विडंबना शब्द का उपयोग इतनी बार करना पड़ता है कि लगता है हम भीषण आवृत्ति के समय में रह रहे हैं. सब कुछ दुहराया जा रहा है. भय, घृणा, हिंसा, हत्या आदि सब बार-बार होते रहते हैं जबकि इनसे मुक्त हो सकने के सारे कारण और आधार, अवसर और उपकरण मौजूद हैं. हम लगभग रोज ही धर्म और राजनीति में एक-दूसरे की घुसपैठ देख रहे हैं- उनमें इन दिनों बड़ी गलबहियां होती रहती हैं. धर्म संसद में भी घुस गया है. एक धर्मनिरपेक्ष संविधान के अंतर्गत बनी संसद में धार्मिक नारे लगते हैं और स्पीकर को ऐसे नारे न लगने देने की सख़्ती बरतने पर विवश होना पड़ रहा है. व्यापक समाज में भी, कम से कम दृश्य अर्थ में, धार्मिकता बढ़ती नज़र आ रही है. बहुत लोग अपने धर्म के चिह्न बहुत आक्रामकता के साथ दर्शाते रहते हैं.

धार्मिकता का यह नया उभार सभी धर्मों के कुछ मानवीय और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति निष्ठा की बढ़त का प्रमाण भी होना चाहिये. दुर्भाग्य से ऐसा क़तई नहीं है. यह नयी विकराल हो गयी धार्मिकता दरअसल प्रेम, पवित्रता, सद्भाव आदि का दमन करने पर उतारू धार्मिकता है. यह धार्मिकता दूसरे धर्मों से घृणा, उनके प्रति असहिष्णु और आक्रामक होने पर टिकी है. उसे क्रूरता, अमानवीयता, हिंसा, हत्या आदि का सहारा लेने में कोई संकोच नहीं है. यह कहना मुश्किल है कि ये वृत्तियां इस धार्मिकता ने राजनीति से ग्रहण की हैं या कि उसने उन्हें राजनीति में दाखि़ल किया है.

हमारे राजनेता अपना धार्मिक विश्वास सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करते रहते हैं- उनका मंदिर-मसजिद-गुरुद्वारे-गिरजाघर जाना अब पूरी तरह से नियोजित सार्वजनिक घटना होने लगी है. उन्हें पूजा-अर्चना, प्रार्थना, प्रणाम करते वक़्त हमारे चैनलों पर दिखाया जाता है. दिन दूर नहीं जब हमारे इन कर्णधारों को खाते-पीते, शायद नहाते भी मीडिया पर देखने का सौभाग्य पायेंगे. ऐसी लगातार दृश्यता में जो नज़र नहीं आता वह है पवित्रता. उसकी पारंपरिक जगहें या शरण्य जैसे पूजाघर भी अब विज्ञापन के घेरे में हैं, आत्मविज्ञापन के लिये पवित्रता से यह जगह भी बड़े भक्ति-भाव से छीनी जा रही है.

हिंसा-हत्या-लिंचिंग आदि की जो मानसिकता इस समय बहुत विस्तार पा गयी है उसमें पवित्रता का विचार बिलकुल ही अप्रासंगिक हो गया है. किसी व्यक्ति की गरिमा, उसकी देह, उसकी जान तक की अब ख़ैर नहीं. शायद हम लगातार ऐसी स्थिति में पहुंच रहे हैं जब हमारे जीवन और समाज में कुछ भी पवित्र नहीं रह जायेगा. पवित्र न होगा, न कोई उसे मानेगा, न उसे कोई चाहेगा. यह अमर्यादित समय है जो किसी तरह की मर्यादा, आचरण की किसी तरह की शुद्धता को रौंदता चल रहा है. विशेषतः उत्तर भारत के पूजाघरों में अगर बेसुरापन बढ़ता जा रहा है तो इसका एक कारण यह समझ में आता है कि अब भक्ति का सुर में होना ज़रूरी नहीं रह गया है. हत्या या हिंसा या हमले सुर में नहीं किये जा सकते: उनका बेसुरा होना अनिवार्य है.

