सामान्य धारणा तो यह है कि सरकारें अपने कार्यकाल के आखिर में जो अंतरिम बजट लाती हैं, वह लोकलुभावन होता है क्योंकि उन्हें चुनाव में जाना होता है. और चुनाव के ठीक बाद आई सरकार सख्त वित्तीय अनुशासन वाला बजट पेश करती है क्योंकि वह अगले कुछ सालों तक चुनाव की चिंता से मुक्त होती है. दोबारा चुनकर लौटी नरेंद्र मोदी सरकार पर यह बात इसलिये भी ज्यादा सटीक इसलिए लगती है क्योंकि उदारीकरण के बाद यह पहली ऐसी सरकार है जो इतना सशक्त जनादेश लेकर लौटी है. ऐसे में सामान्य समझ तो यही कहती है कि दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार का पहला बजट अर्थव्यवस्था को कड़वी गोली देने वाला होना चाहिए.

लेकिन, जो संकेत मिल रहे हैं, वह इस सामान्य धारणा से उलट दिखते हैं. आर्थिक जानकारों का मानना है कि देश की पहली महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का पहला बजट आर्थिक अनुशासन और सरकारी घाटे में कमी की बात तो करेगा, लेकिन इसमें तमाम ऐसे कदम नजर आएंगे जिन्हें राजनीतिक-अर्थशास्त्र की भाषा में लोकलुभावन कहा जाता है. सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों?

अपने पिछले कार्यकाल के दौरान भी मोदी सरकार अपने स्वरूप में आर्थिक लिहाज से बहुत लोकलुभावनवादी नहीं दिखी थी. चुनाव के ठीक पहले आया अंतरिम बजट भी उम्मीद से कम चुनावी था. तो फिर इस बजट के लोकलुभावन होने की उम्मीद क्यों लगाई जा रही है? जबकि इस बार उसके पास जिस तरह का जनादेश है उसमें तो उसे किसी गठबंधन सहयोगी या ऐसे किसी दबाव की चिंता तक नहीं है. तुरंत ही कोई ऐसा बड़ा चुनाव भी नहीं है, जिसके चलते मोदी सरकार को लोकलुभावन होना पड़े. जिस समय यह उम्मीद की जा रही थी कि अब आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार और सख्त होगी, उस समय वह ऐसा बजट लाने के बारे में क्यों सोच सकती है?

इस सवाल का जवाब देश की मौजूदा आर्थिक हालत में छुपा है. चुनाव से पहले से ही सुस्त हो रही आर्थिक रफ्तार चुनाव के बाद लगभग मंदी जैसे हालात में हैं. पहली तिमाही में ही आर्थिक वृद्धि की दर छह से नीचे आकर 5.8 फीसद पर टिक गई है. आटोमोबाइल से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं तक की ब्रिकी में गिरावट है. कारों की ब्रिकी पिछले 19 सालों में सबसे कम है तो रोजमर्रा के लिए जरूरी टूथपेस्ट, साबुन शैंपू जैसी चीजों की भी मांग घटी है. आंकड़े बताते हैं कि देश में खपत लगातार गिर रही है. खास तौर से उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री गिरना यह बताता है कि लोग जरूरी चीजों तक पर खर्च करने से बच रहे हैं.

खपत के गिरते आंकड़े इस चिंता को तब और बढ़ा देते हैं जब हम उन्हें बचत के आंकड़ों के साथ रखकर देखते हैं. देश में खपत के आंकड़े तो गिर ही रहे हैं, साथ ही बचत के आंकड़े भी गिरावट पर हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि लोगों की आमदनी कम हो गई है और जीवनयापन के लिए उन्हें अपनी बचत तक खर्च करनी पड़ रही है. इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि इस समय बेरोजगारी का आंकड़ा 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है और यह बात अब सरकार ने भी मान ली है. खपत की इस गिरावट का सीधा संबंध आर्थिक वृद्धि से भी है क्योंकि भारत की जीडीपी का 55 से 60 फीसद हिस्सा इसी से आता है.

