इसमें कोई शक नहीं कि हिंदुस्तानी वेब स्पेस में मनोरंजन से जुड़े कंटेंट की बाढ़ आई हुई है. और जब बाढ़ आती है तो सभी चीजों को अपने में ऐसे समाहित कर लेती है कि उनमें फर्क करना मुश्किल हो जाता है. इन दिनों ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर - जिन्हें कि ‘ओवर द टॉप सर्विसिज’ (ओटीटी) भी कहा जाता है - फर्क करने की यह मुश्किल ‘अच्छे कंटेंट’ और ‘बुरे-औसत कंटेंट’ के बीच आने लगी है.

ऐसे में सवाल उठता है कि इतना सारा कंटेंट और देखने के दर्जन भर प्रमुख मंचों के बावजूद क्या हिंदुस्तानी वेब स्पेस लंबे समय में अपनी एक मुख्तलिफ पहचान बना पाएगा? क्या ये कंटेंट मनोरंजन का स्वाद लेने के पारंपरिक माध्यमों – टीवी और सिनेमाघर – का विकल्प बनने का सच में माद्दा रखता है? क्या नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो के अलावा हॉटस्टार, आल्टबालाजी, वूट, सोनी लिव, जी5, मैक्स प्लेयर जैसे हमारे देसी ओटीटी मंचों का कंटेंट भी इतनी गुणवत्ता लिए है, और खुद में इतना आकर्षण रखता है कि आगे चलकर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के समानांतर एक दूसरा मनोरंजन उद्योग खड़ा कर पाएगा? या फिर, बहुत जल्द, यह हिंदुस्तानी वेब स्पेस तमाम उम्मीदों के बावजूद दूसरा बुद्धू बक्सा बनकर रह जाएगा?

हाल-फिलहाल की पांच गलतियों पर नजर डालें, तो लग रहा है कि अगर ये गलतियां बदस्तूर जारी रहीं तो जल्द ही हिंदुस्तानी वेब स्पेस टेलीविजन के बाद दूसरा बुद्धू बक्सा बन जाएगा.

मंच नए, पर पुराना ही कंटेंट

इस लेख के लिए नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो को एक किनारे रख दीजिए. ये और जल्द ही लॉन्च होने वाली डिज्नी प्लस व एपल टीवी प्लस जैसी दूसरी अंतरराष्ट्रीय स्ट्रीमिंग सर्विसिज के पीछे इतनी ताकतवर कंपनियां खड़ी हैं कि इन सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों का मुख्य उद्देश्य हमेशा ‘गुणवत्ता’ ही रहने वाला है. इसलिए देसी मंचों की बात करते हैं, जिनका प्रदर्शन आगे आगे चलकर यह निर्धारित करेगा कि हिंदुस्तान अपने दम पर अच्छा वेब कंटेंट रच सकेगा या नहीं. दुनिया में स्वदेसी कंटेंट के दम पर हमारी पहचान बनेगी, या फिर मनोरंजन के इस नए माध्यम के भी तारणहार एक बार फिर विदेशी बनेंगे.

2016 में नेटफ्लिक्स, एमेजॉन प्राइम वीडियो और हॉटस्टार इंडिया में लॉन्च हुए थे और उसके अगले दो-तीन सालों में आधा दर्जन से ज्यादा देसी ओटीटी वीडियो प्लेटफॉर्म्स वृहद हिंदुस्तानी वेब स्पेस पर आधिपत्य जमाने के लिए लॉन्च हो चुके हैं. लेकिन पिछले तीन-चार सालों से ख्याति पाने वाला देसी कंटेंट भी प्रमुखता से नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो जैसे विदेशी मंचों पर ही बन रहा है. आल्टबालाजी, हॉटस्टार, सोनी लिव, इरोस नाउ, वूट और हाल ही में लॉन्च हुआ मैक्स प्लेयर बेहद कम मौलिक कंटेंट बना रहे हैं और जो-जितना बना रहे हैं उनमें मुख्तलिफ माध्यमों पर पहले से बनते आ रहे कंटेंट की ही दोबारा-तिबारा होने वाली छपाई जारी है.

