भले ही बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) लोकसभा चुनाव एक साथ मिलकर लड़े हों और बिहार में सरकार मिलकर चला रहे हों, लेकिन दोनों के बीच शह और मात का खेल लगातार चल रहा है. जुलाई, 2017 में लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल को छोड़कर भाजपा के साथ आने के बाद से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में अपना पुराना रसूख हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा उन्हें अपने साथ रखते हुए भी एक स्तर से अधिक महत्व नहीं दे रही है.

भाजपा और नीतीश कुमार के बीच शह और मात का खेल सितंबर, 2017 से ही चल रहा है. तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया लेकिन जेडीयू के किसी भी सांसद को अपनी टीम में जगह नहीं दी. जबकि इस बात की चर्चा जोरों पर थी कि नीतीश कुमार के विश्वस्त आरसीपी सिंह को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया जा रहा है.

इसके बाद दोनों दलों के बीच शह और मात का खेल चला लोकसभा चुनावों के लिए टिकटों के बंटवारे में. इसके पहले नीतीश कुमार जब भाजपा के साथ थे तो उनकी पार्टी बिहार में सीनियर पार्टनर थी. इसका मतलब यह कि जेडीयू अधिक सीटों पर चुनाव लड़ती थी और भाजपा कम सीटों पर. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में नीतीश कुमार को बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार होना पड़ा. लोकसभा चुनावों के जब नतीजे आए तो भी भाजपा बिहार में जेडीयू से बड़ी पार्टी बनकर उभरी. भाजपा जिन 17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, उन सब पर उसने जीत हासिल की जबकि 17 सीटों पर लड़ने वाले जेडीयू को 16 सीटें मिलीं.

इन नतीजों के आधार पर यह माना जा रहा था कि नीतीश कुमार की पार्टी से कम से कम दो मंत्री बनाए जाएंगे. लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नीतीश कुमार को साफ कह दिया कि सहयोगी दलों से एक-एक मंत्री बनाने की बात तय हुई है. इस पर नीतीश कुमार तैयार नहीं हुए और एक बार फिर जेडीयू केंद्र सरकार का हिस्सा बनने से वंचित रह गया.

इसके बाद नीतीश कुमार ने बिहार सरकार में अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया. इस विस्तार में उन्होंने जेडीयू से आठ मंत्री बनाए और भाजपा से एक नाम मांगा. भाजपा ने एक नाम देने से इनकार कर दिया. राजनीतिक जानकारों ने माना कि ऐसा करके नीतीश कुमार ने भाजपा से दिल्ली का बदला पटना में लिया. बताया जाता है कि नीतीश कुमार के इस निर्णय से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उनसे नाखुश हुआ.

दोनों पक्षों के बीच अब शह और मात का खेल मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से 100 से अधिक बच्चों की मौत के मामले में जिम्मेदारी तय करने को लेकर है. बिहार के स्वास्थ्य मंत्री भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे हैं. बिहार भाजपा के प्रमुख नेताओं में अब मंगल पांडे की गिनती होती है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहते थे कि मुजफ्फरपुर में 100 से अधिक बच्चों की चमकी बुखार से हुई मौत की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मंगल पांडे स्वास्थ्य मंत्री के पद से इस्तीफा दें. नीतीश कुमार ने इसके लिए भाजपा पर काफी दबाव बनाया. बिहार भाजपा के सूत्रों की मानें तो उन्होंने इसके लिए खुद का उदाहरण भी दिया. बताया जा रहा है कि उन्होंने उपमुख्यमंत्री और बिहार भाजपा के सबसे प्रमुख नेता सुशील कुमार मोदी को कहा कि जब वे केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थे तो रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दे दिया था, इसलिए मंगल पांडे को भी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे देना चाहिए.

लेकिन भाजपा इसके लिए तैयार नहीं हुई. प्रदेश भाजपा के एक नेता बताते हैं, ‘भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यह स्पष्ट बता दिया गया कि मंगल पांडे के इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता. सीधे शब्दों में तो नहीं लेकिन उन्हें ये संकेत भी दिया गया कि अंततः राज्य सरकार में पूरी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होती है तो ऐसे में लोग मुख्यमंत्री का भी इस्तीफा मांग सकते हैं.’

कुछ लोग तो यह दावा भी कर रहे हैं कि नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव प्रकरण का भी उदाहरण दिया. जब तेजस्वी यादव नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री की हैसियत से काम कर रहे थे तो भ्रष्टाचार के एक मामले में उन पर लगे आरोपों को आधार बनाकर नीतीश कुमार ने खुद को तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से अलग कर लिया था. लेकिन इसके बावजूद भाजपा मंगल पांडे के इस्तीफे के लिए तैयार नहीं हुई. बिहार विधानसभा की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी अब नीतीश कुमार को इस वजह से निशाने पर ले रही है. पार्टी कह रही है कि जिम्मेदारी तय करने की बात कहने वाले नीतीश कुमार इस बार क्यों मंगल पांडे की जिम्मेदारी तय नहीं कर पा रहे हैं.

प्रदेश भाजपा के एक नेता हालिया घटनाक्रम के बारे में कहते हैं, ‘भाजपा में इस पर आम सहमति है कि मंगल पांडे का इस्तीफा नहीं होना चाहिए. अगर इसे मुद्दा बनाकर नीतीश कुमार बिहार सरकार से भाजपा को अलग करना चाहते हैं तो कर दें. भाजपा का अंदाजा है कि साल भर बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से नीतीश कुमार के सामने भाजपा के साथ बने रहने के अलावा कोई और व्यावहारिक विकल्प नहीं है.’

मंगल पांडे के इस्तीफे के मामले में अब तक जो हुआ है, उससे तो यही लगता है कि दोबारा भाजपा के साथ आने के बाद लगातार चल रहे शह और मात के खेल में नीतीश कुमार को एक बार फिर भाजपा ने पटखनी दे दी है और वे कुछ कर नहीं पा रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक बार-बार यह कह रहे हैं कि नीतीश कुमार को जो सम्मान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की भाजपा में मिलता था, वह सम्मान मोदी-शाह की भाजपा में नहीं मिल रहा है.

भाजपा के साथ दूसरी पारी में नीतीश कुमार को अब तक का सबसे बड़ा सांत्वना पुरस्कार उनकी पार्टी के राज्यसभा सांसद हरिवंश को राज्यसभा का उपसभापति बनने से मिला है. हालांकि, कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि भाजपा के पास अपने उम्मीदवार को इस पद पर पहुंचाने के लिए जरूरी संख्या नहीं थी, इसलिए उसने जेडीयू के हरिवंश का नाम उपसभापति के तौर पर आगे बढ़ाया.

बहरहाल, भाजपा और जेडीयू दोनों पार्टियों के लोगों की बातों से लगता है कि दोनों पक्षों के बीच चल रहा शह और मात का खेल अभी थमने वाला नहीं है और कोई अंतिम नतीजा आने से पहले इस खेल में अभी कई और राउंड बाकी हैं.