देश की राजधानी दिल्ली में हाल के सालों में बार-बार सीवरों की सफ़ाई के दौरान सफ़ाई कर्मचारियों और मज़दूरों की मौत हुई है. इस सिलसिले में ताज़ा घटना बीते पखवाड़े पश्चिमी दिल्ली के केशोपुर बस डिपो के पास हुई. यहां दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) की एक सीवर पाइपलाइन की मरम्मत के दौरान तीन मज़दूर हादसे का शिकार हो गए. घटना की वजह नई नहीं थी. यह जानते हुए कि सीवरों में जानलेवा ज़हरीली गैसें होती हैं, सफ़ाईकर्मियों की तरह इन तीनों मज़दूरों, शाहरूख़ खान (25), अंकित (19) और देविंदर शर्मा (25) को भी कई फ़ीट गहरे सीवर में भेज दिया गया.

मीडिया रिपोर्टों पर ग़ौर करें तो पता चलता है कि शाहरूख़ की मौत जहां ज़हरीली गैसों की वजह से हुई, वहीं अंकित और देविंदर की मौत के मामले में दिल्ली जल बोर्ड की एक और बड़ी लापरवाही सामने आई. दरअसल, इस हादसे में जिंदा बचे एक अन्य मज़दूर इमरान ने बताया कि जिस समय तीनों को सीवर से बाहर लाने की कोशिशें हो रही थीं, उसी दौरान किसी ने सीवर लाइन से जुड़ा बैरेज खोल दिया. इस कारण कुछ ही देर में सीवर में पानी भर गया. शाहरूख़ का हाथ सीवर के उस जाल में फंस गया था, जिसकी मरम्मत करने वे उसमें उतरे थे. इसलिए उन्हें बाहर निकालने में उनके साथी मज़दूर कामयाब रहे. हालांकि उन्हें बचाया नहीं जा सका.

वहीं, उन्हें बचाने के लिए सीवर में उतरे अंकित और देविंदर को सीवर में डूबने से नहीं बचाया सका. ज़हरीली गैस से ये दोनों भी बेहोश हो गए थे. लेकिन पाइपलाइन खुलने की वजह से उसमें इतनी तेज़ी से पानी भरा कि वहां मौजूद लोगों को उन्हें बचाने का मौक़ा ही नहीं मिला. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ़) ने तीन दिन की कोशिशों के दौरान रविवार और सोमवार को दोनों के शव बाहर निकाले जा सके. अगर दिल्ली जल बोर्ड ने यह लापरवाही न की होती तो शायद इमरान की तरह अंकित और देविंदर की जान भी बच सकती थी.

इस घटना ने दिल्ली जल बोर्ड के साथ राजधानी में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है. मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि बोर्ड ख़ुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अधीन है जो पानी और सीवर की सफ़ाई के मुद्दे पर अभूतपूर्व काम करने का दावा करते हैं. उनकी सरकार ने ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध एवं उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013’ के तहत अगस्त, 2017 में दिल्ली में हाथ से सीवरों की सफ़ाई यानी मैनुअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध लगा दिया था. इस क़ानून का एक अहम प्रावधान यह है कि सीवरों की सफ़ाई (या मरम्मत) के लिए मज़दूरों को बिना सुरक्षा उपकरण के नीचे न भेजा जाए.

लेकिन इस क़ानून के साथ लगाई गई पाबंदी के बावजूद राजधानी में इस तरह की घटनाएं होती हैं. शुक्रवार की घटना से पहले पिछले साल सितंबर में सुरक्षा उपकरणों की कमी की वजह से एक सफ़ाई मज़दूर अनिल की मौत हो गई थी. उसी घटना से तीन-चार दिन पहले दिल्ली के मोतीनगर इलाक़े में सीवर प्लांट की सफ़ाई के दौरान पांच मज़दूरों की मौत हो गई थी. ये घटनाएं दिल्ली में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध लगने के बाद हुई हैं. अब दिल्ली हाई कोर्ट ने इस बारे में आप सरकार से सवाल किया है. वकील अमित साहनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने नोटिस जारी कर दिल्ली सरकार और पीडब्ल्यूडी के साथ दिल्ली जल बोर्ड से भी जवाब तलब किया है कि आख़िर क्यों 21 अगस्त, 2017 को राजधानी में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक लगने के बावजूद सफ़ाई कर्मियों (या मज़दूरों) को सीवरों में बिना सुरक्षा उपकरण के उतारा जा रहा है.

डीजेबी इस संबंध में जो भी जवाब दे, लेकिन उसके कामकाज पर कई तरह से सवाल उठ रहे हैं. केशोपुर की घटना में उसकी लापरवाही साफ़ तौर पर सामने आई है लेकिन इस लापरवाही की वजह क्या है, इसका अंदाज़ा कुछ दिनों पहले वायरल हुए एक वीडियो से लगाया जा सकता है. सोशल मीडिया मीडिया पर काफ़ी संख्या में शेयर किए गए इस वीडियो को देखने के बाद कइयों ने दिल्ली जल बोर्ड को ‘सरकारी मौज का अड्डा’ क़रार दिया. इसमें विभाग के कर्मचारी दफ़्तर के अंदर शराब पार्टी करते दिखाई दिए थे. उन्हें ताश खेलते और एक सुरक्षा गार्ड को बाहर निगरानी करने का निर्देश देते भी देखा जा सकता है. मामला सामने आने के बाद दिल्ली सरकार ने चार आरोपित कर्मचारियों को निलंबित कर दिया. वहीं, यह मामला केशोपुर की घटना की ओर ध्यान दिला गया जिसमें बोर्ड की लापरवाही की वजह से तीन युवकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

‘सरकारी मौज’ और लापरवाही के अलावा दिल्ली जल बोर्ड भ्रष्टाचार से भी ग्रस्त है. राजधानी की जनसंख्या जैसे साल-दर-साल बढ़ रही है, उसी तरह यहां पानी की किल्लत भी बढ़ती जा रही है. हालांकि बीते सालों में दिल्ली के कई इलाकों में पानी की आपूर्ति के लिए पाइपलाइन की व्यवस्था शुरू हो चुकी है. लेकिन अभी भी कई इलाकों में पीने के पानी के लिए लंबी लाइनें लगती हैं, जिनमें अक्सर लोगों के बीच झगड़े होते हैं. टैंकर माफ़िया के लिए यह आदर्श स्थिति है. वे सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से अभी भी पानी बेच रहे हैं.

एक रिपोर्ट में आम आदमी पार्टी के विधायक ऋतुराज झा का बयान यह जानने के लिए काफ़ी है कि कैसे केजरीवाल सरकार में भी डीजेबी समेत दिल्ली के सरकारी विभाग पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हुए हैं. पानी के मामले में इसका ख़ामियाज़ा लोगों को दिल्ली जल बोर्ड की बदइंतज़ामी के रूप में भुगतना पड़ता है. फ़र्स्ट पोस्ट की इस रिपोर्ट में ऋतुराज ने कहा था, ‘यह समस्या टैंकर माफ़िया और सरकारी अधिकारियों की रिश्वत लेने की आदत की वजह से बनी हुई है.’