जब क्रिकेट विश्व कप का बुखार अपने चरम पर है तब वनडे क्रिकेट से जुड़ा एक बुनियादी सवाल खड़ा करने की इच्छा हो रही है. इस विश्व कप में यह बात बार-बार कही जा रही है कि रन इसलिए ज़्यादा बन रहे हैं क्योंकि नए नियम गेंदबाज़ों को रास नहीं आते. लेकिन ज़्यादा बड़ी सच्चाई यह है कि वनडे मैचों में शुरू से ही गेंदबाजों के साथ बहुत बड़ी गैरबराबरी होती रही है.

दरअसल, वनडे मैच बल्लेबाज़ों के लिए तो 50 ओवर के मैच हैं, लेकिन वे गेंदबाज़ों के लिए सिर्फ दस ओवर के मैच रह जाते हैं. डेविड वार्नर, रोहित शर्मा या जॉनी बेयरस्टो अगर अच्छी बल्लेबाज़ी कर रहे हों तो पूरे 50 ओवर खेल सकते हैं और वनडे में डबल सेंचुरी भी बना सकते हैं. लेकिन मिचेल स्टार्क, जोफ्रा आर्चर या भुवनेश्वर कुमार चाहे जितनी भी अच्छी गेंदबाज़ी करें, उनके लिए यह खेल बस दस ओवरों के कोटे का है. यह कोटा पूरा हो गया तो वे खेल से बाहर हो गए.

क्रिकेट में यह वह बुनियादी गड़बड़ी है जो पूरे खेल के नतीजे को पूरी तरह बदल डालती है. बल्लेबाज़ को मालूम है कि जो सबसे अच्छा गेंदबाज़ है, उसके दस ओवर खामोशी से निकाल लिए जाएं और किसी पांचवें गेंदबाज़ से उसकी भरपाई कर ली जाए तो खेल अपने पक्ष में मोड़ा जा सकता है.

कल्पना करें कि विश्व कप में भारत और इंग्लैंड के बीच हुए मैच में दुनिया के नंबर एक गेंदबाज जसप्रीत बुमराह के पास दस से ज़्यादा ओवर गेंदबाजी करने का विकल्प होता तो क्या इंग्लैंड के बल्लेबाज वैसी राहत की सांस ले सकते थे, जैसी उनके गेंदबाजी न करने के दौरान उन्होंने ली? दरअसल दस ओवरों का कोटा गेंदबाज़ों के साथ सिर्फ यही नाइंसाफ़ी नहीं करता कि वह खेल में उनकी भूमिका महज बीस फ़ीसदी रहने देता है, वह उसकी मारकता में भी कमी कर देता है. क्योंकि गेंदबाज़ के ये दस ओवर बल्लेबाज़ अलग ढंग से खेलता है और उसे लगभग निष्प्रभावी बना देता है.

अब दूसरी कल्पना करें. अगर बल्लेबाज़ के लिए भी मैच सिर्फ 10 ओवर का हो तो क्या हो? यानी यह नियम हो कि डेविड वार्नर चाहे जितनी भी अच्छी बल्लेबाज़ी कर रहे हों, 10 ओवरों के बाद मैदान छोड़ देंगे. अचानक उनकी शैली बदल जाएगी. जमने के लिए जो एक-दो ओवर वे लेते हैं, उसका भी वे रन बनाने में इस्तेमाल करना चाहेंगे. इसके अलावा अपने आख़िरी दो ओवरों में उन पर ज़्यादा से ज़्यादा रन बनाने का दबाव होगा. संभव है, इस दबाव की वजह से ही वे आउट हो जाएं. यही नहीं, फिर गेंदबाज़ों को भी पता होगा कि विराट कोहली बस 10 ओवर खेलेंगे. वे अपना सबसे अच्छा आक्रमण उनके लिए बचा कर रखेंगे. तब खेल बराबरी का होगा.

लेकिन दरअसल मूल मुद्दा दूसरा है. गेंदबाज़ों पर दस ओवर तक की गेंदबाज़ी का जो प्रतिबंध है, वह हटाया जाना चाहिए. बेशक, यह प्रतिबंध हटने के बाद भी हो सकता है कि वे दस ओवर ही करें. ऐसा संभव नहीं है कि दो गेंदबाज़ मिल कर 50 ओवर गेंदबाज़ी कर लेंगे. वे ऐसा करना चाहेंगे तो बाद की थकान में उनकी धुनाई हो जाएगी. लेकिन यह संभव है कि पांच की जगह चार गेंदबाज़ लगें या फिर पांचवां कामचलाऊ गेंदबाज़ दस की जगह पांच ओवर की गेंदबाज़ी करे. टेस्ट मैचों में यही होता है. अगर ऐसा हो सका तो खेल कहीं ज़्यादा निखरेगा, मुक़ाबले ज़्यादा रोमांचक होंगे. इससे खेल में नैसर्गिक बराबरी भी आएगी. लेकिन मुश्किल यह है कि खेल को बाज़ार की शर्तों और ज़रूरतों के हिसाब से ढालने में लगी आईसीसी को इस बेहद ज़रूरी, लेकिन अहम बदलाव पर ध्यान देने की फुरसत कहां होगी?