सभी देसी ओटीटी मंचों के साथ एक-सी ही दिक्कत देखने को मिल रही हैं. ये वही कंटेंट ज्यादा मात्रा में बना रहे हैं जो कि पहले टेलीविजन के लिए बनाया करते थे. थोड़ा बहुत कहानियों का हेर-फेर जरूर किया गया है, लेकिन प्रोडक्शन वैल्यूज से लेकर राइटिंग सेंसिबिलिटीज और अभिनय करने के तरीकों तक में बदनाम बुद्धू बक्से की ही छाप मौजूद है. मास कन्जम्प्शन के चक्कर में पुराना माल ही नए रेपर में लपेटकर परोसा जा रहा है.

उदाहरण के लिए टीवी मनोरंजन पर आधिपत्य रखने वाली एकता कपूर के आल्टबालाजी का कंटेंट देख लीजिए. 2017 में लॉन्च हुए इस वेब प्लेटफॉर्म के पास 2019 के मई महीने तक तकरीबन 23.5 मिलियन पेड सब्सक्राइबर्स थे. यानी, तकरीबन ढाई करोड़ भारतीय उपभोक्ता पैसा खर्च कर एकता कपूर के मिजाज का कंटेंट इस एप/वेबसाइट पर देखते हैं. टीवी इंडस्ट्री का हर बड़ा नाम इस प्लेटफॉर्म के सीरियल और सीरीज में नजर आता है और फिल्म इंडस्ट्री के भी कई जाने-पहचाने चेहरे यहां लगातार अपना वेब सीरीज डेब्यू करते हुए मिलते हैं.

लेकिन, जब भी आप आल्टबालाजी का कंटेंट देखने बैठते हैं तो आपको एकता कपूर के टेलीविजन वाले धारावाहिक ही याद आते हैं. ‘कर ले तू भी मोहब्बत’, ‘हक से’, ‘कहने को हमसफर हैं’ जैसे दर्जनों शोज की पूरी भाषा, पूरा व्याकरण, पूरी गुणवत्ता वही टीवी वाली है. केवल मंच भर बदला है. ठीक बात है कि इनमें सास-बहु-सिंदूर-घूंघट नहीं हैं लेकिन अर्बन स्पेस की कहानियां कहने के बावजूद ये सारा कंटेंट बासी दाल में ताजा तड़का मारने से ज्यादा कुछ नहीं है. अलग दिखने की कोशिश करने वाले ‘द टेस्ट केस’ (निर्देशक नागेश कुकनूर) और ‘बोस : डेड/अलाइव’ जैसी वेब सीरीज भी दिलचस्प प्रिमाइस होने के बावजूद गुणवत्ता के स्तर पर अभी तक औसत ही साबित हुई हैं.

ऐसे में, क्या हिंदुस्तानी वेब स्पेस आपको दूसरा बुद्धू बक्सा बनने की ओर अग्रसर नजर नहीं आ रहा?

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ये आपक बड़ी है घातक!

होना यह चाहिए कि देसी वीडियो स्ट्रीमिंग सर्विसिज को गुणवत्ता का ध्यान रखते हुए नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो के नक्शे-कदम पर चलते हुए चुनिंदा कंटेंट ही अपने मंचों पर अपलोड करना चाहिए. अपनी क्रेडिबिलिटी को मजबूत करना चाहिए, ताकि भविष्य में उपभोक्ता आंख बंदकर इनका भी साल भर का सब्सक्रिप्शन नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो की तरह ही खरीदने में हिचके नहीं.

लेकिन हो ये रहा है कि देसी ओटीटी सर्विसिज द्वारा नए शोज की संख्या बढ़ाने को तरजीह दी जा रही है. ताकि अपना यूजर बेस बढ़ाया जा सके, और कामचलाऊ कंटेंट के दमपर स्मार्टफोन पर सस्ते इंटरनेट के जरिए सीरीज-सीरियल देखने वाले युवाओं के ट्रैफिक का रूख अपने ऐप-वेबसाइट की तरफ मोड़ा जा सके.

