संजय मांजरेकर का प्रशंसक होना आसान नहीं. कमेंटेटर संजय मांजरेकर का. जब क्रिकेट के प्रसारण का बाजार दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा था तो भारत में इस खेल के प्रशंसकों को आधुनिक दौर के कुछ महान अंग्रेजी कमेंटेटरों को सुनने का मौका मिला. रिची बेनो, टोनी ग्रेग और बिल लॉरी जैसे नाम इनमें शामिल हैं. इन्हें उन चुनिंदा सर्वकालिक श्रेष्ठ नामों की सूची में रखा जाता है जिन्होंने हमारे इस प्यारे खेल को अपनी आवाज दी. लेकिन इनमें किसी भारतीय का नाम दुर्लभता से ही होता है. हर्षा भोगले शायद अपवाद हैं. कुछ हद तक रवि शास्त्री का नाम भी लिया जा सकता है. लेकिन अगर इस खेल को आवाज देने वाले सबसे लोकप्रिय लोगों की सूची बनाई जाए तो इसमें किसी भारतीय का नाम शायद ही आए. संजय मांजरेकर का तो बिल्कुल ही नहीं आएगा. बहुत से लोग उन्हें सबसे पक्षपाती कमेंटेटर मानते हैं. फिर भी रविंद्र जडेजा ने उनके लिए जो कहा, उसे अच्छा नहीं कहा जा सकता.

संजय मांजरेकर ने रविंद्र जडेजा को टुकड़ों में खेलने वाला क्रिकेटर कहा था और जडेजा की यह टिप्पणी उसी बात का जवाब मानी जा रही है. अगर आप रविंद्र जडेजा के इस ट्वीट पर आ रहे जवाब देखें तो ऐसे लोगों की एक बड़ी तादाद है जिन्होंने उन्हें शुक्रिया कहा है.

वैसे यह पहली बार नहीं है जब किसी सक्रिय क्रिकेटर ने संजय मांजरेकर को बकवास करने वाला कहा हो. आईपीएल के दौरान कीरेन पोलार्ड ने भी कुछ ऐसी ही बात कही थी. हालांकि यह थोड़ी अजीब बात थी क्योंकि मांजरेकर ने वह नहीं कहा था जो पोलार्ड ने समझ लिया था.

हालांकि इन दोनों घटनाओं में समझने वाली बात यह भी है कि खिलाड़ियों की आलोचना करते हुए संजय मांजरेकर कई बार कुछ दायरों के बाहर चले जाते हैं. जब वे क्रिकेट खेला करते थे तो उन्हें तकनीक के प्रति अपने जुनन और खेल के कट्टर विद्यार्थी के तौर पर जाना जाता था. वे अपने इस जुनून को कमेंटरी बॉक्स तक भी ले आए हैं जो इन दिनों ज्यादा ही साफ दिखता है.

इस बात को वे मानते भी हैं जैसा कि भारत और बांग्लादेश के बीच मैच के दौरान कमेंटरी करते हुए उनका कहना था, ‘माफ कीजिएगा मैं आज केएल राहुल की बल्लेबाजी पर इस तरह चिपक गया हूं.’ असल में संजय मांजरेकर इसका जिक्र कर रहे थे कि कैसे इस भारतीय सलामी बल्लेबाज को शॉट के लिए गैप ढूंढने में दिक्कत हो रही है. इससे पहले वे एक ट्वीट में भी इस तरह की बात कह चुके थे.

कई लोगों को संजय मांजरेकर के साथ यह दिक्कत लगती है कि वे मुंबई या फिर मुंबई इंडियंस के खिलाड़ियों के पक्ष में ज्यादा झुके दिखते हैं. वे कई बार इन खिलाड़ियों की जरूरत से ज्यादा तारीफ करते हैं. यही वजह है कि वे चेन्नई सुपर किंग्स के प्रशंसकों के लिए किसी विलेन जैसे हो गए हैं. संजय मांजरेकर के लिए नफरत इस आईपीएल सीजन के दौरान एक नए स्तर पर पहुंचती दिखी जब खिताब जीतने वाली मुंबई इंडियंस ने चेन्नई सुपरकिंग्स को चार बार हरा दिया.

