरोलिना के स्टेट सीनेटर जॉन स्टीफेंस को इसलिए श्वेत लोगों ने ही मार डाला क्योंकि वे मुक्त कराए गए अश्वेत गुलामों की मदद करते थे. इसी तरह 1837 में एक अखबार के संपादक और प्रकाशक 35 वर्षीय श्वेत एलीज़ा लवज्वॉय को इसलिए श्वेत लोगों की भीड़ ने ही मार डाला क्योंकि वे अश्वेतों को ग़ुलाम बनाने की प्रथा का अंत करने पक्षधर थे. 1891 में लूज़ियाना के न्यू ऑर्लियन्स शहर में 11 इतालवी अमेरिकियों को श्वेत अमेरिकियों की भीड़ ने मार डाला. उस भीड़ को उकसाने वाले दो नेता बाद में मेयर और गवर्नर तक बने.

कुछ निर्दोष श्वेत लोग प्रतिक्रिया में अश्वेत लोगों की भीड़ द्वारा मार डाले गए. जैसे 1975 में पिज़्को मारियान नाम का एक 54 वर्षीय पोलिश यहूदी मिशिगन में दंगों के बीच फंस गया और अश्वेत युवकों द्वारा मार डाला गया. उसके बारे में कहा गया कि वह गलत समय में गलत लोगों को बीच पड़ गया क्योंकि वह गोरा था और प्रतिक्रिया में पागल हो चुके अश्वेत युवकों को किसी भी तरह का एक गोरा शिकार चाहिए था.

भीड़हत्या की बीमारी जब सामाजिक रूप से फैल जाती है तो वह अंधी हो जाती है. अमेरिका में लिंचिंग के इतिहास में बड़ी संख्या में निर्दोष लोग भी केवल शक या अफवाह के आधार पर भीड़ द्वारा मार डाले गए. उदाहरण के लिए, 1923 में कोलंबिया के एक प्रोफेसर की बेटी के साथ दुष्कर्म हुआ. भीड़ ने केवल शक के आधार पर जेम्स टी. स्कॉट नाम के एक अश्वेत को मार डाला. बाद में पीड़िता ने असल बलात्कारी के रूप में किसी अन्य युवक की पहचान की. जूरी ने भीड़हत्या के अपराध को ढकने के लिए केवल 11 मिनट की सुनवाई में ही असल बलात्कारी को निर्दोष करार दे दिया.

अब्राहम लिंकन और मार्टिन लूथर किंग जैसे उदारमना व्यक्तित्वों के विचारों से प्रेरित होकर आज अमेरिकी समाज और प्रशासन अपने आप में सप्रयास बहुत बदलाव ला चुका है. हालांकि अब भी वहां इक्का-दुक्का ऐसी घटनाएं दिख जाती हैं. लेकिन भारत में जिस प्रकार ऐसी घटनाएं हाल के वर्षों में जोर पकड़ती जा रही हैं उन्हें देखकर लगता है कि ऐसी कई समस्याएं हैं जो इस समाज को भीतर-ही-भीतर खाए जा रही हैं. विभिन्न समुदायों के बीच आपसी भय, घृणा और द्वेष एक प्रमुख कारण है जिसकी ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है. हमारी युवा पीढ़ियों में घर करते जा रहे इनमें से ज्यादातर भय और घृणा बेबुनियाद और मनगढंत बातों पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें दूर करने का सुसंगठित और सुनियोजित प्रयास करने की जरूरत है. इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में झूठी खबरों और अफवाहों को पहचानने और इनसे निपटने की दिशा में उन्हें जागरूक किए जाने की जरूरत है.

लिंचिंग की घटनाएं रोकने के लिए एक देश और समाज के रूप में हम क्या कर सकते हैं

‘कानून के शासन’ में लोगों का विश्वास बढ़े और न्याय-व्यवस्था में उनका भरोसा कायम हो, इस दिशा में कार्य किए बिना भीड़-हत्या पर लगाम लगाना मुश्किल हो सकता है. हम आए दिन देखते हैं कि बलात्कार इत्यादि की किसी भी हृदय-विदारक घटना के बाद यह मांग उठने लगती है कि दोषियों को तुरंत और सरेआम फांसी दो. लोगों में, खासकर युवाओँ में बढ़ रही बेरोजगारी, निठल्लापन, निराशा, हताशा, तनाव और दबाव भी उनमें आक्रोश उत्पन्न कर रहा है. जीवन के अन्य क्षेत्रों में मिल रही विफलताएं भी उन्हें हारा हुआ और कमजोर अनुभव कराती हैं. और जैसे ही किसी निरीह पर उनको अत्याचार करने का अवसर मिलता है, तो वे बिना सोचे-समझे उस पर टूट पड़ते हैं.

सुधि पाठकों को लोकप्रिय फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ का वह दृश्य याद होगा जिसमें लोग एक साधारण से जेबकतरे पर टूट पड़ते हैं और हरिप्रसाद शर्मा की भूमिका में सुनील दत्त उस जेबकतरे (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) को भीड़ से बचाते हुए कहते हैं- ‘जानते हो ये (भीड़) कौन हैं? ये हमारे देश की जनता है जनता. इनके चेहरे देखे, कितने गुस्से में हैं! कोई बीवी से लड़कर आया है. किसी का बेटा उसकी बात नहीं सुनता. किसी को अपने पड़ोसी की तरक्की से जलन है. कोई मकान मालिक के ताने सुनकर आ रहा है. सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर क्रिकेट टीम की हार तक हर बात पे नाराज हैं. लेकिन सब चुप हैं. किसी के मुंह से आवाज नहीं निकलती. और ये सारा गुस्सा तुझपे निकालेंगे. कर दूं इनके हवाले? सर फोड़ देंगे तेरा.’ भीड़-हत्याओं के राजनीतिक निहितार्थों से अलग इसे ठीक से समझने के लिए इस बात को याद रखना भी जरूरी है.

सामाजिक आदान-प्रदान में आती जा रही कमी की वजह से परस्पर-संवाद की जगह एक खालीपन आता जा रहा है. इसलिए अब हर कोई केवल प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की ओर देखने लगा है. ऐसे में प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व को भी बहुत संवेदनशीलता के साथ इस पूरी परिघटना से निपटना होगा. नहीं तो वे भी एक दिन इससे बच नहीं पाएंगे.

बहुत समय नहीं हुए जब बिहार में गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया को गोली मारने से पहले एक नेता द्वारा उत्तेजित भीड़ ने पीट-पीटकर उन्हें बुरी तरह जख्मी किया था. डेढ़ साल पहले बिहार के ही बक्सर में मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के काफिले पर ही भीड़ ने जानलेवा पथराव करना शुरू कर दिया जिसमें मुख्यमंत्री तो बाल-बाल बच गए, लेकिन उनके कई सुरक्षाकर्मी घायल हो गए. जहां देखो वहीं कोई भीड़ अधिकारियों को खदेड़ने पर आमादा हो जाती है. तेलंगाना में वृक्षारोपण करने गई महिला वनकर्मी पर लाठी बरसा रही भीड़ की तस्वीरें हम देख ही रहे हैं.

इतिहास में तो यह भी दर्ज है कि 1672 में हॉलैंड के निवर्तमान प्रधानमंत्री जोहान डी विट्ट तक को एक भीड़ ने नृशंसतापूर्वक नग्न करके मार डाला था. इसलिए इस मामले में केवल जबानी जमाखर्च से काम चलाना और इसका राजनीतिक फायदा उठाना सबके लिए या किसी के भी लिए, कभी भी महंगा पड़ सकता है.