इसी फरवरी महीने में एक साल पूरा होने की खुशी में जी5 नामक ओटीटी मंच ने 72 नए ओरिजनल शोज की घोषणा कर डाली थी! ये हिंदी से लेकर तलिम, तेलुगू, मलयालम, मराठी और बंगाली भाषा में बनेंगे और मार्च 2020 तक सभी शोज जी5 के मंच पर रिलीज हो जाएंगे. आज भी जी5 के ऐप-वेबसाइट पर ढेरों कंटेंट मौजूद है और वहां ‘नेविगेट’ करके देखने के लिए कुछ कायदे का ढूंढ़ना खासा सर-दर्द बन जाता है.

पिछले काफी समय से जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजिस लिमिटिड द्वारा संचालित जी5 पर कई सारी सो-कॉल्ड ओरिजनल फिल्में और सीरीज भी लगातार अपलोड हो रही हैं. लेकिन आज तक इस प्लेटफॉर्म का कोई ऐसा कंटेंट नहीं है जो नेटफ्लिक्स तथा एमेजॉन प्राइम के कंटेंट को टक्कर दे सका हो. ‘बदनाम गली’, ‘द शोले गर्ल’ जैसी औसत फिल्मों से लेकर ‘करणजीत कौर’, ‘रंगबाज’, ‘अभय’, ‘द फाइनल कॉल’, ‘स्कॉयफायर’ और ‘काफिर’ जैसे वेब सीरीज के विषय तो दिलचस्प रहे हैं लेकिन उनका क्रियान्वयन टेलीविजन धारावाहिकों और बी-ग्रेड फीचर फिल्मों के बीच झूलता ज्यादा मिलता है. अभी भी देसी ओटीटी मंच वेब सीरीज को धारावाहिकों की तरह ही बना रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर की वेब सीरीज का व्याकरण समझने में असफल सिद्ध हुए हैं.

जी5 में एक बात जरूर खास है, जो कि इसे बाकी के देसी मंचों से अलग बनाती है. वह ये कि इस मंच पर कई सारे भारतीय भाषाओं का कंटेंट मिलता है और बाकी ओटीटी मंचों की तरह ये केवल हिंदी भाषी उपभोक्ताओं को तृप्त करने को कोशिश नहीं कर रहा. लेकिन, इस विविधता के बावजूद ढेर सारा औसत कंटेंट रखने की आपक बाकी मंचों की तरह इस मंच के लिए भी घातक मालूम हो रही है.

इसी तरह आल्टबालाजी भी साल में 25 नए शोज बनाने का लक्ष्य रखता है. हाल ही में लॉन्च हुआ मैक्स प्लेयर पांच नए ओरिजनल शोज के साथ मैदान में उतर चुका है और लाइव मिंट की इस रिपोर्ट अनुसार अगले 12 महीनों में इसका भी 25 और नए शो बनाने का इरादा है. औसतन सभी देसी मंच साल भर में 20-25 नए शोज बनाने का लक्ष्य रख ही रहे हैं लेकिन इनके कंटेंट की गुणवत्ता इनकी महत्वाकांक्षा के स्तर की कब होगी, पता नहीं!

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व्यूज, सब्सक्रिप्शन और विज्ञापन पाने की आक्रमकता टीआरपी कल्चर को ही दोहराएगी

टेलीविजन मीडिया से जुड़ा हर समझदार व्यक्ति जानता है कि ‘टीआरपी कल्चर’ ने ही हमारे टीवी की यह दुर्गति की है. हर हफ्ते के एक दिन जब टीआरपी का डाटा टीवी चैनलों के दफ्तर पहुंचता है तो वहां काम करने वालों की हृदयगति अनियंत्रित हो जाती है. जिस देश में 80 करोड़ से ज्यादा भारतीय टेलीविजन का उपभोग करते हैं और तकरीबन 20 करोड़ घरों में टेलीविजन मौजूद है वहां हमेशा से चंद हजार घरों से इकट्ठा किए गए डाटा को जोड़कर टीआरपी के आंकड़े जुटाए जाते रहे हैं.

फिर इसी अवैज्ञानिक आधार पर बरसों से हमारा बुद्धू बक्सा खराब पर खराब, और खराब पर खराब कंटेंट हमें परोसता रहा है. क्योंकि, टीवी इंडस्ट्री के मालिकों को लगता है कि कुछ हजार घरों में जो देखा जाता है वही बाकी का भारत भी देखना चाहता है.