अपनी तीखी जबान के लिए मशहूर एक तमिल कमेंटेटर ने हाल में ऑन एयर यहां तक कह डाला कि क्षेत्रीय भाषाओं में मैच का प्रसारण सुनने वालों की तादाद इसलिए बढ़ रही है कि वे संजय मांजरेकर की कमेंटरी बर्दाश्त नहीं कर सकते. ये दोनों एक ही प्रसारक के साथ काम करते हैं और इसे देखते हुए इस तरह की टिप्पणी हैरान करने वाली है.

इस नए प्रकरण में भी चेन्नई सुपर किंग्स-जडेजा कनेक्शन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भले ही खिलाड़ी कितना भी कहें कि सोशल मीडिया पर होने वाली टिप्पणियों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यह असंभव है कि आप इनसे बिल्कुल अछूते रह जाएं. शायद जडेजा को भी आईपीएल की अपनी इस टीम के प्रशंसकों की उस नफरत का अंदाजा होगा जो उनके मन में संजय मांजरेकर के लिए है. और हो सकता है कि जब उन्होंने संजय मांजरेकर की अपने लिए वह टिप्पणी देखी होगी तो उनके मन में भी यह नापसंदगी एक नए स्तर तक पहुंच गई होगी.

सवाल उठता है कि क्या संजय मांजरेकर ने हद पार की. इस पर बहस हो सकती है. उनका काम है कमेंटरी और विश्लेषण. विचारों के मामले में वे लचीले नहीं हैं और वे कई बार ऐसा भी हो सकता है कि वे हद के बाहर निकल जाएं. मेरा मानना है कि संजय मांजरेकर कमेंटेटर की तुलना में कहीं अच्छे लेखक हैं क्योंकि लिखते हुए उन्हें अपने नजरिये को समझाने का मौका मिल जाता है. बोलते वक्त वे ऐसा नहीं करते. ऐसा लगता है कि जो भी उनके मन में आता है वे तपाक से बोल देते हैं.

लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि जडेजा ने ठीक किया? यह समझा जा सकता है कि उन्हें संजय मांजरेकर का कहा बुरा लगा और यह भी कि उन्होंने इस पर अपनी नाखुशी जताने का फैसला किया. आखिरकार यह व्यक्तिगत आलोचना थी. लेकिन समस्या यह है कि उन्होंने यह कहा कि मांजरेकर ने उनसे कम मैच खेले हैं और वे उनकी तुलना में कम कामयाब हैं.

टोनी ग्रेग ने सिर्फ 22 एकदिवसीय मैच खेले थे. तो क्या उन्हें 44 से ज्यादा मैच खेलने वाले खिलाड़ी पर टिप्पणी करने का हक नहीं है? अजीब लगता है न? खिलाड़ियों की मौजूदा पीढ़ी के बारे में कुछ कहने के लिए खेल विश्लेषकों और पंडितों के लिए यह जरूरी नहीं है कि उनका खेल जीवन शानदार रहा हो. रविंद्र जडेजा ने वही सोच दिखाई है जो विराट कोहली ने तब दिखाई थी जब उन्होंने उन पत्रकारों पर सवाल उठाया जिन्होंने एक भी अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं खेला या कथित तौर पर एमएस धोनी ने जिन्होंने हर्षा भोगले पर तंज कसा. उन प्रशंसकों या फिर पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर के बारे में भी यह कहा जा सकता है जो खिलाड़ियों के रूप में चयनकर्ताओं के रिकॉर्ड पर सवाल खड़े करते हैं. ये आलोचनाएं टिप्पणी करने वाले व्यक्तियों पर हैं, उनकी टिप्पणियों पर नहीं.

तो सवाल उठता है कि मौजूदा खिलाड़ियों के खेल का विश्लेषण करने या उसकी आलोचना का हक आखिर किसे है. सिर्फ उन्हीं को जिन्होंने उस खिलाड़ी से ज्यादा मैच खेले हैं जिस पर वे सवाल खड़े कर रहे हैं?

रविंद्र जडेजा का यह सोचना सही हो सकता है कि संजय मांजरेकर को ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी. लोगों के संजय मांजरेकर पसंद न करने के भी कारण हो सकते हैं जिनमें से ज्यादातर सही भी हैं. लेकिन बड़ा मुद्दा यह है कि अगर आप सार्वजनिक रूप से चोट करते हैं तो निशाना आलोचना होनी चाहिए, आलोचक नहीं.