दुर्नीति का बढ़ता भूगोल

आज के एक हिंदी अख़बार में इस तरह की ख़बरें हैं. 55 करोड़ की जीएसटी चोरी, जय श्रीराम न कहने पर मौलवी की कार को मारी टक्कर, फुटपाथ पर सो रहे 4 लोगों पर चढ़ाई कार, नाबालिग बेच रहा था स्मैक, बाइक सवार बदमाशों ने महिला गवाह को मारी गोली, पूर्व सांसद के गले से सोने की चैन झपटी, आफ़िस में धूल फांक रहे थे राशन कार्ड, जीएसटी की बारीकियां सीख करने लगे फर्जीवाड़ा, पत्नी को साथ लेकर चुराई 100 कारें, टोल प्लाजा पर महिला टोलकर्मी को पीटा, आरोपियों ने 17 बैंकखातों में 1500 करोड़ खपा दिये, ई-रिक्शा बिजनेस के नाम पर 23 करोड़ ठगे, यमुना एक्सप्रेस वे पर टकराई कार 93 बच्चों समेज 7 घायल, भाटपाड़ा में तनाव, कई परिवारों ने किया पलायन, दिमाग़ी बुखार से 5 और बच्चों की मौत, 160 पहुंचा आंकड़ा, कुल्लू हादसा, एक साथ जली कई चिताएं, दूसरे दिन भी नहीं जले चूल्हे, वालमार्ट ने कारोबार के लिए भारत में भी बांटी घूस. एक और सुर्खी यह थी कि दो सौ अधिक देशों के यहां किये गये सर्वेक्षण से पता चला है कि भारत का ईमानदारी को लेकर बनी तालिका में नंबर बहुत नीचे आया है. यह सब एक दिन की ख़बरों में है.

पिछले दिनों एक ख़बर यह भी छपी थी कि इस बार लोकसभा में चुने गये सांसदों में अभियुक्तों और करोड़पतियों की संख्या लोकसभा के इतिहास में सबसे अधिक है. इस सबका एक आशय यह है कि हमारा सार्वजनिक जीवन अब हिंसा और अपराध से बहुत अधिक व्याप्त है, दौलत के लिए बड़ी होड़ है. तीनों ही उसमें लगातार बढ़ रहे हैं और उन्हें अनेक शक्तियों का समर्थन प्राप्त है. यह विडंबना और गहरा जाती है जब हम पहचानते हैं कि ऐसा बहुत कुछ महात्मा गांधी के 150वें वर्ष में सिर्फ़ देश की राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में हो रहा है. बहुत सी हिंसा और अपराध तो अभी भी ख़बरों में नहीं आते. राजनीति-धर्म-जाति-मीडिया-बाज़ार के महागठबंधन ने भारतीय समाज को किस हालत में पहुंचा दिया है यह अब उसी का प्रमाण है.

कई बार यह संदेह होता है कि अब भारतीय समाज, उसका पढ़ा-लिखा हिस्सा नैतिक समाज नहीं रह गया है. वह ऐसी राजनीति की चपेट में है जिसमें नीति के लिए अब कोई जगह नहीं बची है. धर्म तक अनैतिक आचरण करने में संकोच नहीं करते. ईमानदारी, सच की क़द्र, भलमनसाहत, भाईचारा, मदद आदि गुण शायद उन्हीं में बचे हैं जो साधारण लोग हैं और जिन पर हमारा कभी ध्यान कभी नहीं जाता. पर वे हैं इसका प्रमाण भी जब-तब संयोगवश मिलता रहता है, सामान्य जीवन-व्यवहार में, मीडिया से प्रायः अलक्षित.

लूटपाट, उठाईगीरी, हड़प, बेजा कब्ज़ा, घृणा, नष्ट करने का उत्साह, बेवजह निहत्थे की जान लेने की बहादुरी, चोरी-चकारी, घूसख़ोरी, कामचोरी, बात-बात पे गुस्सा आदि वे गुण हैं, जिनके अनुयायी तेज़ी से बढ़ रहे हैं. वे हर जगह हैं. सरकारों में, राजनीति और राजनैतिक दलों में, मंदिरों-मसजिदों-गुरद्वारों-गिरजाघरों में,शिक्षासंस्थाओं में, व्यापारिक प्रतिष्ठानों में, अदालतों में, मीडिया में, घर-पड़ोस में, मुहल्ले-शहरों में, यातायात में. उनसे बचकर निकलने की, लगता है, कोई राह ही नहीं बची है.