ओटीटी मंचों को लेकर खास तौर पर रेखांकित किया जाता है कि वे ‘टीआरपी कल्चर’ और ‘बॉक्स-आफिस की दौड़’ से मुक्त है इसलिए बेहतर और क्रांतिकारी कंटेंट रचते हैं. नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो जैसे प्लेटफॉर्म्स के बारे में ये बात सटीकता के साथ कही भी जा सकती है क्योंकि ये दोनों ही मंच कभी सार्वजनिक नहीं करते कि कितने उपभोक्ताओं ने कितना कंटेंट देखा. यह एक नई और क्रांतिकारी प्रैक्टिस मानी जाती है जिसमें कि आंकड़ों का दबाव न क्रिएटिव लोगों पर डाला जाता है और न ही पैसा कमाने के लिए बैठे पूंजीपतियों को जरूरत से ज्यादा लालची होने दिया जाता है.

लेकिन, हिंदुस्तान वेब स्पेस में ‘टीआरपी कल्चर’ एक अलग भेष बनाकर दाखिल हो चुका है. चिंता तो नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम तक को रहती है कि उनके कितने सब्सक्राइबर्स हैं और अपने आगे के लक्ष्य को ये कंपनियां सार्वजनिक मंचों पर बार-बार जाहिर भी करती हैं. लेकिन देसी ओटीटी कंपनियां तो इन दिनों व्यूज, सब्सक्रिप्शन और विज्ञापनों की चाहत में इस कदर आसक्त और आक्रामक हो गई हैं कि डर लगने लगा है कि कहीं ये आंकड़े ही कुछ वक्त बाद हिंदुस्तानी वेब स्पेस में ‘टीआरपी कल्चर’ के आगमन का उद्घोषक न बन जाएं.

आज की तारीख में आप किसी भी देसी ओटीटी मंच का नाम गूगल कर लीजिए – आल्टबालाजी से लेकर मैक्स प्लेयर तक – आपको न्यूज वाले सेक्शन में कई ऐसी रिपोर्ट पढ़ने को मिल जाएंगी जिसमें इन कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी व्यूज, सब्सक्रिप्शन और विज्ञापनों से जुड़े आंकड़ों का शो-ऑफ करते हुए मिलेंगे.

कंटेंट की गुणवत्ता की जगह आंकड़ों की यह जुगाली करते रहना भी हिंदुस्तानी वेब स्पेस को दूसरा बुद्धू बक्सा बना देगा.

प्रतिभाशाली और उदीयमान निर्देशकों-लेखकों से दूरी बनाकर चलना

‘जिंदगी’ नाम का चैनल जब टीवी पर प्रसारित होता था तो उसपर पाकिस्तानी ड्रामे देखने वाला हर दर्शक यह जरूर कहता था कि हिंदुस्तानी धारावाहिकों को पाकिस्तानी टीवी इंडस्ट्री से सीखना चाहिए. कहा जाता था कि हमारा टीवी अपने नियम-कायदों में बुरी तरह जकड़ा हुआ है और सीमित अवधि की कहानी कहने से इसलिए बचता है कि वो एक तो उतना पैसा नहीं कमा पाएगा जितना उतनी ही कहानी हजार, दो हजार एपीसोड में दिखा कर कमा सकता है! दूसरा हमारे टीवी के पास वे उम्दा लेखक-निर्देशक हैं ही नहीं जो उस तरह की कहानियां लिख-दिखा सकें जैसी कि सीमित अवधि के बेहद उम्दा पाकिस्तानी धारावाहिक लिख-दिखा लेते हैं.