यानी कि अर्थव्यवस्था को इस जटिल चक्र से निकालने का सबसे सीधा तरीका यही है कि कुछ ऐसा किया जाए कि लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसे बढ़ें, उनकी आमदनी बढ़े. और इसी में इस बात के सूत्र छिपे हैं कि नरेंद्र मोदी की मजूबत सरकार के सामने थोड़ा लोकलुभावन बजट लाने की मजबूरी क्यों है?

लोकलुभावन बजट का आमतौर पर इसलिए विरोध किया जाता है क्योंकि माना जाता है कि इसमें आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक चिंताओं का ध्यान रखा जाता है. लेकिन, इस बार के बजट में इसकी वजह उलटी है. सरकार राजनीतिक चिंताओं से तो मुक्त है, लेकिन आर्थिक चिंताओं की वजह से उसे लोकलुभावन होना पड़ सकता है.

लोगों के पास पैसे बचें, इसीलिए बजट में वेतनभोगी वर्ग को आयकर पर कई तरह से छूट दी जा सकती है. तीन लाख तक की आय को पूरी तरह से कर मुक्त किया जा सकता है. इसके अलावा 80 सी के तहत भी बचत का दायरा 1.5 से दो लाख किया जा सकता है. होम लोन के ब्याज पर मिलने वाली आयकर छूट को भी बढ़ाया जा सकता है.

इसके अलावा, ग्रामीण संकट से निपटने के लिए खेती के लिए कुछ और बड़ी घोषणाएं की जा सकती हैं. बजट से पहले ही पीएम-किसान योजना के तहत सभी किसानों को सालाना छह हजार रूपये देने की घोषणा इसका संकेत भी देती है. सरकार ने चुनाव से पहले के अंतरिम बजट में इस योजना के दायरे में सिर्फ दो एकड़ जमीन वाले किसानों को रखा था, लेकिन चुनाव के बाद इसके दायरे में सभी किसान आ गए. यानी कि जिस तरह की घोषणा की उम्मीद चुनाव से पहले होती है, वह चुनाव के बाद की गई. इसका सीधा सा मतलब यह है कि सरकार इस समय राजनीतिक समीकरणों की वजह से नहीं बल्कि आर्थिक चिंताओं के कारण लोकलुभावन हो रही है.

किसान और ग्रामीण क्षेत्र के अलावा लघु उद्यमों में तेजी लाने के लिए भी सरकार उन्हें तमाम किस्म की राहत दे सकती है. आरबीआई ने लगातार तीन बार ब्याज दरों में कटौती कर कर्ज सस्ते किए हैं, लेकिन अभी तक बैंकों ने अपनी ब्याज दरें कम नहीं की हैं. सरकार का पूरा जोर होगा कि लघु उद्योगों को सस्ते और आसान कर्ज मिलें. इसके अलावा भी लघु उद्योगों को कई तरीके की राहत मिल सकती है. रोजगार सृजित करने वाली कंपनियों को भी कुछ लाभदायक छूटें दी जा सकती है. अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए सरकार अपने योजनागत खर्चों को बढ़ा सकती है. रियल एस्टेट सेक्टर को गति देने के लिए भी घोषणा हो सकती है. इसके अलावा वह शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी खर्च को बढ़ा सकती है.

आर्थिक रफ्तार को गति देने के इन कदमों से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है. क्योंकि खपत बढ़ाने के लिए लोगों के साथ-साथ सरकार को भी पैसे खर्च करने पड़ेंगे और करों आदि से होने वाली उसकी कमाई भी कम हो सकती है. इससे सरकार के राजस्व पर फर्क पड़ना तय है.

ऐसे में राजकोषीय घाटे पर सरकार कैसे नियंत्रण रखेगी यह बड़ी चुनौती है. लेकिन फिलहाल ग्रोथ को रफ्तार देना उससे भी बड़ी चुनौती है. देखना यह होगा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण राजकोषीय घाटे और आर्थिक वृद्धि के इस जटिल समीकरण को कैसे साधती हैं.