कविता की जगह

कविता की साहित्य, समाज और समय में कहां-कितनी-कैसी जगह है इसकी चिन्ता या अनुमान हम अकसर करते हैं. अकसर उसके परिणामस्वरूप कुछ दुख भी होता रहता है. आमतौर पर यह प्रभाव पड़ता है कि हमारे इस समय में, जो कई मायनों में कई कारणों से हममें से कइयों को अभागा लगता है, कविता की जगह लगातार सिकुड़ रही है. विडंबना यह है कि कविता का वितान लगातार फैला है, उसमें ऐसा बहुत कुछ जीवन और मानवीय स्थिति का आता गया है जो पहले कविता से बाहर ही रहा आया करता था. पर इस अभूतपूर्व विस्तार के बावजूद, उसकी जगह सिकुड़ रही है. कवियों को यह क्लेश होता रहता है कि दुनिया का और उसमें रहनेवाले ज़्यादातर लोगों का काम कविता के बिना बखूबी चल जाता है.

हाल में दो प्रसंग ऐसे हुए जिनसे लगा कि कई व्यक्तियों के जीवन में कविता गुपचुप रहती है और उन्हें उसकी दरकार होती है, भले इसका बाहर के लोगों को ख़ास पता या अन्दाज़ नहीं होता. एक स्कूली अध्यापक बनारस से अपना कविता संग्रह लेकर उसकी भूमिका लिखवाने आये. अध्यापन में लंबा समय बिताने के कारण उनका आज की कविता के मुहावरों से ज़रा भी परिचय शायद नहीं रहा. वे अपने से, बिना इस दूरी या पिछड़ाव की चिंता किये, जब-तब कविता लिखते रहे हैं और जीवन के उत्तरकाल में उसे पुस्तकाकार प्रकाशित करने की कोशिश कर रहे हैं. इसी तरह अस्सी बरस के अधिक की उमर करनेवाले एक पत्रकार और सरकारी अधिकारी कुछ अपने ही ढब में पिछले सत्तर बरसों से कविता लिखते रहे हैं और अब उनका परिवार उनको पुस्तकाकार प्रकाशित करने का उपक्रम कर रहा है. उनकी कविता उनके जीवन के उतार-चढ़ाव का साक्ष्य तो नहीं पर साहचर्य ज़रूर है. दोनों ही कवि माने जाने की किसी आकांक्षा से ग्रस्त नहीं रहे हैं. उन्हें साहित्य-समाज-समय में हुए परिवर्तन और परिप्रेक्ष्य में रखने का प्रयत्न मुझे ज़रूरी नहीं लगता. उनके अपने जीवन की अभिव्यक्तियों का उनकी कविता एक तरह का पुंजन है और यह उसकी प्रासंगिकता के लिए काफ़ी है.

समझ में यह भी आया कि जैसे इन दो व्यक्तियों में जीवन में उन्हें निजी स्तर पर कविता और उसके संग-साथ की दरकार रही है वैसे ही बहुत से अज्ञात व्यक्तियों के यहां भी ऐसी स्थिति होगी. ये जगहें भी कविता की जगहें हैं. उनसे व्यापक दृश्य में कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर उनकी अपनी ज़िन्दगी में कविता के कारण फ़र्क पड़ता है. कविता उनके यहां संगसाथ, राहत, आत्म-साक्षात्कार, विवेक आदि का मुक़ाम बन जाती है. हमें ऐसी जगहों का भी एहतराम करना चाहिये. ऐसी कविता की गुणवत्ता की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं जैसे कि उनकी समकालीनता की भी. कविता सामाजिक परिसरों से बाहर भी होती है, होती रहती है, होती रहना चाहिये. कविता सिर्फ़ कवि नहीं, और लोग भी लिखते हैं और उन्हें ऐसा करने का पूरा हक़ है. कविता को भी समाज और समय से अलक्षित किसी के जीवन में रहने का हक़ है.