बुद्धू बक्से की यही कमियां अब हिंदुस्तानी वेब स्पेस में भी लागू होने लगी है. आल्टबालाजी से लेकर मैक्स प्लेयर जैसे देसी ओटीटी मंचों ने सीमित अवधि के धारावाहिक सीजन के हिसाब से बनाना तो शुरू कर दिए हैं लेकिन उनमें वह बात ही नहीं है जो पाकिस्तानी ड्रामों में होती थी. राम कपूर और साक्षी तंवर का ‘कर ले तू भी मोहब्बत’ से लेकर राजीव खंडेलवाल अभिनीत ‘हक से’, रोनित रॉय अभिनीत ‘कहने को हमसफर हैं’ वगैरह को देखते वक्त आपको लगेगा ही नहीं है कि उस ‘वेब स्पेस’ का कोई कंटेंट देख रहे हैं जो कि दुनिया-भर में ‘हटके’ होने के चलते ख्याति पाया हुआ है. तो ऐसा क्या है जो हमें उस तरह का बेमिसाल कंटेंट बनाने से अभी भी रोक रहा है?

टेलीविजन की वह कार्यप्रणाली जो कि पूरी की पूरी वेब स्पेस में स्थानांतरित हो चुकी है. इसलिए सीमित अवधि के धारावाहिक वेब स्पेस पर देखने पर भी वहीं टेलीविजन के सीरियल वाला व्याकरण मिलता है और बैकग्राउंड स्कोर से लेकर कैमरा मूवमेंट और एडीटिंग तक में वही दोहराव है. लेखन तो खैर है ही टीवी से आए लेखकों का, और निर्देशक के तौर पर भी फिल्मों के बड़े नाम लेने के बावजूद – जैसे केन घोष (‘हक से’), फरहाद समजी (‘बेबी कम न’) – ये फिल्मकार न ग्रामर बदल पाते हैं न कुछ मुख्तलिफ विजन को दर्शा पाते हैं.

फिर इन देसी ओटीटी मंचों पर वेब सीरीज के कंटेंट में भी या तो रीमेक कल्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है या फिर टेलीविजन के तौर-तरीकों की ही छाप साफ नजर आ रही है. नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम के नियमित दर्शक तो शायद ही इन देसी मंचों पर मौजूद वेब सीरीज को पसंद कर पाते होंगे, क्योंकि इनका स्तर हिंदुस्तानी धारावाहिकों के स्तर से आसपास का है और ये वेब सीरीज लिखने और बनाने के व्याकरण को अभी तक ठीक से समझे नहीं हैं.

भले ही ये नागेश कुकनूर (‘द टेस्ट केस’, आल्टबालाजी और ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स’, हॉटस्टार) से लेकर सुधीर मिश्रा (‘हास्टेजेस’, हॉटस्टार), तिग्मांशु धूलिया (‘क्रिमिनल जस्टिस’, हॉटस्टार), सोनम नायर (‘काफिर’, जी5) और उमेश शुक्ला (‘मोदी : जर्नी ऑफ अ कॉमन मैन’, इरोस नाउ) जैसे बॉलीवुड के स्थापित निर्देशकों को अपने मंचों से जोड़ने में सफल रहे हैं, लेकिन अब तक एक भी उम्दा वेब सीरीज आधा दर्जन से ज्यादा की संख्या में मौजूद इन देसी ओटीटी मंचों की तरफ से हमारी नजर नहीं हुई है.

साफ है कि प्रतिभाशाली व उदीयमान देसी निर्देशकों व लेखकों की पहचान अभी भी केवल विदेशी नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो को ही है.

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अश्लीलता को बोल्ड और क्रांतिकारी मानने की भूल

एक वक्त था जब टेलीविजन धारावाहिकों में नायक-नायिका का किस कर लेना पाथ-ब्रेकिंग माना जाता था. नायक-नायिका का बेहद करीब आकर किसी बॉलीवुड गीत पर इंटिमेट होना ‘बदल रहा है हमारा टेलीविजन!’ जैसी हेडलाइन टीवी न्यूज को देता था. लेकिन हम सभी जानते हैं कि ये छद्म प्रगतिशीलता टीवी के किसी काम नहीं आई और वह आज भी वहीं खड़ा है जहां 10-15 साल पहले खड़ा मिलता था. क्योंकि अपने कंटेंट को सुधारने की जगह हमारे बुद्धू बक्से ने ‘शॉक एलीमेंट’ को खबरों में बने रहने का नया जरिया बना लिया था और खुद को बोल्ड और क्रांतिकारी मानने का दिखावा भर कर रहा था.

मौजूदा हिंदुस्तानी वेब स्पेस भी अश्लीलता को बोल्ड और क्रांतिकारी मानने की ही भूल कर रहा है. कहानी की मांग अनुसार चुंबनों का होना, न्यूडिटी का होना गलत नहीं है – जैसे कि ‘सेक्रेड गेम्स’ से लेकर ‘मिर्जापुर’ तक में हम देख चुके हैं – लेकिन सिर्फ दर्शकों को मैन्युपुलेट करके वासना का इस्तेमाल अपनी व्यूअरशिप बढ़ाने के लिए करना एक अनैतिक कदम है. कुछ ओटीटी मंच तो बोल्ड कहानियों के नाम पर इन दिनों सॉफ्ट पार्न तक परोस रहे हैं.

उल्लू नामक एक ऐप-वेबसाइट पर आपको टीवी के जाने-माने कलाकार कई सारी सीरीज में काम करते हुए नजर आ जाएंगे. लेकिन इसका ज्यादातर कंटेंट सी-ग्रेड का है और बेवजह की न्यूडिटी और अश्लीलता से भरा हुआ है. इतना ज्यादा कि सुनने में आने लगा है कि इसकी कई सीरीज की क्लिप्स पॉर्न साइट्स तक पर मिलने लगी हैं और इसी वजह से टोरंट्स वेबसाइट पर भी उल्लू के कंटेंट की लगातार मांग रहती है.

आल्टबालाजी जैसे स्थापित मंच भी अश्लीलता परोसने में बेहद आगे हैं. खुद को नए जमाने का दिखाने के लिए भले ही ये मंच दावा करें कि इनकी वयस्क कहानियां आज के अर्बन स्पेस का सच हैं और टीवी का पारंपरिकता का बंधन तोड़कर ये मंच इरोटिका जॉनर को मुख्यधारा का बनाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन असल में ये सब ‘मस्तराम’ के ही डिजिटल संस्करण भर हैं!

जब आप इनकी ‘गंदी बात’, श्रेयस तलपड़े अभिनीत ‘बेबी कम न’, ‘ट्रिपल एक्स’, ‘रागिनी एमएमएस रिटर्न्स’,‘बेकाबू’ जैसी सीरीज के साथ-साथ विक्रम भट्ट की यूट्यूब पर मौजूद ‘माया’ और वूट पर मौजूद ‘फ से फैंटसी’ जैसी दर्जनों इरोटिका सीरीज से होकर गुजरते हैं तो साफ-साफ समझ आता है कि सिर्फ अश्लीलता परोसकर व्यूज और सब्सक्रिप्शन बढ़ाना ही इनका मकसद है. न कि कोई तमीजदार कहानी कहना और न ही इंटिमेसी की बागडोर महिलाओं के हाथों में सौंपकर कोई प्रोग्रेसिव चलन आगे बढ़ाना.

विगत वर्षों से कई सर्वे बताते रहे हैं कि हिंदुस्तान में ओटीटी कंटेंट को सबसे ज्यादा मोबाइल पर कन्जयूम किया जाता है. स्मार्ट टीवी का नम्बर मोबाइल के बाद ही आता है और 35 साल से कम का युवा इनका सबसे बड़ा यूजर बेस है. साफ है कि इस तरह का कंटेंट ज्यादातर इन्हीं मोबाइल उपभोक्ताओं को टारगेट करने के लिए परोसे जा रहे हैं जो कि सस्ते-टाइमपास मनोरंजन की चाहत में जब-तब मोबाइल में डूबे रखते हैं.

आप कह सकते हैं कि ऐसा अश्लील कंटेंट हमारे बुद्धू बक्से ने कभी नहीं परोसा, इसलिए उससे तुलना बेकार है. लेकिन इस तरह का रिग्रेसिव कंटेंट शर्तिया हिंदुस्तानी वेब सीरीज स्पेस का स्तर गिरा रहा है और ये एक दिन इस स्पेस को पीछे की ओर ले जाकर दूसरा बुद्धू बक्सा बनाने पर ही मजबूर करेगा. और वह दिन जल्दी ही आएगा अगर इन गलतियों को खूबियां मानना बंद नहीं किया गया तो.

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